Wednesday, August 24, 2016

muktak 4

चीखो ! और ज़ोर से चीखो, 
जानता हूँ चीखने से कुछ नहीं होगा, 
पर चीखो जरूर उस भविष्य के लिए, 
पूरी ताकत से चीखो । 
कोशिश करो बदलने की, 
हर दागदार परंपरा को,
चीखना ही शायद समाधान दे अब,
और बचा ले जाए स्वाभिमान तुम्हारा,,
इसलिए चीखो और ज़ोर से चीखो ।
अपने लिए नहीं तो भविष्य के लिए
चीखो ! और ज़ोर से चीखो ॥
----सौरभ


समझने लगा हूँ तुमको,
परेशान इसलिए हूँ,
जो न समझता होता, 
तो मैं भी मस्त रहता ।। 
-सौरभ


कई सच अभी बाकी हैं,
आजमाने के लिए ॥ 
कुछ झूठ तो बचा लें,
मुस्कुराने के लिए ॥ 
सच बोलने से अक्सर,
जब चोट लगती हो ।
क्यों न कहें कुछ झूठ,
जख्म सहलाने के लिए॥
ये सच का ज्ञान हमको,
निरुत्तर ही कर देता,
आओ कहें कुछ झूठ,
ख्वाब बचाने के लिए॥
-सौरभ

तेरे "करम" हैं ऐसे,
"उसकी" मेहर है मुझपे,
मैं डूबता भी हूँ तो,
दरिया उछाल देता ।।

सबको "भरम' यहाँ है,
मोहब्बत को जानने की,
हँसते ही तुझे देखूं,वो
जुमला उछाल देता ।।
लगता है कभी ऐसा,
वो तोड़ देगा अब तो,
पर पास आके फिर से,
यूँ भी सम्भाल देता ।।
--सौरभ

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