Wednesday, August 24, 2016

मुक्तक

कई सच अभी बाकी हैं,
आजमाने के लिए ॥ 
कुछ झूठ तो बचा लें,
मुस्कुराने के लिए ॥ 
सच बोलने से अक्सर,
जब चोट लगती हो ।
क्यों न कहें कुछ झूठ,
जख्म सहलाने के लिए॥
ये सच का ज्ञान हमको,
निरुत्तर ही कर देता,
आओ कहें कुछ झूठ,
ख्वाब बचाने के लिए॥
-सौरभ


तुम्हारे वार को सहके भी, 
जो मुस्कुराता है,
बड़ा नादाँ है अब भी वो,
जो प्यार ऐसे जताता है!
--सौरभ--


संकल्पों का दौर गुजर चुका,
अब विकल्पों की बारी है,
“दुख का” जीवन नाम नहीं,
यह तो एक फुलवारी है ॥
रुक रुक कर चलने का अब,
तो चलन नही है प्रचलन में,
जितने वक्त भी संग चलो,
अब वो जीवन ही उपवन है॥
एक बिन्दु पर रुके जो तुम,
और गहरे मे भी उतर गए,
पर प्यासे फिर भी रहोगे तुम,
जल/जीवन स्तर नीचे खिसक गए।
दुख जीवन का सार भले हो,
सुख उद्देश्य है जीवन का,
विकल्प आजमा के देखो,
मिलेगा मोल संकल्पों का ॥

[धर्म वो जो मुक्त करे ]
- सौरभ

छुपाने की आदत हमने, 
बचपन से सीखा खुद ही, 
इसने ही हमको छोटा, 
बहुत छोटा बना दिया ॥ 
------सौरभ

मैं इस लिए हूँ हल्का (खुश) ,
तू इसलिए है भारी(दुःख)....
मुझे भूलने की लत है,
तुझे याद की बीमारी....
--सौरभ

दिल मे उतरने का, 
पूछो जो मुझसे रास्ता, 
मासूम सी हंसी वो,
बेफिक्र खिलखिलाहट । 
गुस्ताख़ सी शरारत, 
ख्वाबों की एक चाहत ।
प्यारी सी हो एक ख़्वाहिश,
जीवन बने इबादत ॥
भोली सी मोहब्बत का,
इतना ही फ़साना है,
सिमटे तो है एक दरिया,
फैले तो है जमाना ॥
---- सौरभ

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