Wednesday, July 10, 2013

पसंद



क्या खाओगे, नाश्ते में ?, जल्दी बताओ,  अभी बना देती हूँ,, माँ ने रोहित से सुबह उठते ही पूछा! 
जो भी बना दो माँ ! इसमे सोचना क्या है,! रोहित ने जम्हाई लेते हुये कहा।
जो तुम रोज खाती हो, वही मैं भी खा लूँगा...
मैं जो रोज खाती हूँ, वो ! कहते हुये माँ कुछ सोचने लगी..रोहित ने हँसते हुये कहा, हाँ ! माँ ! वही, वो कठौत में तवे से ढकी रोटी है , उस पर नमक, तेल लगा के प्याज के साथ बहुत अच्छा रहेगा..मुझे वही पसंद है.....
माँ ने आंचल से अपनी आंखे पोछते हुये कहा, तू जरा भी नहीं बदला आखिर कब सुधरेगा तू ?
तुम्हारा ही बेटा हूँ, आखिर कितना सुधरु? रोहित ने कहा, और दोनों हंसने लगे। अच्छा, माँ ! रुको ! अभी चाय बनाता हूँ। रोहित ने चाय बनाई और दोनों ने चाय के साथ नमकीन रोटी खाई ! माँ को आज वो रोटी अटक नहीं रही थी,,,,वो तो मन ही मन देवताओं को धन्यवाद दे रही थी, और रोहित को आशीष ‍! और रोहित चाय के साथ अटकती रोटी गटकने लगा, सोचते हुए कि कैसे इन्सान की पसंद/नापसंद अपनों के दुःख-तकलीफ के सापेक्ष निर्मित होती है...

------सौरभ 

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