Thursday, May 2, 2013

जरुर ! जरुर !


'रौशनी' की 'चाहत', दीपक,
जलाने की सलाह देती है जरुर ! 
पर समय की 'जरुरत', दीपक,
बुझाने का हुक्म सुना देती है..
देते रहे हैं तरजीह हम,अब तक ,,
'
चाहतों' पर 'जरूरतों' को, हर रोज,,
'क़त्ल' किया है, खुद से खुद का,
अपराधी हैं, हम ही, इसके हर बार !
शायद इसी से सबको भ्रम हुआ है,
हमें अँधेरा पसंद हैं, और उल्लू हैं हम !
फिर भी यकीन है हमको, अपने चयन पर..
और साथ ही रौशनी पर भीउन नए रास्तों पर भी, जो खुलेंगे जरुर !
सूरज उगेगा ही, और अँधेरा भी मिटेगा,
साथ ही ख़त्म होगा, एक अंतहीन इंतजार,
'
चाहतें' और 'जरूरतें' दोनों पूरी होंगी,
'
एक ही साथ', जरुर ! जरुर ! 


                                       --------सौरभ--  

    

2 comments:

Manish Yadav said...

चाहतें और जरूरतें...!! :)
बेशक पूरी होंगी.. जरूर जरूर..
एतना कान्फिडेन्स रहेगा तो बेशक जरूर जरूर!!

Prashant Suhano said...

बिलकुल पूरी होंगी...
हमारी भी शुभकामना है मित्र...