Wednesday, August 24, 2016

क्षेपक

टुकड़े किए तो पहले, 
खुद के हजार हमने, 
फिर हरेक मे तुझे ही, 
तलाशते रहे हैं हम ॥ 
बदले हैं रूप हमने, 
पाने का गुमा भी हमको,
तुझे खोने की याद आते,
भटकते हैं अरसे हम ॥
---सौरभ


तेरे "करम" हैं ऐसे,
"उसकी" मेहर है मुझपे,
मैं डूबता भी हूँ तो,
दरिया उछाल देता ।।

सबको "भरम' यहाँ है,
मोहब्बत को जानने की,
हँसते ही तुझे देखूं,वो
जुमला उछाल देता ।।
लगता है कभी ऐसा,
वो तोड़ देगा अब तो,
पर पास आके फिर से,
यूँ भी सम्भाल देता ।।
--सौरभ

जो समझा नही अब तक,
वही समझा रहा हूँ मैं, 
गला ये सूखता जाता, 
मगर फिर गा रहा हूँ मैं ॥ 
तुम्हारे आँख मे तिनका,
गया है, जो मोहब्बत का ॥
ये किस्सा दर्द का गाके,
तुम्हें बहला रहा हूँ मैं॥
-सौरभ
मुझे बर्बाद करने का, 
दिया तुझको भी पूरा हक, 
नही है प्यार मुझे तुझसे , 
कभी ऐसा नही कहना ॥ 
--सौरभ--

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