Monday, February 22, 2016

मौका परस्त भावनाएं !

अपनी भावना को हमने खुद ही स्वार्थ की गोद मे सुविधा की चादर ओढा के सुला दिया है।हम स्वयं को कुछ सीखने की बेचैनी से बचाना चाहते हैं । सारे विचार तथ्य सब सामने पड़े होते हैं, लेकिन हम स्वतंत्र चिंतन से बचते हैं। हम पहले निर्णय करते हैं और फिर तथ्यों का अपने हिसाब से प्रयोग करते हैं। सरासर दोष हमारा है। हम इतने आराम तलब या स्वभाव से सामंत हो गए हैं कि विचारों तक मे मौलिकता लाने कि जहमत नहीं उठाते और सीधे सीधे बहुत ही सरलता से औरों को दोष देना शुरू करते हैं । बहुत आसान होता है किसी भी पक्ष मे खड़े हो जाना। लेकिन सोचना और समझना और सीखना आपका व्यक्तित्व बनाता है। याद रखिए विचारों कि मौलिकता ही आपकी पूंजी है। उसे मत खोईए। कृपया कोशिश कीजिये और खुद के अंदर धैर्य पैदा कीजिये सीखने की, सोचने की और समझने की ! चैनल और मीडिया को दोष देना बेवकूफी है। हमारे पास चुनने का अधिकार है। हमारे पास इतने न्यूज चैनल हैं लेकिन हम वही सुनना पसंद करते हैं जो हमे सुविधाजनक लगता है। हो सके तो अपने मन के प्रतिकूल विचारों को भी सुनिए । यकीन मानिए आपकी भावना समाधान खोजने लगेगी और आप विनाश के जगह सृजन करने मे यकीन करने लगेंगे। 

उम्मीद नहीं है फिर भी इल्तिजा है एक इतनी, 

सोचो,समझो,सीखो, फिर भूमिका चुनो अपनी॥


--सौरभ

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