Tuesday, July 30, 2013

उत्थान या पतन


      विनय ने रीना के हाथों को अपने हाथ में लेकर कहा “सुनो ! मैं तुमसे बहुत प्रेम करता हूँ ! मैं तुम्हारा कृष्ण हूँ और तुम मेरी राधा हो ! “.....रीना ने कहा , “चलो फिर शादी कर लेते हैं “ विनय ने कहा देखो तुम मेरी राधा हो ! तुम प्रेम की देवी हो, प्रेम का लक्ष्य मिलन ही नहीं होता !तुम इतनी स्वार्थी कब से हो गयी....समाज के बंधन नहीं तोड़े जाते...यदि प्रेम किसी को तकलीफ दे तो वो प्रेम सच्चा नहीं हो सकता ...
      रीना ने अपना हाथ झटकते हुए कहा, “सुनो ! प्रेम का अमृत पीने को हर क्षण तैयार रहते हो, किन्तु परिक्षण के “विष” से इतनी दूर...ये माना की प्रेम को विवाह तक पहुँचाने में कुछ अपराध करने होंगे, कुछ प्रचलित मान्यताओं को तोडना होगा....हो सकता है इस अपराध बोध के पश्चाताप के साथ जीना हो, अपनी आने वाली जिन्दगी...लेकिन मुझे “राधा” बनने का कोई शौक नहीं है, सभी राधाओं से कहुंगी मैं, समर्पण से पहले बांध लो इन छलिये कृष्णों को “
      विनय चौंक गया, प्रेम के मार्किट का सबसे बढ़िया देवता, अब उसे उठते सवालों से नहीं बचा पा रहा था,,,,,,,,,,,वो समझ नहीं पा रहा था, इसे वुमेन एम्पावरमेंट कहे, या फिर सामाजिक पतन ! सुविधा अनुसार उसने इसे सामाजिक पतन कहा, और साँस खींचते हुए बोला, तुम समझ ही नहीं पायी कृष्ण को..............छोड़ो मैं चलता हूँ ! रीना मुस्कुरा रही थी...बेवकूफ होने से बचने की ख़ुशी थी शायद उसे ! या फिर कुछ और....

---सौरभ



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