Monday, February 22, 2016

प्रोत्साहन !

वो जब भी मुझसे मिलती है अपने साथ एक पोटली लाती है और मुझे सौप देती है। उस पोटली मे कई तरीके के छोटे बड़े समस्याएँ और पहेलियाँ होती है। मैं उन्हे धीरे धीरे सुलझाने की कोशिश करने लगता हूँ । गंभीर और एकाग्र होकर! वो बैठे बैठे मुसकुराती है, कई बार उन्हें सुलझाने मे मदद भी करती है ! मैं समझ नहीं पाता विद्वान वो है या मैं ? जब भी उससे पूछता तुम इतने सवाल कहाँ से लाती हो तो हँस के टाल देती। मुझे व्यस्त देखकर उसे न जाने कौन सी खुशी और संतोष मिलता है। 
आज समझता हूँ उसका प्यार और जताने का वो तरीका ! मुझे मेरे स्तर से उतरोरत्तर ऊपर उठाना एक मात्र उद्देश्य रहा है उसके जीवन का ! मुझे भटकने से बचाने के लिए वो ये सब पहेलियाँ रचती है। वो मुझे नियमों से बंधकर पत्थर होने से बचाना चाहती है। प्रेम सचमुच पत्थर होने से बचा देता है। हमें मजबूत बनाता है प्रेम । टूटने और चिट्क्ने से बचाता है प्रेम । इतना कोमल और भावपूर्ण बना देता है कि कुछ अंजान किस्से भी पलकें भिगो देते हैं। और इस तरह से समाज हमें भविष्य की अनदेखी समस्याओं का धैर्यपूर्वक समाधान खोजने के लिए तैयार करता है।

चलना अगर अभीष्ट है,तो आओ चल पड़े,
मंजिल मिलेंगे राह में, हर पल नए नए ॥
खुद पर यकीन रखो,नफरत से बचो तुम,
संबल मिलेंगे राह में, तुमको नये नए ॥

---सौरभ

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