Wednesday, August 24, 2016

मुक्तक 2

सीखा दो तुम,मुझे भी
ये तरीका प्यार करने का,
उसी को याद करना भी,
उसी को भूल जाना भी।।
उसी को चाहते रहना , 
उसी से छुपाना भी ।
उसी के याद में रोना ,
उसी को न बताना भी ।।
सीखा दो तुम मुझे भी ...
कभी कहना उसी को जां,
कभी उससे मुकरना भी ।।
कभी हौले कदम से साथ,
कभी आगे निकलना भी ।।
कभी लगना गले उससे,
कभी दामन छुड़ाना भी ।।
सिखा दो तुम मुझे भी,
ये तरीका प्यार करने का।।

मुकद्दर हँस रही है फिर,
उसे ही छीनकर मुझसे ।
जिसे उसने लिखा न था,
कभी किस्मत में मेरे तक ।।
गुमां फिर हो गया उसको,
हमारे अश्क़ देखकर।
रुला डाला है एक इंसा,
महज एक ख्वाब तोड़कर ।।
न समझी है न समझेगी ,
"तू" ताकत इनसानो की ।
इन्होंने टूट कर सीखा,
हुनर है फिर सँवरने का ।।
महज तू ख्वाब तोड़े है,
मिटाके इनकी हसरत को,
नमूने ये खुदा के हैं,
रूहानी सी तबियत है ।
खुदा के घर से आने से,
खुदा के घर को जाने तक,
महज ख्वाबो के बुनने का,
ये सब व्यापार करते हैं ।।
--सौरभ
उन्हें यूं बेवजह खोना,
हमें बेचैन करता है,
कि ज़िंदगी यूं हमें क्यों,
हर घड़ी मजबूर करती है।
ये बिखरे हुये से सच,
हमें अपने से लगते हैं,
कि ज़िंदगी यूं हमें फिर क्यों,
भटकने को,यहाँ मजबूर करती है॥
----सौरभ

नहीं है जंग कोई तुझसे,
न कोई जीत हार है ।
मेरा हमराज है साथी तू,
मेरा तू परिवार है॥
नहीं है अब जिरह कोई,
न कुछ भी आर पार है ।
मेरा साथी है यारा तू ,
मेरा तू आधार है॥
नहीं है जंग कोई तुझसे,
न कोई जीत हार है,,
--सौरभ क्रमशः

मैं खो गया हूँ कहीं,अपनी बनाई दुनिया में, 
ए खुदा अब मुझे तू, मुझसे आजाद कर दे ।
--सौरभ

"उसने" ही जब हमको,इस काबिल नहीं समझा..
बेवजह हुनर का अपने,बखान क्या करें हम..

चालाक मानते हो खुद को गर मुझसे,
तो करने दो मुझे कुछ गलतियाँ ।
और गर मानते हो मुझे खुद से बेहतर,
तो कुछ सीख लो मुझसे ।
अगर जलते हो मुझसे तो,
तो उसका कोई इलाज नहीं ।
अब तुमको बुझाने को,
रोक सकता अपनी परवाज नहीं ।।
रखो थोड़ा धीरज और भरोसा,
बुरा या अच्छा होगा जो मेरे साथ,
वो महज निर्णय औ मेरा चयन होगा,
उसे अपनाते देखो मुझे,गुनगुनाते हुए।।
****** सौरभ----***

बेफिक्र हँसी लुटा चूका,
तू अब भी मगर है खुश नहीं । 
आ सम्भाल ले अब तो मुझे,
मेरा अपना है तू गैर नहीं ।
-सौरभ

उसके मासूमियत का इससे,
बढ़कर सबूत क्या हो.
मिलती है सजा मुझको,
ख़ुशी से झूमता वो है।।
-सौरभ

चलो तकदीर को कभी अपनी,
ऐसे भी चिढ़ाया जाये, 
रातों में रो के खूब, 
दिन में मुस्कुराया जाये।। 
--सौरभ

चल आइने के सामने कभी,
जरा खुद से भी माफ़ी मांग ले, 
ज़माने को खुश करने में तूने,
दिल अपना ही बहुत दुखाया है।।

तेरे सब ख्वाब पूरे हों, यही ख़्वाहिश है अब मेरी॥
रहे कायम तेरी मुस्कान, बस इतनी ही दुआ मेरी ॥ 
----सौरभ
यूँ तो तेरे “वजूद” से मुझको,
कभी इनकार नहीं । 
तेरी "बन्दगी” ही करता रहूँ,
ये भी मुझे स्वीकार नहीं..
------सौरभ
खुशबु’ सा होने की,
सीख ऐसे पायी..
फूलों और काँटों ने,
जब की है बेवफाई...
---सौरभ--

तर्क था विज्ञान था, भावना का ज्ञान था,
किन्तु अर्जुनसम मुझमें बहुत अज्ञान था!
कृष्ण होंगे पुरुषरूप इतना ही मुझे भान था,
नारी "कृष्ण" के रूप से मैं पूर्णतः अंजान था !
हे नारी कृष्ण तुम यहां बनते खिलौने स्वयम् हो,
राम की मर्यादा के रक्षक भी यहाँ तुम स्वयम् हो,
तुम प्रेम हो तुम धैर्य हो,अमृत सुधा के सागर हो,
इस जिंदगी के महा समर में फिर भला क्यों मौन हो ?
हे कृष्ण नारी रूप में तुम सबसे सबल सबसे प्रखर,
हे अमृत सुधा!इस अकिंचन का तुम्हें शत शत नमन ।।
--सौरभ
ख्वाब में भी भागते हैं , हम यहां बेचैन से,
ऐ जिंदगी तूने हमे कैसा मुसाफिर बना दिया !!
क्यों छीन ली हर अदा,अहले वफ़ा, सुकून सब,
एक गाँव की तलाश थी, तूने शहर बना दिया !
ऐ जिंदगी तूने हमे कैसा मुसाफिर बना दिया।,,,,
--सौरभ

तुझमें गुरुर का ये , 
हमने ही बीज डाला। 
कभी प्यार से ही तुझको, 
खुदा कहा था हमने।।
--,सौरभ

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