Monday, February 22, 2016

क्षेपक !

निःस्पृह कैसे रह लेते हो,
अक्सर तुम मेरी यादों से,
निःस्वार्थ प्रेम तो समझ गए, 
जरा निःस्पृह प्रेम समझा दो !

न अब शिकायत तुझसे है,न ही मोहब्बत है ,
बाकि नहीं कर्तव्य कोई,यह अजनबीयत है !! 

तुमसे नहीं है माँगा खैरात में मोहब्बत, 
जो है हक़ हमारा,उतना हमे लौटा दो !! 

जब हुआ है मुकर्रर,जताने का प्यार, एक दिन 
तो क्यों न इसको हम और खूबसूरत बना दें !! 

करना है एक वादा खुद अपने आप से अब,
माफ़ी मिलेगी तुझको,गैरों के गुनाहों की !! 


मिलके किसी को हमसे,अफसोस न हो कभी, 
इतनी सी मेहर हमपे, कर देना मेरे मौला !! 


न जाने तुमपे क्यों है क्रोध आता, मुझे कुछ दिनों से
न माने दिल मेरा क्यों तुम भी केवल वक्त के मोहरे ,,
शिकायत वक्त से करनी तो जाने कब से छोड़ी है
गिला तो है मुझे बस तेरे कुछ होने कुछ कहने से!


भटक रहा है अभी वो बेहतर की तलाश में, 
खुला है द्वार उसके लौटने के आस में !! 
बेचैन आँखें जाने क्यों स्वीकार नहीं करतीं, 
कि रहने लगा हैं वो कहीं बेहतर निवास में !! 


शिकायत करूँ कैसे कि गौर न किया हमपे, 
खुदा हमारा उलझा ,कुछ गाँठे सुलझाने में !! 
अब रंज नहीं कोई, अपने खुदा से हमको , 
कितनी मुश्किलों से वो भी, गुजरता होगा रोज!!


मेरा भी दामन आखिर, छोटा ही रह गया, 
तेरे आँखों में थी नमी,मैं फिर भी सो गया !! े
मेरे भी पास आखिर अल्फाज न रहे, 
जो भी थे जज्बात वो आँखों से बह गए !!


--सौरभ

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