Wednesday, February 24, 2016

प्रायश्चित

पिछले कुछ दिनों से व्यक्तिगत एवं सामाजिक विक्षोभो के कारण मन अधीर है। जागृत अवस्था मे दिमाग का नियंत्रण मजबूत होने के कारण यह नुकसान नहीं पहुंचा पता। किन्तु सुप्त अवस्था मे मन के द्वारा किया गया विद्रोह अनियंत्रित होकर तनाव और अनिद्रा तक पहुँच जाता है।
      कल रात मैंने संभवतः स्वप्न देखा कि मैं एक परीक्षा देने गया हूँ। वहाँ कुछ परिचित चेहरे भी हैं। स्नातक के दिनों के मुसकुराते चेहरे। मैं अपना रोल नंबर दीवार पर लगी लिस्ट मे नहीं पता हूँ। लेकिन अपनी गणना के आधार पर अपने संभावित सीट पर पहुंचता हूँ। वहाँ जाकर कक्ष निरीक्षक से पूछता हूँ कि मेरी सीट यहीं होनी चाहिए । उनका बेतुका सा बयान आता है कि आप परीक्षा नहीं दे सकते । साथ ही उनकी व्यक्तिगत राय है कि उपलब्ध सूचना के आधार पर मैं नौकरीसुदा हूँ, और उनके हिसाब से किसी नौकरी वाले व्यक्ति को परीक्षा देने का हक नहीं। वो तमतमाते हुये कहते हैं कि मुझे ये हक नहीं कि मैं किसी और का हक छिने। मैं अचंभित सा उन्हें संविधान के प्रावधानों के बारे मे बताता हूँ। मेरे परिचित मुसकुराती आंखे मुझे शांत होने को कहती हैं, ताकि वो लोग अपना काम कर सकें। मैं उनसे क्षमा मांग के प्रोकटोर के कमरे की तरफ भागता हूँ। वहाँ कुछ मेरी जैसी स्थिति वाले विद्यार्थी पहले से उपस्थित थे। सभी को एक ही जवाब मिलता है सर वैस्ट हैं, प्रतीक्षा कीजिये। हम सब उद्विग्न हैं। खीजकर सब नारा लगाने लगते हैं हमे अधिकार चाहिए। इस अधैर्य का परिणाम होता है कि परीक्षा नियंत्रक पुलिस से मामला शांत करने को कहते हैं। इसी बीच कुछ विरोधी छत्र गुट बना के आ जाते हैं। और भीड़ को ललकारने लगते हैं । माँ-बहन से संबन्धित उन्मादी वक्तव्य दोनों ओर से दिये जाने लगते हैं। मुझे झुरझुरी सी होती है। मैं सीने के ऊपर से तेजी से साँसे लेने लगता हूँ । मेरी साँसे तेज और अनियंत्रित होती जाती हैं, मैं चीखने लगता हूँ। दोनों पक्षों के अपने तर्क हैं, मुझे एक पक्ष को चुनना ही होगा।  मेरे पीछे खड़े छात्र मुझे इंसानियत कि दुहाई संविधान कि दुहाई देने लगते हैं। हाथापाई शुरू हो जाती है। मेरे सामने एक कमजोर इंसान दिखता है। मैं उसका गला पकड़ लेता हूँ। उसकी आँखें सफ़ेद होने लगती हैं। मुझे लगता है इसका खून ही मुझे शांत और तृप्त कर सकता हूँ । मुझे कान मे एक फुसफुसाहट सुनाई देती है। बस थोड़ा और फिर ये हमारे बीच। अचानक मुसकुराती आँखों का ख्याल आते ही मुझे झटका सा लगता है और मैं पीछे हटता हूँ। मेरी साँसे अभी भी तेज हैं। अंखे खुल जाती हैं । बहुत देर तक कोशिश करने के बाद साँसे अब धीरे धीरे गहरी हो रहीं हैं। मैं प्रायश्चित कर रहा हूँ। एकांत मे उकड़ू बैठा भरे आंखो से अपने खालीपन को तराश रहा हूँ ।
मन के किसी कोने से जयशंकर प्रसाद कि पंक्ति गूँजती है।  :
हिमालय के उत्तुंग शिखर पर बैठ शीला कि शीतल छांव,
सजल नयन से देख रहा था वो भीषण जल प्रवाह॥
और मैं समान्य बने रहने के निर्णय पर चलने का प्रयास करता हूँ।   

              -----सौरभ   

No comments: