Tuesday, August 30, 2016

अगर तुम्हारी “खोज” हूँ मैं,,,,,


अगर तुम्हारी “खोज” हूँ मैं,

तो तुम मेरी “उपलब्धि” हो।

चंद कदम जो साथ चलें,

वो जीवन की संपत्ति हो ॥ 

                अगर तुम्हारी खोज हूँ मैं ....

तुमसे मैंने कितना सीखा,

शब्द नहीं जो बयां करूँ ।

धन्यवाद से पूरी न हो,

तुम ऐसी परिलब्धि हो॥

                 अगर तुम्हारी खोज हूँ .....

जो ख्वाब हमने हैं देखे

संग मे पूरे करने को ।

उन ख्वाबों के भित्तिचित्र तुम,

हृदयांकित एक प्रसिद्धि हो ॥ 

          अगर तुम्हारी खोज हूँ ....

  

Wednesday, August 24, 2016

muktak 4

चीखो ! और ज़ोर से चीखो, 
जानता हूँ चीखने से कुछ नहीं होगा, 
पर चीखो जरूर उस भविष्य के लिए, 
पूरी ताकत से चीखो । 
कोशिश करो बदलने की, 
हर दागदार परंपरा को,
चीखना ही शायद समाधान दे अब,
और बचा ले जाए स्वाभिमान तुम्हारा,,
इसलिए चीखो और ज़ोर से चीखो ।
अपने लिए नहीं तो भविष्य के लिए
चीखो ! और ज़ोर से चीखो ॥
----सौरभ


समझने लगा हूँ तुमको,
परेशान इसलिए हूँ,
जो न समझता होता, 
तो मैं भी मस्त रहता ।। 
-सौरभ


कई सच अभी बाकी हैं,
आजमाने के लिए ॥ 
कुछ झूठ तो बचा लें,
मुस्कुराने के लिए ॥ 
सच बोलने से अक्सर,
जब चोट लगती हो ।
क्यों न कहें कुछ झूठ,
जख्म सहलाने के लिए॥
ये सच का ज्ञान हमको,
निरुत्तर ही कर देता,
आओ कहें कुछ झूठ,
ख्वाब बचाने के लिए॥
-सौरभ

तेरे "करम" हैं ऐसे,
"उसकी" मेहर है मुझपे,
मैं डूबता भी हूँ तो,
दरिया उछाल देता ।।

सबको "भरम' यहाँ है,
मोहब्बत को जानने की,
हँसते ही तुझे देखूं,वो
जुमला उछाल देता ।।
लगता है कभी ऐसा,
वो तोड़ देगा अब तो,
पर पास आके फिर से,
यूँ भी सम्भाल देता ।।
--सौरभ

मुक्तक 3

आ जिंदगी को अपनी, 
कुछ इस तरह से जी लें, 
रुकसत के वक्त दिल में,
कोई आरजू ना हो ।। 
--सौरभ

मुस्कान" का तेरे सेवक हूँ , 
मुझे आता है कुछ और नहीं !
हँसता हुआ तुझे देखूं बस,
मुझे भाता है कुछ और नहीं !! 
--सौरभ

लड़ सकता हूँ जमाने से, तन्हा ही मैं मगर, 
तेरा साथ जो होता मेरे, तो खुद पे नाज होता 🙏🏻
--सौरभ

मैं जब तक खड़ा मुस्कुराता रहा,,
तुझको न मैं रास आता रहा,,
जब से बना ली है रोनी सी सूरत,,
तेरे चेहरे पर रौनक सा आता रहा..
जब से खड़ा मुस्कुराता रहा.....
--------सौरभ---

रोने और हंसने को अलग समझना भूल है, 
रँगभरे लिबास पहन के कांटे बनते फूल है ।। 
--सौरभ

साथ का सुख है जहाँ,
बिछोह का है दुःख वहाँ !
आ भूलकर इन सभी को
साथ चल कुछ दूर तक !!
हो भले न एक मंजिल, 
रास्ता भी एक न हो !
पर इन अँधेरे रास्तों पर ,
कुछ दूर तक तो साथ चल !
बन्द कर यूँ आँकना अब,
और भूलकर ये तर्क सारे !!
कुछ दूर तक तो साथ चल !
---सौरभ
वो' साथी है हर पल, तन्हाई का 'तेरे',
'तू' महफ़िल में 'उसको' कहाँ ढूंढता है ।
---सौरभ---

जी रहा हूँ शायद, 
मरते हुये शहर की तरह ! 
जहां शोर है बहुत मन मे, 
कूलर के खड़खड़ से तेज 
पंखे की झन्नाहट से भी !
घड़ी की टीक टिक से तेज,
सन्नाटे का शोर है, यहाँ !
विच्छेदित आधारों के बीच
अटका मन और भटकता दिमाग,
भूल जाता है सब कुछ !
बेहोशी को नींद मानकर
जी रहा हूँ शायद !
इस शहर की तरह
बेबस और लाचार !
--सौरभ --...क्रमशः

यंग इंडिया की जिद है, 
चाहिए तो चाहिए ॥ 
अब समझौते की पीढ़ी, 
हटो या साथ दो ॥ 
भूमिका चुनो आप अपनी, 
और समय रहते मुक्त हौओ,
अपने मोह और अविश्वास से ॥
साथ ही इन्हें भी करो मुक्त,
अपने अनुभव के बोझ से ॥
यंग इंडिया की जिद है,
इन्हें चाहिए तो चाहिए ॥
इनके जुनून को सलाम,
आईये सीखें हम सब भी,
ख्वाहिश के लिये जिद्दी होना,
बन्द करें सौंपना अधूरा ख्वाब इन्हें,
यंग बने और निर्णय ले ,
खूबसूरत जीवन जीने का ।
यंग इण्डिया ही बदलेगा अब ,
सारा बोझिल रीती रिवाज ।।
क्योंकि यंग इंडिया की जिद है,
इंहे चाहिये तो चाहिए ।  

सुनो, जिन्दगी होती है सांप सीढ़ी के खेल सी, 
साँप के पूंछ के पास ही होती है कोई सीढ़ी ।
इस तरह मिलता रहता है मुआवजा , 
और वक्त परिक्षण करता रहता है,
सीढ़ी के आगे एक और साँप रखकर।।
ऐसे ही हमारे हाथ में पासा देकर,
नियति खेलती रहती है खेल जिंदगी का ।।
--सौरभ

सुबह से शाम तक हम,
जिस्म को ढोते जाते हैं,
इतने समझौतों पे जीते हैं,
कि मर जाते हैं ॥
ये ज़िंदगी खेल महज,
आलोचना-समर्थन का नहीं,
इतने नाराजगी मे रहते हैं,
कि बिखर जाते हैं॥
साथ हँसना मकसद है ज़िंदगी का,
हम फिर भी रोते जाते हैं,
इतने बेचैनी मे जीते हैं,
कि हँस भी नहीं पाते हैं॥
ये हकीकत और इल्म का नशा,
हमें बेबस सा करता जाता है,
इतने बेरुखी से जीते हैं,
कि दिल छ्लक जाता है॥
चलो खुद से जरा रूबरू होलें अब हम,
जो जैसा,उसे वैसे ही समझते जाते हैं,
आओ हँस कर हम ऐसे जीते हैं,
कि अब सँवरते जाते हैं॥
---सौरभ
सब पुछते हैं हमसे, 
तुम्हें उनकी फिक्र क्यों है, 
सच सच कहो क्या तुमको,
उनसे मोहब्बत है ? 
क्या क्या बताएं उनको, 
कितना सुनाये तुमको,
हम हो चुके हैं राख
कबके बने हैं भस्म ॥
हमें उनकी फिक्र यूं हैं,
टूटे न ख्वाब किसी का,
पूरा हो ख्वाब उनका,
मासूम हँसी वो उनकी,
मुझे अपनी याद दिलाती ,
शायद ये मोहब्बत है,
शायद ये बेरुखी है,
शायद ये दिल्लगी है,
शायद ये कुछ नहीं है॥
----सौरभ

पहचान करोगे बोलो कैसे, 
आंसू और मुस्कान की , 
हँस-हँस के जब आँसू निकले, 
रो -रो के मुस्कान भी ॥ 
----पहचान करोगे बोलो ,,, 
भले कहो तुम्हें लाख फिकर है,
धड़कन के सम्मान की ,
पहचान करोगे बोलो कैसे,
पाकीजा अरमान की ॥
---- ----पहचान करोगे बोलो ,,,
पहले सूली पर टांगोगे,
फिर झुकोगे सजदे मे ,
पहचान करोगे बोलो ऐसे,
कब तलक खुदा- इंसान की ॥
--- ----पहचान करोगे बोलो ,,,
---सौरभ

अब खुद पर यकीन कम है,
और "उस" पर यकीन ज्यादा, 
तो कैसे भला मैं कर दूँ,
'फिर' खुद से कोई 'वादा',,
----सौरभ---

जिसे काम समझ कर हम, करते रहे ताउम्र, 
अब वो सुना रहे कि वो कोई काम ही न था ।।
--सौरभ

मुक्तक 2

सीखा दो तुम,मुझे भी
ये तरीका प्यार करने का,
उसी को याद करना भी,
उसी को भूल जाना भी।।
उसी को चाहते रहना , 
उसी से छुपाना भी ।
उसी के याद में रोना ,
उसी को न बताना भी ।।
सीखा दो तुम मुझे भी ...
कभी कहना उसी को जां,
कभी उससे मुकरना भी ।।
कभी हौले कदम से साथ,
कभी आगे निकलना भी ।।
कभी लगना गले उससे,
कभी दामन छुड़ाना भी ।।
सिखा दो तुम मुझे भी,
ये तरीका प्यार करने का।।

मुकद्दर हँस रही है फिर,
उसे ही छीनकर मुझसे ।
जिसे उसने लिखा न था,
कभी किस्मत में मेरे तक ।।
गुमां फिर हो गया उसको,
हमारे अश्क़ देखकर।
रुला डाला है एक इंसा,
महज एक ख्वाब तोड़कर ।।
न समझी है न समझेगी ,
"तू" ताकत इनसानो की ।
इन्होंने टूट कर सीखा,
हुनर है फिर सँवरने का ।।
महज तू ख्वाब तोड़े है,
मिटाके इनकी हसरत को,
नमूने ये खुदा के हैं,
रूहानी सी तबियत है ।
खुदा के घर से आने से,
खुदा के घर को जाने तक,
महज ख्वाबो के बुनने का,
ये सब व्यापार करते हैं ।।
--सौरभ
उन्हें यूं बेवजह खोना,
हमें बेचैन करता है,
कि ज़िंदगी यूं हमें क्यों,
हर घड़ी मजबूर करती है।
ये बिखरे हुये से सच,
हमें अपने से लगते हैं,
कि ज़िंदगी यूं हमें फिर क्यों,
भटकने को,यहाँ मजबूर करती है॥
----सौरभ

नहीं है जंग कोई तुझसे,
न कोई जीत हार है ।
मेरा हमराज है साथी तू,
मेरा तू परिवार है॥
नहीं है अब जिरह कोई,
न कुछ भी आर पार है ।
मेरा साथी है यारा तू ,
मेरा तू आधार है॥
नहीं है जंग कोई तुझसे,
न कोई जीत हार है,,
--सौरभ क्रमशः

मैं खो गया हूँ कहीं,अपनी बनाई दुनिया में, 
ए खुदा अब मुझे तू, मुझसे आजाद कर दे ।
--सौरभ

"उसने" ही जब हमको,इस काबिल नहीं समझा..
बेवजह हुनर का अपने,बखान क्या करें हम..

चालाक मानते हो खुद को गर मुझसे,
तो करने दो मुझे कुछ गलतियाँ ।
और गर मानते हो मुझे खुद से बेहतर,
तो कुछ सीख लो मुझसे ।
अगर जलते हो मुझसे तो,
तो उसका कोई इलाज नहीं ।
अब तुमको बुझाने को,
रोक सकता अपनी परवाज नहीं ।।
रखो थोड़ा धीरज और भरोसा,
बुरा या अच्छा होगा जो मेरे साथ,
वो महज निर्णय औ मेरा चयन होगा,
उसे अपनाते देखो मुझे,गुनगुनाते हुए।।
****** सौरभ----***

बेफिक्र हँसी लुटा चूका,
तू अब भी मगर है खुश नहीं । 
आ सम्भाल ले अब तो मुझे,
मेरा अपना है तू गैर नहीं ।
-सौरभ

उसके मासूमियत का इससे,
बढ़कर सबूत क्या हो.
मिलती है सजा मुझको,
ख़ुशी से झूमता वो है।।
-सौरभ

चलो तकदीर को कभी अपनी,
ऐसे भी चिढ़ाया जाये, 
रातों में रो के खूब, 
दिन में मुस्कुराया जाये।। 
--सौरभ

चल आइने के सामने कभी,
जरा खुद से भी माफ़ी मांग ले, 
ज़माने को खुश करने में तूने,
दिल अपना ही बहुत दुखाया है।।

तेरे सब ख्वाब पूरे हों, यही ख़्वाहिश है अब मेरी॥
रहे कायम तेरी मुस्कान, बस इतनी ही दुआ मेरी ॥ 
----सौरभ
यूँ तो तेरे “वजूद” से मुझको,
कभी इनकार नहीं । 
तेरी "बन्दगी” ही करता रहूँ,
ये भी मुझे स्वीकार नहीं..
------सौरभ
खुशबु’ सा होने की,
सीख ऐसे पायी..
फूलों और काँटों ने,
जब की है बेवफाई...
---सौरभ--

तर्क था विज्ञान था, भावना का ज्ञान था,
किन्तु अर्जुनसम मुझमें बहुत अज्ञान था!
कृष्ण होंगे पुरुषरूप इतना ही मुझे भान था,
नारी "कृष्ण" के रूप से मैं पूर्णतः अंजान था !
हे नारी कृष्ण तुम यहां बनते खिलौने स्वयम् हो,
राम की मर्यादा के रक्षक भी यहाँ तुम स्वयम् हो,
तुम प्रेम हो तुम धैर्य हो,अमृत सुधा के सागर हो,
इस जिंदगी के महा समर में फिर भला क्यों मौन हो ?
हे कृष्ण नारी रूप में तुम सबसे सबल सबसे प्रखर,
हे अमृत सुधा!इस अकिंचन का तुम्हें शत शत नमन ।।
--सौरभ
ख्वाब में भी भागते हैं , हम यहां बेचैन से,
ऐ जिंदगी तूने हमे कैसा मुसाफिर बना दिया !!
क्यों छीन ली हर अदा,अहले वफ़ा, सुकून सब,
एक गाँव की तलाश थी, तूने शहर बना दिया !
ऐ जिंदगी तूने हमे कैसा मुसाफिर बना दिया।,,,,
--सौरभ

तुझमें गुरुर का ये , 
हमने ही बीज डाला। 
कभी प्यार से ही तुझको, 
खुदा कहा था हमने।।
--,सौरभ

मुक्तक

कई सच अभी बाकी हैं,
आजमाने के लिए ॥ 
कुछ झूठ तो बचा लें,
मुस्कुराने के लिए ॥ 
सच बोलने से अक्सर,
जब चोट लगती हो ।
क्यों न कहें कुछ झूठ,
जख्म सहलाने के लिए॥
ये सच का ज्ञान हमको,
निरुत्तर ही कर देता,
आओ कहें कुछ झूठ,
ख्वाब बचाने के लिए॥
-सौरभ


तुम्हारे वार को सहके भी, 
जो मुस्कुराता है,
बड़ा नादाँ है अब भी वो,
जो प्यार ऐसे जताता है!
--सौरभ--


संकल्पों का दौर गुजर चुका,
अब विकल्पों की बारी है,
“दुख का” जीवन नाम नहीं,
यह तो एक फुलवारी है ॥
रुक रुक कर चलने का अब,
तो चलन नही है प्रचलन में,
जितने वक्त भी संग चलो,
अब वो जीवन ही उपवन है॥
एक बिन्दु पर रुके जो तुम,
और गहरे मे भी उतर गए,
पर प्यासे फिर भी रहोगे तुम,
जल/जीवन स्तर नीचे खिसक गए।
दुख जीवन का सार भले हो,
सुख उद्देश्य है जीवन का,
विकल्प आजमा के देखो,
मिलेगा मोल संकल्पों का ॥

[धर्म वो जो मुक्त करे ]
- सौरभ

छुपाने की आदत हमने, 
बचपन से सीखा खुद ही, 
इसने ही हमको छोटा, 
बहुत छोटा बना दिया ॥ 
------सौरभ

मैं इस लिए हूँ हल्का (खुश) ,
तू इसलिए है भारी(दुःख)....
मुझे भूलने की लत है,
तुझे याद की बीमारी....
--सौरभ

दिल मे उतरने का, 
पूछो जो मुझसे रास्ता, 
मासूम सी हंसी वो,
बेफिक्र खिलखिलाहट । 
गुस्ताख़ सी शरारत, 
ख्वाबों की एक चाहत ।
प्यारी सी हो एक ख़्वाहिश,
जीवन बने इबादत ॥
भोली सी मोहब्बत का,
इतना ही फ़साना है,
सिमटे तो है एक दरिया,
फैले तो है जमाना ॥
---- सौरभ

क्षेपक

टुकड़े किए तो पहले, 
खुद के हजार हमने, 
फिर हरेक मे तुझे ही, 
तलाशते रहे हैं हम ॥ 
बदले हैं रूप हमने, 
पाने का गुमा भी हमको,
तुझे खोने की याद आते,
भटकते हैं अरसे हम ॥
---सौरभ


तेरे "करम" हैं ऐसे,
"उसकी" मेहर है मुझपे,
मैं डूबता भी हूँ तो,
दरिया उछाल देता ।।

सबको "भरम' यहाँ है,
मोहब्बत को जानने की,
हँसते ही तुझे देखूं,वो
जुमला उछाल देता ।।
लगता है कभी ऐसा,
वो तोड़ देगा अब तो,
पर पास आके फिर से,
यूँ भी सम्भाल देता ।।
--सौरभ

जो समझा नही अब तक,
वही समझा रहा हूँ मैं, 
गला ये सूखता जाता, 
मगर फिर गा रहा हूँ मैं ॥ 
तुम्हारे आँख मे तिनका,
गया है, जो मोहब्बत का ॥
ये किस्सा दर्द का गाके,
तुम्हें बहला रहा हूँ मैं॥
-सौरभ
मुझे बर्बाद करने का, 
दिया तुझको भी पूरा हक, 
नही है प्यार मुझे तुझसे , 
कभी ऐसा नही कहना ॥ 
--सौरभ--

गम है !

तेरे जाने का गम है ! 
टूटन है ! घुटन भी है ! 
फिर भी, बेवजह न मुस्कुराए, 
तो बोल कैसे जिये अभी ! 
तेरे जैसा न कोई था कभी । 
और न है, अभी भी ।
फिर भी न गुनगुनाएँ,
तो बोल कैसे जिये अभी ।
तू मुझे भूलने को कहता,
मैं सबको भूल बैठा हूँ ।
फिर भी, न धर्म निभाएँ,
तो बोल कैसे जिये अभी ।
बहुत आसान है कह दूँ ,
तुम्हारी फिक्र है मुझको ।
तेरे यादों के साये से,
लिपटे हैं हम अभी भी,
फिर भी, न पुछे कौन है तू ,
तो बोल कैसे जिये अभी ।
------सौरभ