Sunday, May 5, 2013

उत्थान ----पतन



एक ‘हुश्ने गुरुर’ में था,
एक ‘गुरुरे ज्ञान’ शिखर पर,,
रस्ते जुदा थे उनके और,,
मंजिल भी अलग अलग ,
क्या हुआ जो भाने लगीं,,
दोनों को एक दूसरे की ऊंचाईयां,, 
वो चाहते थे जानना,,
सचचाईयां एक दूजे की,,
और सिद्ध भी करना,,
एक दुसरे से बेहतर खुद को,,
मिलने की आरजू भी 
जगने लगी जब मन में ,,
इसको ही  नाम दे दिया  
तब मोहब्बत का उन्होंने ..
तभी पतन शुरू हुआ, उनका,
और उतरने लगे दोनों नीचे और नीचे,,
उतरते वक्त दोनों की रफ़्तार तेज थी,,
पतन भी होता है किसी का बस यूँ ही,
आज दोनों खड़े हैं, घाटी में एक साथ
सयंमित हो चुके हैं अब
उनके खुबसूरत एहसास  
वो कहते हैं अब सबसे
'कल्पना' सच में बहुत खुबसूरत 
होती है 'यथार्थ' से,,,
किन्तु अब न तो परिक्षण है और 
न ही प्रयोग का अधिकार,,  
दोनों ने पूर्ण कर दिया,, 
एक दूजे को हर तरह से ..
अब उठने लगे वो ऊपर
दिनों दिन साथ साथ,,,
यही उत्थान है दोनों का 
अपने अभिमान से छूटकर गिरना,,,
अब कहते हैं दोनों अक्सर,,
'यथार्थ' की खूबसूरती बिना ‘कल्पनाओं’
के नहीं समझ सकोगे तुम,,...
पहले जो कहते थे, ढोंगी
‘कल्पनाओं’ का मुझे अक्सर ,,

----------सौरभ

1 comment:

Prashant Suhano said...

अरे वाह.. ये तो बड़ी दार्शनिक कविता है मित्र...
बहुत ही अच्छी अभिव्यक्ति दी है आपनें...