Tuesday, September 17, 2013

नासमझ प्रेम


तुमने अपने घर पर बात की ?” हम दोनों की शादी की ! उम्म ! बोलोमीरा ने इठलाते हुए अशोक से पूछा,,,.. अशोक ने सकुचाते हुए कहा , ““हाँ ! की थी !मीरा ने अशोक को चूम लिया और जल्दी से पूछा क्या कहा उन्होंने ??..........अशोक धीरे से बोला, “ जैसा तुम ठीक समझो ! “” मीरा ख़ुशी के मारे अशोक से लिपट गयी.......तभी अशोक के मुंह से शादी नहीं हो सकती सुनकर मीरा गिरते गिरते बची और सुनी आँखों से अशोक को देखने लगी.....
मीरा ने अशोक को कायर, धोखेबाज सब कुछ कह दिया...अशोक ने शून्य में देखते हुए केवल इतना ही कह सका, अगर उन्होंने विरोध किया होता तो मैं विद्रोह कर देता......वे मेरी ख़ुशी के लिए समझौते करने को तैयार हो गये...लेकिन उनके चेहरे की चमक धूमिल थी.....वो लाचार से लग रहे थे ......जो मोहब्बत अपने चाहने वालों को बेबस बना दे, वो मुझे कुबूल नही....नहीं ! एक दम नहीं ! 
न तो मीरा को कुछ समझ आ रहा था और न ही अशोक को...दोनों एक दुसरे के आगोश में शांत थे और सयंत भी ! 
ईश्वरीय खेल चालू था....केवल दो जोड़ी आंखे बरश रहीं, जिनके आंसू सारे कायनात को डुबाने को काफी थे......फिर भी ! कुछ नहीं....


 ---------------सौरभ