Wednesday, August 24, 2016

मुक्तक 3

आ जिंदगी को अपनी, 
कुछ इस तरह से जी लें, 
रुकसत के वक्त दिल में,
कोई आरजू ना हो ।। 
--सौरभ

मुस्कान" का तेरे सेवक हूँ , 
मुझे आता है कुछ और नहीं !
हँसता हुआ तुझे देखूं बस,
मुझे भाता है कुछ और नहीं !! 
--सौरभ

लड़ सकता हूँ जमाने से, तन्हा ही मैं मगर, 
तेरा साथ जो होता मेरे, तो खुद पे नाज होता 🙏🏻
--सौरभ

मैं जब तक खड़ा मुस्कुराता रहा,,
तुझको न मैं रास आता रहा,,
जब से बना ली है रोनी सी सूरत,,
तेरे चेहरे पर रौनक सा आता रहा..
जब से खड़ा मुस्कुराता रहा.....
--------सौरभ---

रोने और हंसने को अलग समझना भूल है, 
रँगभरे लिबास पहन के कांटे बनते फूल है ।। 
--सौरभ

साथ का सुख है जहाँ,
बिछोह का है दुःख वहाँ !
आ भूलकर इन सभी को
साथ चल कुछ दूर तक !!
हो भले न एक मंजिल, 
रास्ता भी एक न हो !
पर इन अँधेरे रास्तों पर ,
कुछ दूर तक तो साथ चल !
बन्द कर यूँ आँकना अब,
और भूलकर ये तर्क सारे !!
कुछ दूर तक तो साथ चल !
---सौरभ
वो' साथी है हर पल, तन्हाई का 'तेरे',
'तू' महफ़िल में 'उसको' कहाँ ढूंढता है ।
---सौरभ---

जी रहा हूँ शायद, 
मरते हुये शहर की तरह ! 
जहां शोर है बहुत मन मे, 
कूलर के खड़खड़ से तेज 
पंखे की झन्नाहट से भी !
घड़ी की टीक टिक से तेज,
सन्नाटे का शोर है, यहाँ !
विच्छेदित आधारों के बीच
अटका मन और भटकता दिमाग,
भूल जाता है सब कुछ !
बेहोशी को नींद मानकर
जी रहा हूँ शायद !
इस शहर की तरह
बेबस और लाचार !
--सौरभ --...क्रमशः

यंग इंडिया की जिद है, 
चाहिए तो चाहिए ॥ 
अब समझौते की पीढ़ी, 
हटो या साथ दो ॥ 
भूमिका चुनो आप अपनी, 
और समय रहते मुक्त हौओ,
अपने मोह और अविश्वास से ॥
साथ ही इन्हें भी करो मुक्त,
अपने अनुभव के बोझ से ॥
यंग इंडिया की जिद है,
इन्हें चाहिए तो चाहिए ॥
इनके जुनून को सलाम,
आईये सीखें हम सब भी,
ख्वाहिश के लिये जिद्दी होना,
बन्द करें सौंपना अधूरा ख्वाब इन्हें,
यंग बने और निर्णय ले ,
खूबसूरत जीवन जीने का ।
यंग इण्डिया ही बदलेगा अब ,
सारा बोझिल रीती रिवाज ।।
क्योंकि यंग इंडिया की जिद है,
इंहे चाहिये तो चाहिए ।  

सुनो, जिन्दगी होती है सांप सीढ़ी के खेल सी, 
साँप के पूंछ के पास ही होती है कोई सीढ़ी ।
इस तरह मिलता रहता है मुआवजा , 
और वक्त परिक्षण करता रहता है,
सीढ़ी के आगे एक और साँप रखकर।।
ऐसे ही हमारे हाथ में पासा देकर,
नियति खेलती रहती है खेल जिंदगी का ।।
--सौरभ

सुबह से शाम तक हम,
जिस्म को ढोते जाते हैं,
इतने समझौतों पे जीते हैं,
कि मर जाते हैं ॥
ये ज़िंदगी खेल महज,
आलोचना-समर्थन का नहीं,
इतने नाराजगी मे रहते हैं,
कि बिखर जाते हैं॥
साथ हँसना मकसद है ज़िंदगी का,
हम फिर भी रोते जाते हैं,
इतने बेचैनी मे जीते हैं,
कि हँस भी नहीं पाते हैं॥
ये हकीकत और इल्म का नशा,
हमें बेबस सा करता जाता है,
इतने बेरुखी से जीते हैं,
कि दिल छ्लक जाता है॥
चलो खुद से जरा रूबरू होलें अब हम,
जो जैसा,उसे वैसे ही समझते जाते हैं,
आओ हँस कर हम ऐसे जीते हैं,
कि अब सँवरते जाते हैं॥
---सौरभ
सब पुछते हैं हमसे, 
तुम्हें उनकी फिक्र क्यों है, 
सच सच कहो क्या तुमको,
उनसे मोहब्बत है ? 
क्या क्या बताएं उनको, 
कितना सुनाये तुमको,
हम हो चुके हैं राख
कबके बने हैं भस्म ॥
हमें उनकी फिक्र यूं हैं,
टूटे न ख्वाब किसी का,
पूरा हो ख्वाब उनका,
मासूम हँसी वो उनकी,
मुझे अपनी याद दिलाती ,
शायद ये मोहब्बत है,
शायद ये बेरुखी है,
शायद ये दिल्लगी है,
शायद ये कुछ नहीं है॥
----सौरभ

पहचान करोगे बोलो कैसे, 
आंसू और मुस्कान की , 
हँस-हँस के जब आँसू निकले, 
रो -रो के मुस्कान भी ॥ 
----पहचान करोगे बोलो ,,, 
भले कहो तुम्हें लाख फिकर है,
धड़कन के सम्मान की ,
पहचान करोगे बोलो कैसे,
पाकीजा अरमान की ॥
---- ----पहचान करोगे बोलो ,,,
पहले सूली पर टांगोगे,
फिर झुकोगे सजदे मे ,
पहचान करोगे बोलो ऐसे,
कब तलक खुदा- इंसान की ॥
--- ----पहचान करोगे बोलो ,,,
---सौरभ

अब खुद पर यकीन कम है,
और "उस" पर यकीन ज्यादा, 
तो कैसे भला मैं कर दूँ,
'फिर' खुद से कोई 'वादा',,
----सौरभ---

जिसे काम समझ कर हम, करते रहे ताउम्र, 
अब वो सुना रहे कि वो कोई काम ही न था ।।
--सौरभ

No comments: