Monday, February 22, 2016

आत्म विश्लेषण

सहज बनाने मे सबको हम, अक्सर क्यों बह जाते हैं ? 
जुबां फिसलती है अपनी और मन मे हम पछताते हैं।। 
           ,,,,,   सहज बनाने मे सबको हम, अक्सर क्यों बह जाते हैं ? 
जब तक गूँजे कोलाहल, हंसने और हंसाने का, 
घूम घूम के बच्चों सा हम खुद पर क्यों इतराते हैं ? 
..... सहज बनाने मे सबको हम अक्सर क्यों बह जाते हैं ,, 

हर बार एक ही प्रण लेते हैं, सबके दिल बहलाने का,
फिर भी अनजाने ही क्यों गलती अक्सर दोहराते हैं?
------ सहज बनाने मे सबको हम, अक्सर क्यों बह जाते हैं ?

बुद्धिमान तो बहुत मिले पर मीत मिला न ऐसा कोई,
निष्ठा समझे परे शब्द के, जो भी हम तुतलाते हैं !!

-- सहज बनाने मे सबको हम, अक्सर क्यों बह जाते हैं ?
जुबां फिसलती है अपनी और मन मे हम पछताते हैं।।
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-----सौरभ

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