Saturday, June 22, 2013

टूटता भ्रम...

रमेश ने झिझकते हुए कहा, "आप अपना फोन नम्बर दे दीजिये" जब दिल करेगा बात कर लूँगा" कम से कम आप मेरी ऐसी दोस्त हैं..रीना ने कहा, "लो ये रहा नम्बर,," रमेश ने धीरे से कहा कोई और नम्बर भी अगर हो तो, दे दो. 
..रीना ने तीन नम्बर लिखवा दिए.रमेश  खुश होते हुए बोला, "मतलब मैं आपसे सीधे बात कर सकता हूँ",जब भी काल करूँ,बात हो जाएगी.." ,
 रीना ने कहा, "नहीं!  फोन तो मेरे घर में कई हैं, लेकिन मेरे पति उन्हें बदल बदल के प्रयोग करते हैं...
तो आपका कोई प्राईवेट नम्बर....
फीकी हंसी हँसते हुए उसने कहा, प्राईवेट नंबर.......हमारी पहचान में व्यक्तिगत कुछ नहीं होता..सब उनके साथ ही है...
रमेश भाव विभोर हो गया...उसे लग रहा था, कितना सही है ये सब ! उसने खुश होते हुए कहा, "आप दोनों में कोई दुराव नहीं.कुछ भी व्यक्तिगत नहीं........वाह प्यार हो तो ऐसा !"  रीना के आँखों में आंसू आ गए,,,,,,,,,बार बार पूछने पर उसने खीजते  हुए कहा, "ये प्यार नहीं, शक है,,कमजोरी है " .......शुरू शुरू में सब अच्छा भी लगता था.........लेकिन मैं भी एक इन्सान हूँ...मुझे दोस्त बनाने का हक़ है ! अपने तरीके से जीने का हक़ है...रमेश ने समझाना चाहा....लेकिन बांध टूटने पर सैलाब को रोकना आसान नहीं होता,,,,उसमे सब बह जाता है...सब कुछ...सुबकते हुए रीना ने कहा था, "न जाने क्यों वो हमेशा मेरे फेसबुक का पासवर्ड लेकर चेक करते रहते हैं,,,,मोबाईल नम्बर तक रोज बदल बदल के प्रयोग करते हैं,,,,,,,,,,ताकि किसी और से मैं बात न कर सकूँ"    रमेश ने कहा भी, " वो तुम्हे सुरक्षित रखना चाहते हैं,,,बहुत प्यार करते हैं तुमसे !" तुम शक कर रही हो,..." रीना ने आंसू पोछते हुए कहा, मैं भूल गयी थी कि तुम एक पुरुष हो..." छोड़ो ! और उसने मुस्कुराने का अभिनय पहले की तरह शुरू कर दिया....

  प्रेम ........विश्वास समझता था, जिसे,  ये "संदेह" और "डर" है...
रमेश का  भ्रम टूटने लगा..........जैसे एक नया फलक हो किसी अधूरी तस्वीर का...
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-------------सौरभ ------