Tuesday, August 30, 2016

अगर तुम्हारी “खोज” हूँ मैं,,,,,


अगर तुम्हारी “खोज” हूँ मैं,

तो तुम मेरी “उपलब्धि” हो।

चंद कदम जो साथ चलें,

वो जीवन की संपत्ति हो ॥ 

                अगर तुम्हारी खोज हूँ मैं ....

तुमसे मैंने कितना सीखा,

शब्द नहीं जो बयां करूँ ।

धन्यवाद से पूरी न हो,

तुम ऐसी परिलब्धि हो॥

                 अगर तुम्हारी खोज हूँ .....

जो ख्वाब हमने हैं देखे

संग मे पूरे करने को ।

उन ख्वाबों के भित्तिचित्र तुम,

हृदयांकित एक प्रसिद्धि हो ॥ 

          अगर तुम्हारी खोज हूँ ....

  

Wednesday, August 24, 2016

muktak 4

चीखो ! और ज़ोर से चीखो, 
जानता हूँ चीखने से कुछ नहीं होगा, 
पर चीखो जरूर उस भविष्य के लिए, 
पूरी ताकत से चीखो । 
कोशिश करो बदलने की, 
हर दागदार परंपरा को,
चीखना ही शायद समाधान दे अब,
और बचा ले जाए स्वाभिमान तुम्हारा,,
इसलिए चीखो और ज़ोर से चीखो ।
अपने लिए नहीं तो भविष्य के लिए
चीखो ! और ज़ोर से चीखो ॥
----सौरभ


समझने लगा हूँ तुमको,
परेशान इसलिए हूँ,
जो न समझता होता, 
तो मैं भी मस्त रहता ।। 
-सौरभ


कई सच अभी बाकी हैं,
आजमाने के लिए ॥ 
कुछ झूठ तो बचा लें,
मुस्कुराने के लिए ॥ 
सच बोलने से अक्सर,
जब चोट लगती हो ।
क्यों न कहें कुछ झूठ,
जख्म सहलाने के लिए॥
ये सच का ज्ञान हमको,
निरुत्तर ही कर देता,
आओ कहें कुछ झूठ,
ख्वाब बचाने के लिए॥
-सौरभ

तेरे "करम" हैं ऐसे,
"उसकी" मेहर है मुझपे,
मैं डूबता भी हूँ तो,
दरिया उछाल देता ।।

सबको "भरम' यहाँ है,
मोहब्बत को जानने की,
हँसते ही तुझे देखूं,वो
जुमला उछाल देता ।।
लगता है कभी ऐसा,
वो तोड़ देगा अब तो,
पर पास आके फिर से,
यूँ भी सम्भाल देता ।।
--सौरभ

मुक्तक 3

आ जिंदगी को अपनी, 
कुछ इस तरह से जी लें, 
रुकसत के वक्त दिल में,
कोई आरजू ना हो ।। 
--सौरभ

मुस्कान" का तेरे सेवक हूँ , 
मुझे आता है कुछ और नहीं !
हँसता हुआ तुझे देखूं बस,
मुझे भाता है कुछ और नहीं !! 
--सौरभ

लड़ सकता हूँ जमाने से, तन्हा ही मैं मगर, 
तेरा साथ जो होता मेरे, तो खुद पे नाज होता 🙏🏻
--सौरभ

मैं जब तक खड़ा मुस्कुराता रहा,,
तुझको न मैं रास आता रहा,,
जब से बना ली है रोनी सी सूरत,,
तेरे चेहरे पर रौनक सा आता रहा..
जब से खड़ा मुस्कुराता रहा.....
--------सौरभ---

रोने और हंसने को अलग समझना भूल है, 
रँगभरे लिबास पहन के कांटे बनते फूल है ।। 
--सौरभ

साथ का सुख है जहाँ,
बिछोह का है दुःख वहाँ !
आ भूलकर इन सभी को
साथ चल कुछ दूर तक !!
हो भले न एक मंजिल, 
रास्ता भी एक न हो !
पर इन अँधेरे रास्तों पर ,
कुछ दूर तक तो साथ चल !
बन्द कर यूँ आँकना अब,
और भूलकर ये तर्क सारे !!
कुछ दूर तक तो साथ चल !
---सौरभ
वो' साथी है हर पल, तन्हाई का 'तेरे',
'तू' महफ़िल में 'उसको' कहाँ ढूंढता है ।
---सौरभ---

जी रहा हूँ शायद, 
मरते हुये शहर की तरह ! 
जहां शोर है बहुत मन मे, 
कूलर के खड़खड़ से तेज 
पंखे की झन्नाहट से भी !
घड़ी की टीक टिक से तेज,
सन्नाटे का शोर है, यहाँ !
विच्छेदित आधारों के बीच
अटका मन और भटकता दिमाग,
भूल जाता है सब कुछ !
बेहोशी को नींद मानकर
जी रहा हूँ शायद !
इस शहर की तरह
बेबस और लाचार !
--सौरभ --...क्रमशः

यंग इंडिया की जिद है, 
चाहिए तो चाहिए ॥ 
अब समझौते की पीढ़ी, 
हटो या साथ दो ॥ 
भूमिका चुनो आप अपनी, 
और समय रहते मुक्त हौओ,
अपने मोह और अविश्वास से ॥
साथ ही इन्हें भी करो मुक्त,
अपने अनुभव के बोझ से ॥
यंग इंडिया की जिद है,
इन्हें चाहिए तो चाहिए ॥
इनके जुनून को सलाम,
आईये सीखें हम सब भी,
ख्वाहिश के लिये जिद्दी होना,
बन्द करें सौंपना अधूरा ख्वाब इन्हें,
यंग बने और निर्णय ले ,
खूबसूरत जीवन जीने का ।
यंग इण्डिया ही बदलेगा अब ,
सारा बोझिल रीती रिवाज ।।
क्योंकि यंग इंडिया की जिद है,
इंहे चाहिये तो चाहिए ।  

सुनो, जिन्दगी होती है सांप सीढ़ी के खेल सी, 
साँप के पूंछ के पास ही होती है कोई सीढ़ी ।
इस तरह मिलता रहता है मुआवजा , 
और वक्त परिक्षण करता रहता है,
सीढ़ी के आगे एक और साँप रखकर।।
ऐसे ही हमारे हाथ में पासा देकर,
नियति खेलती रहती है खेल जिंदगी का ।।
--सौरभ

सुबह से शाम तक हम,
जिस्म को ढोते जाते हैं,
इतने समझौतों पे जीते हैं,
कि मर जाते हैं ॥
ये ज़िंदगी खेल महज,
आलोचना-समर्थन का नहीं,
इतने नाराजगी मे रहते हैं,
कि बिखर जाते हैं॥
साथ हँसना मकसद है ज़िंदगी का,
हम फिर भी रोते जाते हैं,
इतने बेचैनी मे जीते हैं,
कि हँस भी नहीं पाते हैं॥
ये हकीकत और इल्म का नशा,
हमें बेबस सा करता जाता है,
इतने बेरुखी से जीते हैं,
कि दिल छ्लक जाता है॥
चलो खुद से जरा रूबरू होलें अब हम,
जो जैसा,उसे वैसे ही समझते जाते हैं,
आओ हँस कर हम ऐसे जीते हैं,
कि अब सँवरते जाते हैं॥
---सौरभ
सब पुछते हैं हमसे, 
तुम्हें उनकी फिक्र क्यों है, 
सच सच कहो क्या तुमको,
उनसे मोहब्बत है ? 
क्या क्या बताएं उनको, 
कितना सुनाये तुमको,
हम हो चुके हैं राख
कबके बने हैं भस्म ॥
हमें उनकी फिक्र यूं हैं,
टूटे न ख्वाब किसी का,
पूरा हो ख्वाब उनका,
मासूम हँसी वो उनकी,
मुझे अपनी याद दिलाती ,
शायद ये मोहब्बत है,
शायद ये बेरुखी है,
शायद ये दिल्लगी है,
शायद ये कुछ नहीं है॥
----सौरभ

पहचान करोगे बोलो कैसे, 
आंसू और मुस्कान की , 
हँस-हँस के जब आँसू निकले, 
रो -रो के मुस्कान भी ॥ 
----पहचान करोगे बोलो ,,, 
भले कहो तुम्हें लाख फिकर है,
धड़कन के सम्मान की ,
पहचान करोगे बोलो कैसे,
पाकीजा अरमान की ॥
---- ----पहचान करोगे बोलो ,,,
पहले सूली पर टांगोगे,
फिर झुकोगे सजदे मे ,
पहचान करोगे बोलो ऐसे,
कब तलक खुदा- इंसान की ॥
--- ----पहचान करोगे बोलो ,,,
---सौरभ

अब खुद पर यकीन कम है,
और "उस" पर यकीन ज्यादा, 
तो कैसे भला मैं कर दूँ,
'फिर' खुद से कोई 'वादा',,
----सौरभ---

जिसे काम समझ कर हम, करते रहे ताउम्र, 
अब वो सुना रहे कि वो कोई काम ही न था ।।
--सौरभ

मुक्तक 2

सीखा दो तुम,मुझे भी
ये तरीका प्यार करने का,
उसी को याद करना भी,
उसी को भूल जाना भी।।
उसी को चाहते रहना , 
उसी से छुपाना भी ।
उसी के याद में रोना ,
उसी को न बताना भी ।।
सीखा दो तुम मुझे भी ...
कभी कहना उसी को जां,
कभी उससे मुकरना भी ।।
कभी हौले कदम से साथ,
कभी आगे निकलना भी ।।
कभी लगना गले उससे,
कभी दामन छुड़ाना भी ।।
सिखा दो तुम मुझे भी,
ये तरीका प्यार करने का।।

मुकद्दर हँस रही है फिर,
उसे ही छीनकर मुझसे ।
जिसे उसने लिखा न था,
कभी किस्मत में मेरे तक ।।
गुमां फिर हो गया उसको,
हमारे अश्क़ देखकर।
रुला डाला है एक इंसा,
महज एक ख्वाब तोड़कर ।।
न समझी है न समझेगी ,
"तू" ताकत इनसानो की ।
इन्होंने टूट कर सीखा,
हुनर है फिर सँवरने का ।।
महज तू ख्वाब तोड़े है,
मिटाके इनकी हसरत को,
नमूने ये खुदा के हैं,
रूहानी सी तबियत है ।
खुदा के घर से आने से,
खुदा के घर को जाने तक,
महज ख्वाबो के बुनने का,
ये सब व्यापार करते हैं ।।
--सौरभ
उन्हें यूं बेवजह खोना,
हमें बेचैन करता है,
कि ज़िंदगी यूं हमें क्यों,
हर घड़ी मजबूर करती है।
ये बिखरे हुये से सच,
हमें अपने से लगते हैं,
कि ज़िंदगी यूं हमें फिर क्यों,
भटकने को,यहाँ मजबूर करती है॥
----सौरभ

नहीं है जंग कोई तुझसे,
न कोई जीत हार है ।
मेरा हमराज है साथी तू,
मेरा तू परिवार है॥
नहीं है अब जिरह कोई,
न कुछ भी आर पार है ।
मेरा साथी है यारा तू ,
मेरा तू आधार है॥
नहीं है जंग कोई तुझसे,
न कोई जीत हार है,,
--सौरभ क्रमशः

मैं खो गया हूँ कहीं,अपनी बनाई दुनिया में, 
ए खुदा अब मुझे तू, मुझसे आजाद कर दे ।
--सौरभ

"उसने" ही जब हमको,इस काबिल नहीं समझा..
बेवजह हुनर का अपने,बखान क्या करें हम..

चालाक मानते हो खुद को गर मुझसे,
तो करने दो मुझे कुछ गलतियाँ ।
और गर मानते हो मुझे खुद से बेहतर,
तो कुछ सीख लो मुझसे ।
अगर जलते हो मुझसे तो,
तो उसका कोई इलाज नहीं ।
अब तुमको बुझाने को,
रोक सकता अपनी परवाज नहीं ।।
रखो थोड़ा धीरज और भरोसा,
बुरा या अच्छा होगा जो मेरे साथ,
वो महज निर्णय औ मेरा चयन होगा,
उसे अपनाते देखो मुझे,गुनगुनाते हुए।।
****** सौरभ----***

बेफिक्र हँसी लुटा चूका,
तू अब भी मगर है खुश नहीं । 
आ सम्भाल ले अब तो मुझे,
मेरा अपना है तू गैर नहीं ।
-सौरभ

उसके मासूमियत का इससे,
बढ़कर सबूत क्या हो.
मिलती है सजा मुझको,
ख़ुशी से झूमता वो है।।
-सौरभ

चलो तकदीर को कभी अपनी,
ऐसे भी चिढ़ाया जाये, 
रातों में रो के खूब, 
दिन में मुस्कुराया जाये।। 
--सौरभ

चल आइने के सामने कभी,
जरा खुद से भी माफ़ी मांग ले, 
ज़माने को खुश करने में तूने,
दिल अपना ही बहुत दुखाया है।।

तेरे सब ख्वाब पूरे हों, यही ख़्वाहिश है अब मेरी॥
रहे कायम तेरी मुस्कान, बस इतनी ही दुआ मेरी ॥ 
----सौरभ
यूँ तो तेरे “वजूद” से मुझको,
कभी इनकार नहीं । 
तेरी "बन्दगी” ही करता रहूँ,
ये भी मुझे स्वीकार नहीं..
------सौरभ
खुशबु’ सा होने की,
सीख ऐसे पायी..
फूलों और काँटों ने,
जब की है बेवफाई...
---सौरभ--

तर्क था विज्ञान था, भावना का ज्ञान था,
किन्तु अर्जुनसम मुझमें बहुत अज्ञान था!
कृष्ण होंगे पुरुषरूप इतना ही मुझे भान था,
नारी "कृष्ण" के रूप से मैं पूर्णतः अंजान था !
हे नारी कृष्ण तुम यहां बनते खिलौने स्वयम् हो,
राम की मर्यादा के रक्षक भी यहाँ तुम स्वयम् हो,
तुम प्रेम हो तुम धैर्य हो,अमृत सुधा के सागर हो,
इस जिंदगी के महा समर में फिर भला क्यों मौन हो ?
हे कृष्ण नारी रूप में तुम सबसे सबल सबसे प्रखर,
हे अमृत सुधा!इस अकिंचन का तुम्हें शत शत नमन ।।
--सौरभ
ख्वाब में भी भागते हैं , हम यहां बेचैन से,
ऐ जिंदगी तूने हमे कैसा मुसाफिर बना दिया !!
क्यों छीन ली हर अदा,अहले वफ़ा, सुकून सब,
एक गाँव की तलाश थी, तूने शहर बना दिया !
ऐ जिंदगी तूने हमे कैसा मुसाफिर बना दिया।,,,,
--सौरभ

तुझमें गुरुर का ये , 
हमने ही बीज डाला। 
कभी प्यार से ही तुझको, 
खुदा कहा था हमने।।
--,सौरभ

मुक्तक

कई सच अभी बाकी हैं,
आजमाने के लिए ॥ 
कुछ झूठ तो बचा लें,
मुस्कुराने के लिए ॥ 
सच बोलने से अक्सर,
जब चोट लगती हो ।
क्यों न कहें कुछ झूठ,
जख्म सहलाने के लिए॥
ये सच का ज्ञान हमको,
निरुत्तर ही कर देता,
आओ कहें कुछ झूठ,
ख्वाब बचाने के लिए॥
-सौरभ


तुम्हारे वार को सहके भी, 
जो मुस्कुराता है,
बड़ा नादाँ है अब भी वो,
जो प्यार ऐसे जताता है!
--सौरभ--


संकल्पों का दौर गुजर चुका,
अब विकल्पों की बारी है,
“दुख का” जीवन नाम नहीं,
यह तो एक फुलवारी है ॥
रुक रुक कर चलने का अब,
तो चलन नही है प्रचलन में,
जितने वक्त भी संग चलो,
अब वो जीवन ही उपवन है॥
एक बिन्दु पर रुके जो तुम,
और गहरे मे भी उतर गए,
पर प्यासे फिर भी रहोगे तुम,
जल/जीवन स्तर नीचे खिसक गए।
दुख जीवन का सार भले हो,
सुख उद्देश्य है जीवन का,
विकल्प आजमा के देखो,
मिलेगा मोल संकल्पों का ॥

[धर्म वो जो मुक्त करे ]
- सौरभ

छुपाने की आदत हमने, 
बचपन से सीखा खुद ही, 
इसने ही हमको छोटा, 
बहुत छोटा बना दिया ॥ 
------सौरभ

मैं इस लिए हूँ हल्का (खुश) ,
तू इसलिए है भारी(दुःख)....
मुझे भूलने की लत है,
तुझे याद की बीमारी....
--सौरभ

दिल मे उतरने का, 
पूछो जो मुझसे रास्ता, 
मासूम सी हंसी वो,
बेफिक्र खिलखिलाहट । 
गुस्ताख़ सी शरारत, 
ख्वाबों की एक चाहत ।
प्यारी सी हो एक ख़्वाहिश,
जीवन बने इबादत ॥
भोली सी मोहब्बत का,
इतना ही फ़साना है,
सिमटे तो है एक दरिया,
फैले तो है जमाना ॥
---- सौरभ

क्षेपक

टुकड़े किए तो पहले, 
खुद के हजार हमने, 
फिर हरेक मे तुझे ही, 
तलाशते रहे हैं हम ॥ 
बदले हैं रूप हमने, 
पाने का गुमा भी हमको,
तुझे खोने की याद आते,
भटकते हैं अरसे हम ॥
---सौरभ


तेरे "करम" हैं ऐसे,
"उसकी" मेहर है मुझपे,
मैं डूबता भी हूँ तो,
दरिया उछाल देता ।।

सबको "भरम' यहाँ है,
मोहब्बत को जानने की,
हँसते ही तुझे देखूं,वो
जुमला उछाल देता ।।
लगता है कभी ऐसा,
वो तोड़ देगा अब तो,
पर पास आके फिर से,
यूँ भी सम्भाल देता ।।
--सौरभ

जो समझा नही अब तक,
वही समझा रहा हूँ मैं, 
गला ये सूखता जाता, 
मगर फिर गा रहा हूँ मैं ॥ 
तुम्हारे आँख मे तिनका,
गया है, जो मोहब्बत का ॥
ये किस्सा दर्द का गाके,
तुम्हें बहला रहा हूँ मैं॥
-सौरभ
मुझे बर्बाद करने का, 
दिया तुझको भी पूरा हक, 
नही है प्यार मुझे तुझसे , 
कभी ऐसा नही कहना ॥ 
--सौरभ--

गम है !

तेरे जाने का गम है ! 
टूटन है ! घुटन भी है ! 
फिर भी, बेवजह न मुस्कुराए, 
तो बोल कैसे जिये अभी ! 
तेरे जैसा न कोई था कभी । 
और न है, अभी भी ।
फिर भी न गुनगुनाएँ,
तो बोल कैसे जिये अभी ।
तू मुझे भूलने को कहता,
मैं सबको भूल बैठा हूँ ।
फिर भी, न धर्म निभाएँ,
तो बोल कैसे जिये अभी ।
बहुत आसान है कह दूँ ,
तुम्हारी फिक्र है मुझको ।
तेरे यादों के साये से,
लिपटे हैं हम अभी भी,
फिर भी, न पुछे कौन है तू ,
तो बोल कैसे जिये अभी ।
------सौरभ

Wednesday, February 24, 2016

प्रायश्चित

पिछले कुछ दिनों से व्यक्तिगत एवं सामाजिक विक्षोभो के कारण मन अधीर है। जागृत अवस्था मे दिमाग का नियंत्रण मजबूत होने के कारण यह नुकसान नहीं पहुंचा पता। किन्तु सुप्त अवस्था मे मन के द्वारा किया गया विद्रोह अनियंत्रित होकर तनाव और अनिद्रा तक पहुँच जाता है।
      कल रात मैंने संभवतः स्वप्न देखा कि मैं एक परीक्षा देने गया हूँ। वहाँ कुछ परिचित चेहरे भी हैं। स्नातक के दिनों के मुसकुराते चेहरे। मैं अपना रोल नंबर दीवार पर लगी लिस्ट मे नहीं पता हूँ। लेकिन अपनी गणना के आधार पर अपने संभावित सीट पर पहुंचता हूँ। वहाँ जाकर कक्ष निरीक्षक से पूछता हूँ कि मेरी सीट यहीं होनी चाहिए । उनका बेतुका सा बयान आता है कि आप परीक्षा नहीं दे सकते । साथ ही उनकी व्यक्तिगत राय है कि उपलब्ध सूचना के आधार पर मैं नौकरीसुदा हूँ, और उनके हिसाब से किसी नौकरी वाले व्यक्ति को परीक्षा देने का हक नहीं। वो तमतमाते हुये कहते हैं कि मुझे ये हक नहीं कि मैं किसी और का हक छिने। मैं अचंभित सा उन्हें संविधान के प्रावधानों के बारे मे बताता हूँ। मेरे परिचित मुसकुराती आंखे मुझे शांत होने को कहती हैं, ताकि वो लोग अपना काम कर सकें। मैं उनसे क्षमा मांग के प्रोकटोर के कमरे की तरफ भागता हूँ। वहाँ कुछ मेरी जैसी स्थिति वाले विद्यार्थी पहले से उपस्थित थे। सभी को एक ही जवाब मिलता है सर वैस्ट हैं, प्रतीक्षा कीजिये। हम सब उद्विग्न हैं। खीजकर सब नारा लगाने लगते हैं हमे अधिकार चाहिए। इस अधैर्य का परिणाम होता है कि परीक्षा नियंत्रक पुलिस से मामला शांत करने को कहते हैं। इसी बीच कुछ विरोधी छत्र गुट बना के आ जाते हैं। और भीड़ को ललकारने लगते हैं । माँ-बहन से संबन्धित उन्मादी वक्तव्य दोनों ओर से दिये जाने लगते हैं। मुझे झुरझुरी सी होती है। मैं सीने के ऊपर से तेजी से साँसे लेने लगता हूँ । मेरी साँसे तेज और अनियंत्रित होती जाती हैं, मैं चीखने लगता हूँ। दोनों पक्षों के अपने तर्क हैं, मुझे एक पक्ष को चुनना ही होगा।  मेरे पीछे खड़े छात्र मुझे इंसानियत कि दुहाई संविधान कि दुहाई देने लगते हैं। हाथापाई शुरू हो जाती है। मेरे सामने एक कमजोर इंसान दिखता है। मैं उसका गला पकड़ लेता हूँ। उसकी आँखें सफ़ेद होने लगती हैं। मुझे लगता है इसका खून ही मुझे शांत और तृप्त कर सकता हूँ । मुझे कान मे एक फुसफुसाहट सुनाई देती है। बस थोड़ा और फिर ये हमारे बीच। अचानक मुसकुराती आँखों का ख्याल आते ही मुझे झटका सा लगता है और मैं पीछे हटता हूँ। मेरी साँसे अभी भी तेज हैं। अंखे खुल जाती हैं । बहुत देर तक कोशिश करने के बाद साँसे अब धीरे धीरे गहरी हो रहीं हैं। मैं प्रायश्चित कर रहा हूँ। एकांत मे उकड़ू बैठा भरे आंखो से अपने खालीपन को तराश रहा हूँ ।
मन के किसी कोने से जयशंकर प्रसाद कि पंक्ति गूँजती है।  :
हिमालय के उत्तुंग शिखर पर बैठ शीला कि शीतल छांव,
सजल नयन से देख रहा था वो भीषण जल प्रवाह॥
और मैं समान्य बने रहने के निर्णय पर चलने का प्रयास करता हूँ।   

              -----सौरभ   

Tuesday, February 23, 2016

मिजाज अपना अपना !


तुमने मुझे अच्छा कहा,

तो बुरा उसने कह दिया। 

फिर किसी ने हमला बोला,

किसी ने तमाशा बना दिया ।

क्या महज हममे है बाकि

इतनी सी अब समझदारी ।।

तू जो पसन्द न मुझे तो तेरी

हर पसन्द से नफरत भारी ।।

कुछ नहीं है हासिल इससे,

इतना समझो यार मेरे तुम । 

सबकी अपनी ही थकान है,

सबके अलग झमेले हैं। 

सो बन्द करो,मत कोसो 

अब इनको तुम ! 

सबकी यहां अपनी दुकान है 

सबके अपने मेले हैं ।। 



--सौरभ

Monday, February 22, 2016

प्रेम की करुण कथा !

इस सन्दर्भ को देखकर  आप सोच रहे होंगे की कुछ दिलचस्प लिखा होगा. तो आप सही हैं। यह दिलचस्प ही है। प्रेमियों की करुण-कथा है यह उनकी व्यथा है और उन सभी दिलवालों की भी जो दिमाग से ज्यादा  दिल से सोचते हैं।
                            " कल मैंने अखबार में 'खाप पंचायत "  के बारे में पढ़ा......"
अब आप ही बताओ क्या यह संभव है कि  पहले किसी से आप मिलों  तो उस से उसका नाम, गाँव, पता, के साथ ही गोत्र जाति और धर्म भी पूछ लो और फिर दिल को इजाजत दो की वो धडके। 
ग़ालिब ने लिखा की " ये मोहब्बत है क्या बस इतना समझ लीजिये , एक आग का दरिया है , और डूब के जाना है"। ये खाप पंचायत वाले वही आग का दरिया के विभिन्न  रूपों में से एक  है।
खैर इन सबको छोडिये मैं आता हूँ असली मुद्दे पे ! 
अपने अध्ययन कल में मैंने  प्रेमियों का खूब गहराई से अध्ययन किया(ऐसे समय ये दुर्घटना खूब होती है) और आज भी करता हूँ। मैं जानना चाहता  था( और हूँ) की ये कैसे होता है और क्यों/?
   दुनिया को जानने के दो तरीके हो सकते हैं - पहला दिमाग वाला जो तार्किक आधार पे निर्णय लेता है और दूसरा दिल वाला । जो तर्क, ज्ञान कुछ नहीं जानता वो तो बस समझ जाता है(कभी कभी तो शब्द ही नहीं होते की अपने एहसास को समझया जा सके दूसरों को)। ईश्वर ने यदि तार्किक(वैज्ञानिक ) रूप से इस दुनिया का निर्माण किया होगा तो दिल के तरीके से ही उसको समझने का उससे रूबरू होने का रास्ता बनाया होगा.....
  मानव अपने  जीवन में आधार खोजता रहता है। ये उसकी कमजोरी है या मज़बूरी ! ये तो पता नहीं! बचपन से वो माँ-बाप पे आधारित होता है। अपने भाई-बहन, दोस्तों से वो प्यार पाता है। प्रारंभ  में वो केवल प्यार पाता है।  लेकिन धीरे -धीरे उसमे ये समझ विकसित होती है की प्यार के कुछ नियम होते हैं उसूल होते हैं।  प्यार पाना और देना दोनों अवश्यक है। इस प्रकार प्रेम सशर्त होता है। अपने हम उम्रों के साथ ये एहसास वो कर सकता (लेता) है। फिर जीवन का वो बसंत काल आता है जब उसे हर वस्तु प्यारी लगने लगती है। किसी से कोई शिकायत नहीं होती। पूरी दुनिया खुश और मासूम दिखती है।  इसी काल को प्रेम काल कहते हैं। बड़ा ही नाजुक दौर होता है यह ! अभिभावक के साथ साथ उस व्यक्ति विशेष  के लिए भी। लेकिन कल्पनाये और सपने तो पानी के बुलबुले हैं जो कभी भी टूट सकते हैं। और यही होता भी है। 
...................और फिर संसार के कठोर यथार्त से उनका  सामना होता है। उनके  सभी सपने कल्पनाये बिखर जाते हैं। यह हर बार होता है क्यों? मैं कारण आज तक नहीं जान पाया। अभी भी संतोष जनक जवाब ढूंढ रहा हूँ। कुछ इसे नियति मान के खामोश हो जाते हैं और कुछ क्रांति का बिगुल बजा देते हैं। शायद ..इसे ही  जवानी कहते हैं। जब व्यक्ति सबका ख्याल रखना चाहता है लेकिन ये हो नहीं पाता और इसका दोष वो स्वयम  को देने लगता है। ऐसे समय में उसे जरुरत होती है अपनों की ! उनके निस्वार्थ सहयोग की, उनके हिम्मत की। ........लेकिन कभी कभी ये संभव नहीं हो पाता और नतीजा एक मानसिक रोगी या जीवन से पलायन करने वाला कोई आत्महंता ! 
          बुजुर्गों ने हमें बताया  की समाज में व्यभिचार रोकने के लिए ये अवश्यक है की हम ऐसे कड़े नियम बनाये ताकि कुछ लोग सामाजिक संरचना को क्षति न पहुंचा सकें। यदि ऐसा होने दिया तो एक ही गोत्र में विवाह होने से पीढ़िया बर्बाद हो जाएँगी। (वैज्ञानिक कारण ,इन लोगों का अपना ही होता है। इन लोगों ने उत्परिवर्तन तो जाना नहीं। )
                         बड़े समझदार लोग हैं ये! अपनी हस्ती का कुछ पता नहीं(क्यों जी रहे हैं क्यों मर रहे है। ) और दुनिया, समाज को बचाने का नाटक चल रहा है। मुझे बड़ा ताज्जुब होता है की क्या ये कभी आईना  नहीं देखते या कभी अपने - आप से नजर नहीं मिलाते। और अगर मिलाते हैं तो अभी तक सत्य का दर्शन नहीं कर सके । कैसी माया है यह  या केवल हठधर्मिता है। मैं तो इन्हें "सांस्कृतिक आतंकवादी" शब्द से अलंकृत करना चाहूँगा। ये लोग प्रेमी युगलो को  इज्जत /धर्म के नाम पर अपने  तुच्छ विचारों और अहंकार की तुष्टि के  लिए जिन्दा  जला देते हैं या फिर उनका जीवन नारकीय बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ते। 
          दो प्यार करने वालों के लिए ये नया नहीं है।  जो प्यार करने वाले हुयें हैं, उन्हें इसी तरह सताया गया या मार दिया गया। कमाल ये है की शरीर को व्यक्ति समझने की भूल करने वाले ये ठेकेदार  बार बार ऐसा  करते  आ रहे हैं। और विडम्बना यह है कि समाज इसे मौन स्वीकृति दे रहा है। 
                 मनु के स्मृति में क्या है या था ? ये अब महतवपूर्ण नहीं रह गया है। ये उसे जमाने की बात हो सकती है। किन्तु जो स्मृति मानव को सम्मान नही  दे सकती, ऐसी स्मृतियों को जला देना चाहिए। ऐसे स्मृतियों का केवल एक समाधान है विस्मृति और कुछ नहीं। 
कबीर, तुलसी, मीरा आदि संतों ने प्रेम का गुण गया। सूफियों ने तो विधिवत मोहब्बत के गीत गए और खुदा को माशूका कहा। कबीर ने स्वयं को ईश्वर की पत्नी के रूप में स्वीकार किया ।  हमारे देश में भक्ति के लिए तो बड़ा ऊँचा स्थान है  लेकिन प्यार के लिए तो कोई  नहीं। भक्ति और प्रेम दो अलग अलग सिद्धान्त  बना दिए गए हैं।  प्रेम को  तो केवल कामुकता और स्त्री/पुरुष  लोलुपता का नाम देके बदनाम किया  जाता रहा  है। 
           धर्म जिसका अर्थ है जीवन जीने का तरीकाऔर जो संसार का  आधार है। जो सिखाता है पहले इन्सान बनो बाद में किसी धर्म जाति मजहब या प्रान्त के। पहले स्वयं को जानो ! जीयो और जीने दो। वैसा व्यव्हार करो जैसा खुद के लिए चाहते हो। मुझे तो अपना संविधान  पूर्णतया अध्यात्मिक लगता है। और  प्रेमियों की स्वंत्रता का घोषणापत्र सा प्रतीत होता है। 
सत्य तो यह है की इन सभी तर्कों में कुछ रखा  नही है। लेकिन कभी कभी शर्म आती है खुद पे कि मैं उस देश का वासी  हूँ,  जहाँ आज भी लोग इन्सान के रूप में इंसानों को सम्मान नहीं देते बल्कि जाति, मजहब, और धर्म के आधार पे उनका शोषण करने का प्रयास करते हैं। उनके साथ घटिया व्यव्हार करते हैं .(घटिया इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि इससे बुरा शब्द मेरे पास नहीं है)। जो भी सम्वेदनशील हैं वे जानते हैं की प्रेम ही खुदा है। वो  सब-कुछ है। सामाजिक मर्यादा की रक्षा के  और भी तरीके हो सकते हैं लेकिन अपनी झूठी  शान के लिए किसी मासूम की जान ले लेना कभी भी न्यायसंगत नहीं हो सकता।
         वास्तव में हम मोह को प्यार समझके , अपने बच्चों को बचाने के लिए उनके साथ कड़ा रुख अपनाते हैं। 
हो सकता हैं की बड़े सही हों,  लेकिन जब ये युवा  अपने निर्णय के दुष्परिणाम  झेलने को तैयार हैं,  तो फिर उनका जीवन उन्हें  अपने तरीके से जीने की इजाजत मिलनी ही चाहिए। 
बहुत दुःख है भाई इन प्रेमियों के पास ! वो बेचारे तो दुनिया से लड़े की अपने आप से। सामाजिक,मानसिक, आर्थिक प्रत्येक मोर्चे पे उन्हें अकेला छोड़ दिया जाता है। तब या तो उनके आंसू सुख जाते हैं या वे संवेदनशीलता लुप्त हो जाती है। उनमें क़ुरबानी देने की आदत डाल दी जाती है।  वे एक मशीने में बदल जाते हैं और उनकी उन्मुक्त हंसी,  उनका खिलंदड़पन  और मस्ती  ख़त्म हो जाती है। और फिर वही चक्र चलता रहता है। मशीने बनती रहती है। 
            ऐसे मे हमारा कर्तव्य है की कोई प्रेमी जोड़ा यदि वो आपको सही लगे तो उसका कम से कम जितना हो सके समर्थन जरुर करें। और अपने देश को उत्तम ,संवेदनशील बनाने में सहयोग करें। 

टेढ़े होने के फायदे !

ये माना टेढ़े होने के फायदे बहुत हैं, 
अच्छाई और समझदारी के कायदे बहुत हैं !!
इंसान अगर हो तो नफरत न बोवों तुम, 
आतंक से लड़ने के अभी भी रास्ते बहुत हैं !! 
........ ये माना टेढ़े होने के फायदे बहुत हैं ...

यूं तो मेरा भी जी करता कोई हथियार उठा लूँ,
चीखूँ बहुत ज़ोर और कोई नारा उछालू ,
पर, नारों से हकीकत के फासले बहुत हैं!!
बेहतर रास्ते तलाशने के फायदे बहुत हैं !

.... ये माना टेढ़े होने के फायदे बहुत हैं !! ....... क्रमशः
-----सौरभ ॥

इल्जाम पुरुष होने का !

हम पे इल्जाम है बहुत से ,
एक अपराध पुरुष शरीर होना भी है !
सन्देह के घेरे से हमें मुक्त नही किया जाता कभी,
और सहजता से मढ़ दिए जाते हैं अनगिनत लांछन
हमारे मूल स्वाभाव में भर देते हैं अपराध बोध ! 
हमारे अनुभूतियों को नाटकीयता का नाम देते हो!!
मानिये की जिंदगी की गाड़ी के दूसरे पहिये हैं हम
हम नहीं दोहराना चाहते इतिहास,
बदलना चाहते हैं खुद को ।
पर क्या वो मौका नही दिया जा सकता हमें !
क्या हम एक उम्मीदों की दुनिया नहीं बना सकते,
शोषण और तिरस्कार के बिना ।  smile emoticon
गलती सुधारने का तरीका जीवन में गलती न करने का संकल्प नहीं हुआ करता,
ये होता है एक दूसरे को गलती करने की आजादी देना ! एक दूसरे को सुनने और समझने की कोशिश करना smile emoticon
अजनबी बनकर हम घृणा तो रोक सकते हैं लेकिन मोहब्बत पैदा नहीं कर सकते smile emoticon
---सौरभ

बेबसी

दो फूल तुम्हें अर्पण करने का न अधिकार हमारा,
जीवन से तेरे दूर हुआ मैं,खुश हो संसार तुम्हारा


--दो फूल ..


एक बार हुआ था इस जीवन में, तुमने मुझे संवारा,
एकतरफा निर्णय लेकर ही तुम ओझल हुए दुबारा !!

--दो फूल तुम्हें.... 
                      --सौरभ 

आत्म विश्लेषण

सहज बनाने मे सबको हम, अक्सर क्यों बह जाते हैं ? 
जुबां फिसलती है अपनी और मन मे हम पछताते हैं।। 
           ,,,,,   सहज बनाने मे सबको हम, अक्सर क्यों बह जाते हैं ? 
जब तक गूँजे कोलाहल, हंसने और हंसाने का, 
घूम घूम के बच्चों सा हम खुद पर क्यों इतराते हैं ? 
..... सहज बनाने मे सबको हम अक्सर क्यों बह जाते हैं ,, 

हर बार एक ही प्रण लेते हैं, सबके दिल बहलाने का,
फिर भी अनजाने ही क्यों गलती अक्सर दोहराते हैं?
------ सहज बनाने मे सबको हम, अक्सर क्यों बह जाते हैं ?

बुद्धिमान तो बहुत मिले पर मीत मिला न ऐसा कोई,
निष्ठा समझे परे शब्द के, जो भी हम तुतलाते हैं !!

-- सहज बनाने मे सबको हम, अक्सर क्यों बह जाते हैं ?
जुबां फिसलती है अपनी और मन मे हम पछताते हैं।।
-

-----सौरभ

कृतज्ञता !

आहत बहुत थे हम कभी,
इस जीवन के चक्रव्यूह में,
तुमने कहा मोहब्बत है,
हथियार हमने रख दिये!!
----आहत बहुत थे हम कभी, 
इस जीवन के चक्रव्यूह में,
तुमने कहा इजाजत है ?
सब कवच हमने तज दिये !!
अब बोलते हो फुरसत किसे?
हम निस्पृह हो कर हट लिए !!
----आहत बहुत थे हम कभी,

इस जीवन के चक्रव्यूह में,
--सौरभ .

क्षेपक !

निःस्पृह कैसे रह लेते हो,
अक्सर तुम मेरी यादों से,
निःस्वार्थ प्रेम तो समझ गए, 
जरा निःस्पृह प्रेम समझा दो !

न अब शिकायत तुझसे है,न ही मोहब्बत है ,
बाकि नहीं कर्तव्य कोई,यह अजनबीयत है !! 

तुमसे नहीं है माँगा खैरात में मोहब्बत, 
जो है हक़ हमारा,उतना हमे लौटा दो !! 

जब हुआ है मुकर्रर,जताने का प्यार, एक दिन 
तो क्यों न इसको हम और खूबसूरत बना दें !! 

करना है एक वादा खुद अपने आप से अब,
माफ़ी मिलेगी तुझको,गैरों के गुनाहों की !! 


मिलके किसी को हमसे,अफसोस न हो कभी, 
इतनी सी मेहर हमपे, कर देना मेरे मौला !! 


न जाने तुमपे क्यों है क्रोध आता, मुझे कुछ दिनों से
न माने दिल मेरा क्यों तुम भी केवल वक्त के मोहरे ,,
शिकायत वक्त से करनी तो जाने कब से छोड़ी है
गिला तो है मुझे बस तेरे कुछ होने कुछ कहने से!


भटक रहा है अभी वो बेहतर की तलाश में, 
खुला है द्वार उसके लौटने के आस में !! 
बेचैन आँखें जाने क्यों स्वीकार नहीं करतीं, 
कि रहने लगा हैं वो कहीं बेहतर निवास में !! 


शिकायत करूँ कैसे कि गौर न किया हमपे, 
खुदा हमारा उलझा ,कुछ गाँठे सुलझाने में !! 
अब रंज नहीं कोई, अपने खुदा से हमको , 
कितनी मुश्किलों से वो भी, गुजरता होगा रोज!!


मेरा भी दामन आखिर, छोटा ही रह गया, 
तेरे आँखों में थी नमी,मैं फिर भी सो गया !! े
मेरे भी पास आखिर अल्फाज न रहे, 
जो भी थे जज्बात वो आँखों से बह गए !!


--सौरभ

तेरी याद !

तुम्हारा जिक्र सुनकर क्यों 

सजग हो उठता है यह मन !

जैसे चौंक के जगता हो 


कोई बच्चा गहरी नींद से,!!


दोनों बाहें फैलाकर भागना

चाहता है तेरे यादों की गोद में !!

जितना भूलने की कोशिश करता हूँ

उतना ही जिद में चीखता है जोर से!!,

क्यों यह बच्चा हर दिन के साथ

और बच्चा बनता जाता है !

गोद में लेकर इसे देर रात तक,

फुसलाता हूँ, और यह तेरी यादों से

चिपटा सिसकर कर यूँ ही सो जाता है!
-

--सौरभ 

प्रोत्साहन !

वो जब भी मुझसे मिलती है अपने साथ एक पोटली लाती है और मुझे सौप देती है। उस पोटली मे कई तरीके के छोटे बड़े समस्याएँ और पहेलियाँ होती है। मैं उन्हे धीरे धीरे सुलझाने की कोशिश करने लगता हूँ । गंभीर और एकाग्र होकर! वो बैठे बैठे मुसकुराती है, कई बार उन्हें सुलझाने मे मदद भी करती है ! मैं समझ नहीं पाता विद्वान वो है या मैं ? जब भी उससे पूछता तुम इतने सवाल कहाँ से लाती हो तो हँस के टाल देती। मुझे व्यस्त देखकर उसे न जाने कौन सी खुशी और संतोष मिलता है। 
आज समझता हूँ उसका प्यार और जताने का वो तरीका ! मुझे मेरे स्तर से उतरोरत्तर ऊपर उठाना एक मात्र उद्देश्य रहा है उसके जीवन का ! मुझे भटकने से बचाने के लिए वो ये सब पहेलियाँ रचती है। वो मुझे नियमों से बंधकर पत्थर होने से बचाना चाहती है। प्रेम सचमुच पत्थर होने से बचा देता है। हमें मजबूत बनाता है प्रेम । टूटने और चिट्क्ने से बचाता है प्रेम । इतना कोमल और भावपूर्ण बना देता है कि कुछ अंजान किस्से भी पलकें भिगो देते हैं। और इस तरह से समाज हमें भविष्य की अनदेखी समस्याओं का धैर्यपूर्वक समाधान खोजने के लिए तैयार करता है।

चलना अगर अभीष्ट है,तो आओ चल पड़े,
मंजिल मिलेंगे राह में, हर पल नए नए ॥
खुद पर यकीन रखो,नफरत से बचो तुम,
संबल मिलेंगे राह में, तुमको नये नए ॥

---सौरभ