Friday, July 12, 2013

समाधान


      बहुत जिद करने पर महेश ने हिचकते हुए मोनू को मेला ले जाने की बात मान  ली. जब मेले में महेश ने मोनू को को रंग बिरंगे खिलौने को ललचाई आंखो से देखते हुए देखा, तो उसे  अपने अतीत की जाने/अनजाने की गयी गलतियाँ याद आ गयीं। पीड़ा का एक ज्वार सा उठा  जो उसके पूरे वजूद पर छाने लगा । महेश के जेब में कुछ पैसे पड़े थे, उसने हिम्मत करके मोनू से पूछा “बेटा कुछ लोगे ?” मोनू को प्रश्न के साथ ही उत्तर भी मिल जाता है। उसने कहा, “नहीं, पापा! मुझे कुछ नहीं चाहिए।“ जब बच्चे जल्दी समझदार हो जाते हैं, तो दर्द और बढ़ जाता है। महेश ने फिर पूछा, तू कुछ खाता क्यों नहीं?” मोनू बोला, पापा ! मैं यहाँ कुछ खाने के लिए आने की जिद नहीं कर रहा था, बल्कि मुझे कुछ खोजना था। महेश की प्रश्नसूचक दृष्टि बेटे पर टीक गयी.  मोनू ने कहना जारी रखा, मुझे अपनी गरीबी का समाधान ढूंदना था, जिसे अब मैने ढूंढ लिया है पिता ने उत्सुकतावश पूछा, क्या है समाधान?मैं अपनी खुद की दुकान इस मेले मे लगाऊँगा, महेश हैरान रह गया. मोनू ने कहा, “मैं समझ गया हूँ की गरीबी तकदीर से नहीं मिटती बल्कि मेहनत करने से मिटती है।“ आज मेले से लौटकर महेश बहुत खुश था, मोनू मेला जाकर वो सिख गया था जो आज नहीं तो कल मोनू को उस मेले का सबसे बड़ा खरीरदार बना देगा.....
...वो उस पीड़ा से बच जायेगा जो आज महेश ने झेली है....उसकी पलकें आंसुओं का बोझ नहीं संभाल पा रही थीं. उसने सोचा “ये जिन्दगी भी, न ! बड़ी अजीब है, मेला देखना भी सिखा देती है और मेला लगाना भी...” .
       

                                                ---(सौरभ)


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