Monday, July 22, 2013

प्रायश्चित

जूता पालिश करके रोहन ने जल्दी से पापा के सामने रख दिए, मन में सोच रहा था, जाएँ जल्दी ! आज खूब खेलूँगा...अच्छा होता कल भी पापा नहीं आते, ,खूब खेलता और कोई टोकने वाला भी नहीं होता ! मजा आ जाता ! ये रोज रोज का टोकना, ये पढो, वो पढो, ये खाओ वो खाओ...टीवी मत देखो उससे मत बोलो...सब इन्हीं के हिसाब से चलो...पिता के जाने के बाद, रोहन भागता हुआ सोनू के घर पंहुचा...अबे देर कहाँ कर दी ! अमां यार बाबु जी ! को बाजार जाना था, जूता पालिश कर रहा था, नहीं तो कीच कीच करते और देर हो जाती..
शोर उठा, सोनू के पापा का एक्सीडेंट हो गया है,,,वो नहीं रहे...बेतहाशा भागा सोनू ! रोहन अब मन ही मन पापा के सकुशल वापसी की दुआ करते हुए सोनू के पीछे दौड़ने लगा,,, वहां पापा को खड़े देखकर चिपट गया उनसे.....उसके आंसू बह रहे थे, प्रायश्चित के .....एक पल में कैसे बदल जाती है सोच, कैसे बन जाता है एक नया नजरिया..सब कुछ पहले जैसा रहकर भी कुछ भी पहले जैसा नहीं रहता.....

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