Monday, February 22, 2016

प्रेम की करुण कथा !

इस सन्दर्भ को देखकर  आप सोच रहे होंगे की कुछ दिलचस्प लिखा होगा. तो आप सही हैं। यह दिलचस्प ही है। प्रेमियों की करुण-कथा है यह उनकी व्यथा है और उन सभी दिलवालों की भी जो दिमाग से ज्यादा  दिल से सोचते हैं।
                            " कल मैंने अखबार में 'खाप पंचायत "  के बारे में पढ़ा......"
अब आप ही बताओ क्या यह संभव है कि  पहले किसी से आप मिलों  तो उस से उसका नाम, गाँव, पता, के साथ ही गोत्र जाति और धर्म भी पूछ लो और फिर दिल को इजाजत दो की वो धडके। 
ग़ालिब ने लिखा की " ये मोहब्बत है क्या बस इतना समझ लीजिये , एक आग का दरिया है , और डूब के जाना है"। ये खाप पंचायत वाले वही आग का दरिया के विभिन्न  रूपों में से एक  है।
खैर इन सबको छोडिये मैं आता हूँ असली मुद्दे पे ! 
अपने अध्ययन कल में मैंने  प्रेमियों का खूब गहराई से अध्ययन किया(ऐसे समय ये दुर्घटना खूब होती है) और आज भी करता हूँ। मैं जानना चाहता  था( और हूँ) की ये कैसे होता है और क्यों/?
   दुनिया को जानने के दो तरीके हो सकते हैं - पहला दिमाग वाला जो तार्किक आधार पे निर्णय लेता है और दूसरा दिल वाला । जो तर्क, ज्ञान कुछ नहीं जानता वो तो बस समझ जाता है(कभी कभी तो शब्द ही नहीं होते की अपने एहसास को समझया जा सके दूसरों को)। ईश्वर ने यदि तार्किक(वैज्ञानिक ) रूप से इस दुनिया का निर्माण किया होगा तो दिल के तरीके से ही उसको समझने का उससे रूबरू होने का रास्ता बनाया होगा.....
  मानव अपने  जीवन में आधार खोजता रहता है। ये उसकी कमजोरी है या मज़बूरी ! ये तो पता नहीं! बचपन से वो माँ-बाप पे आधारित होता है। अपने भाई-बहन, दोस्तों से वो प्यार पाता है। प्रारंभ  में वो केवल प्यार पाता है।  लेकिन धीरे -धीरे उसमे ये समझ विकसित होती है की प्यार के कुछ नियम होते हैं उसूल होते हैं।  प्यार पाना और देना दोनों अवश्यक है। इस प्रकार प्रेम सशर्त होता है। अपने हम उम्रों के साथ ये एहसास वो कर सकता (लेता) है। फिर जीवन का वो बसंत काल आता है जब उसे हर वस्तु प्यारी लगने लगती है। किसी से कोई शिकायत नहीं होती। पूरी दुनिया खुश और मासूम दिखती है।  इसी काल को प्रेम काल कहते हैं। बड़ा ही नाजुक दौर होता है यह ! अभिभावक के साथ साथ उस व्यक्ति विशेष  के लिए भी। लेकिन कल्पनाये और सपने तो पानी के बुलबुले हैं जो कभी भी टूट सकते हैं। और यही होता भी है। 
...................और फिर संसार के कठोर यथार्त से उनका  सामना होता है। उनके  सभी सपने कल्पनाये बिखर जाते हैं। यह हर बार होता है क्यों? मैं कारण आज तक नहीं जान पाया। अभी भी संतोष जनक जवाब ढूंढ रहा हूँ। कुछ इसे नियति मान के खामोश हो जाते हैं और कुछ क्रांति का बिगुल बजा देते हैं। शायद ..इसे ही  जवानी कहते हैं। जब व्यक्ति सबका ख्याल रखना चाहता है लेकिन ये हो नहीं पाता और इसका दोष वो स्वयम  को देने लगता है। ऐसे समय में उसे जरुरत होती है अपनों की ! उनके निस्वार्थ सहयोग की, उनके हिम्मत की। ........लेकिन कभी कभी ये संभव नहीं हो पाता और नतीजा एक मानसिक रोगी या जीवन से पलायन करने वाला कोई आत्महंता ! 
          बुजुर्गों ने हमें बताया  की समाज में व्यभिचार रोकने के लिए ये अवश्यक है की हम ऐसे कड़े नियम बनाये ताकि कुछ लोग सामाजिक संरचना को क्षति न पहुंचा सकें। यदि ऐसा होने दिया तो एक ही गोत्र में विवाह होने से पीढ़िया बर्बाद हो जाएँगी। (वैज्ञानिक कारण ,इन लोगों का अपना ही होता है। इन लोगों ने उत्परिवर्तन तो जाना नहीं। )
                         बड़े समझदार लोग हैं ये! अपनी हस्ती का कुछ पता नहीं(क्यों जी रहे हैं क्यों मर रहे है। ) और दुनिया, समाज को बचाने का नाटक चल रहा है। मुझे बड़ा ताज्जुब होता है की क्या ये कभी आईना  नहीं देखते या कभी अपने - आप से नजर नहीं मिलाते। और अगर मिलाते हैं तो अभी तक सत्य का दर्शन नहीं कर सके । कैसी माया है यह  या केवल हठधर्मिता है। मैं तो इन्हें "सांस्कृतिक आतंकवादी" शब्द से अलंकृत करना चाहूँगा। ये लोग प्रेमी युगलो को  इज्जत /धर्म के नाम पर अपने  तुच्छ विचारों और अहंकार की तुष्टि के  लिए जिन्दा  जला देते हैं या फिर उनका जीवन नारकीय बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ते। 
          दो प्यार करने वालों के लिए ये नया नहीं है।  जो प्यार करने वाले हुयें हैं, उन्हें इसी तरह सताया गया या मार दिया गया। कमाल ये है की शरीर को व्यक्ति समझने की भूल करने वाले ये ठेकेदार  बार बार ऐसा  करते  आ रहे हैं। और विडम्बना यह है कि समाज इसे मौन स्वीकृति दे रहा है। 
                 मनु के स्मृति में क्या है या था ? ये अब महतवपूर्ण नहीं रह गया है। ये उसे जमाने की बात हो सकती है। किन्तु जो स्मृति मानव को सम्मान नही  दे सकती, ऐसी स्मृतियों को जला देना चाहिए। ऐसे स्मृतियों का केवल एक समाधान है विस्मृति और कुछ नहीं। 
कबीर, तुलसी, मीरा आदि संतों ने प्रेम का गुण गया। सूफियों ने तो विधिवत मोहब्बत के गीत गए और खुदा को माशूका कहा। कबीर ने स्वयं को ईश्वर की पत्नी के रूप में स्वीकार किया ।  हमारे देश में भक्ति के लिए तो बड़ा ऊँचा स्थान है  लेकिन प्यार के लिए तो कोई  नहीं। भक्ति और प्रेम दो अलग अलग सिद्धान्त  बना दिए गए हैं।  प्रेम को  तो केवल कामुकता और स्त्री/पुरुष  लोलुपता का नाम देके बदनाम किया  जाता रहा  है। 
           धर्म जिसका अर्थ है जीवन जीने का तरीकाऔर जो संसार का  आधार है। जो सिखाता है पहले इन्सान बनो बाद में किसी धर्म जाति मजहब या प्रान्त के। पहले स्वयं को जानो ! जीयो और जीने दो। वैसा व्यव्हार करो जैसा खुद के लिए चाहते हो। मुझे तो अपना संविधान  पूर्णतया अध्यात्मिक लगता है। और  प्रेमियों की स्वंत्रता का घोषणापत्र सा प्रतीत होता है। 
सत्य तो यह है की इन सभी तर्कों में कुछ रखा  नही है। लेकिन कभी कभी शर्म आती है खुद पे कि मैं उस देश का वासी  हूँ,  जहाँ आज भी लोग इन्सान के रूप में इंसानों को सम्मान नहीं देते बल्कि जाति, मजहब, और धर्म के आधार पे उनका शोषण करने का प्रयास करते हैं। उनके साथ घटिया व्यव्हार करते हैं .(घटिया इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि इससे बुरा शब्द मेरे पास नहीं है)। जो भी सम्वेदनशील हैं वे जानते हैं की प्रेम ही खुदा है। वो  सब-कुछ है। सामाजिक मर्यादा की रक्षा के  और भी तरीके हो सकते हैं लेकिन अपनी झूठी  शान के लिए किसी मासूम की जान ले लेना कभी भी न्यायसंगत नहीं हो सकता।
         वास्तव में हम मोह को प्यार समझके , अपने बच्चों को बचाने के लिए उनके साथ कड़ा रुख अपनाते हैं। 
हो सकता हैं की बड़े सही हों,  लेकिन जब ये युवा  अपने निर्णय के दुष्परिणाम  झेलने को तैयार हैं,  तो फिर उनका जीवन उन्हें  अपने तरीके से जीने की इजाजत मिलनी ही चाहिए। 
बहुत दुःख है भाई इन प्रेमियों के पास ! वो बेचारे तो दुनिया से लड़े की अपने आप से। सामाजिक,मानसिक, आर्थिक प्रत्येक मोर्चे पे उन्हें अकेला छोड़ दिया जाता है। तब या तो उनके आंसू सुख जाते हैं या वे संवेदनशीलता लुप्त हो जाती है। उनमें क़ुरबानी देने की आदत डाल दी जाती है।  वे एक मशीने में बदल जाते हैं और उनकी उन्मुक्त हंसी,  उनका खिलंदड़पन  और मस्ती  ख़त्म हो जाती है। और फिर वही चक्र चलता रहता है। मशीने बनती रहती है। 
            ऐसे मे हमारा कर्तव्य है की कोई प्रेमी जोड़ा यदि वो आपको सही लगे तो उसका कम से कम जितना हो सके समर्थन जरुर करें। और अपने देश को उत्तम ,संवेदनशील बनाने में सहयोग करें। 

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