Friday, July 26, 2013

“साथ “


“मेरी कितनी इन्सल्ट होगी ! तुम्हे पता भी है, आज तक कभी मैं हौंडा एकॉर्ड से नीचे (कार) ट्रेवेल नहीं की हूँ...और तुम मुझे इस गन्दी सी सैंट्रो में ले जाने की बात सोच रहे हो...”मेघा “ने एक साँस में विवेक को सब कुछ कह डाला... विवेक चुप सा हो गया....कुछ देर बाद विवेक ने सॉरी बोला ...फिर विवेक ने मेघा से कहा, “चलो न !  कुछ देर कहीं घूम के आते हैं” इससे तुम्हारा मुड शायद ठीक हो जाये......किसी तरह उसने मेघा को सैंट्रो में चलने को राजी कर ही लिया...
मेघा रूठकर खामोश बैठी थी, और विवेक ड्राईविंग कर रहा था....तभी दोनों ने चुनकर देखा और फिर एक दुसरे की तरफ देख कर मुस्कुराने लगे....
“ सामने एक जोड़ा साईकिल से जा रहा था, जिसमे लड़की पीछे की कड़ी सिट पर बैठी थी,गड्ढा आ जाने से दोनों गिर गए...और उठते ही दोनों हंसने लगे...अगला पहिया टेढ़ा हो गया था,,,,उसके बाद भी दोनों एक दुसरे को संभाल रहे थे...और हँसते जा रहे थे..”
विवेक ने धीरे से कहा, “हम लोग बेहतर की चाहत में कमियों को स्वीकारना बंद कर देते हैं, शायद इसलिए ही दुखी रहते हैं.” मेघा ने उसकी तरफ देखते हुए कहा,”सही कहते हो ! कहाँ हम टिन के डिब्बों (कार) के चक्कर में इतनी बड़ी ख़ुशी (साथ होने की ख़ुशी/पास होने की ख़ुशी खो रहे थे) खो रहे थे.......
शादी के बाद पहली बार आज दोनों वास्तव में एक साथ हो पाए थे...

---सौरभ 

1 comment:

Manish Yadav said...

वाह!! भइया!! एकदम सही चीज आप खोज निकाले. हम लोग बेहतर की चाहत में कमियों को स्वीकारना बन्द कर देते हैं.
इसके लिये आपको साधुवाद.. भगवान ऐसे चक्षु बनाये रखे.