Tuesday, May 7, 2013

बहाने मिल गए




फिर हमको हंसने के,बहाने से मिल गए,,
जैसे खोये खिलौने सारे, पुराने से मिल गए,,

भावों से भरे थे हम, शब्दों से छिटककर.. 
उन बेआवाज गीतों को , तराने से मिल गए,,

कुछ गीत बज गए, कुछ गाने से मिल गए,,
हमें फिर से हंसने के, नए बहाने से मिल गए... 

-------------------सौरभ-------
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उठते सवाल...



उनकी ही फ़िक्र में,
उनसे भागते रहे,,
उनके लिए अपने कदम,
हम साधते रहे,,
न कहे वादे थे, कुछ भी..
और न ही अनकहे..
फिर भी न जाने रास्ता ,,
क्यों हम ताकते रहे,,
इस भाग-दौड़ में खुद को,,
हम कुछ ऐसे भूल बैठे,,
कोई जवाब नहीं अब,
उन सब उठते सवाल के,,, 


----------सौरभ-----

Sunday, May 5, 2013

उत्थान ----पतन



एक ‘हुश्ने गुरुर’ में था,
एक ‘गुरुरे ज्ञान’ शिखर पर,,
रस्ते जुदा थे उनके और,,
मंजिल भी अलग अलग ,
क्या हुआ जो भाने लगीं,,
दोनों को एक दूसरे की ऊंचाईयां,, 
वो चाहते थे जानना,,
सचचाईयां एक दूजे की,,
और सिद्ध भी करना,,
एक दुसरे से बेहतर खुद को,,
मिलने की आरजू भी 
जगने लगी जब मन में ,,
इसको ही  नाम दे दिया  
तब मोहब्बत का उन्होंने ..
तभी पतन शुरू हुआ, उनका,
और उतरने लगे दोनों नीचे और नीचे,,
उतरते वक्त दोनों की रफ़्तार तेज थी,,
पतन भी होता है किसी का बस यूँ ही,
आज दोनों खड़े हैं, घाटी में एक साथ
सयंमित हो चुके हैं अब
उनके खुबसूरत एहसास  
वो कहते हैं अब सबसे
'कल्पना' सच में बहुत खुबसूरत 
होती है 'यथार्थ' से,,,
किन्तु अब न तो परिक्षण है और 
न ही प्रयोग का अधिकार,,  
दोनों ने पूर्ण कर दिया,, 
एक दूजे को हर तरह से ..
अब उठने लगे वो ऊपर
दिनों दिन साथ साथ,,,
यही उत्थान है दोनों का 
अपने अभिमान से छूटकर गिरना,,,
अब कहते हैं दोनों अक्सर,,
'यथार्थ' की खूबसूरती बिना ‘कल्पनाओं’
के नहीं समझ सकोगे तुम,,...
पहले जो कहते थे, ढोंगी
‘कल्पनाओं’ का मुझे अक्सर ,,

----------सौरभ

Friday, May 3, 2013

उचित ---अनुचित


क्यों जरुरी है घर में दरवाजे,
खिड़कियाँ, परदे,,
जबकि घरहै वो,,
फिर किससे छिपना,,
और क्या छिपाना,,
जब सारे अपने हैं वो ! 
सब अनुचित है, उचित कुछ भी नहीं,,
मित्र ! ये परदे, खिड़कियाँ दरवाजे,
सब मर्यादा की रेखा हैं,,
जो सभी को देते हैं,,
एक स्वतंत्र निजत्व,एक अस्तित्व,
जिससे होती है मजबूत बुनियाद 
हर सम्बन्ध की,,
इसलिए अनुचित कुछ भी नहीं,,
सब उचित है,,साथ ही इनसे ही बढती है 
खूबसूरती हर घर की,,
और मजबूती भी...
-                            ------सौरभ---

Thursday, May 2, 2013

जरुर ! जरुर !


'रौशनी' की 'चाहत', दीपक,
जलाने की सलाह देती है जरुर ! 
पर समय की 'जरुरत', दीपक,
बुझाने का हुक्म सुना देती है..
देते रहे हैं तरजीह हम,अब तक ,,
'
चाहतों' पर 'जरूरतों' को, हर रोज,,
'क़त्ल' किया है, खुद से खुद का,
अपराधी हैं, हम ही, इसके हर बार !
शायद इसी से सबको भ्रम हुआ है,
हमें अँधेरा पसंद हैं, और उल्लू हैं हम !
फिर भी यकीन है हमको, अपने चयन पर..
और साथ ही रौशनी पर भीउन नए रास्तों पर भी, जो खुलेंगे जरुर !
सूरज उगेगा ही, और अँधेरा भी मिटेगा,
साथ ही ख़त्म होगा, एक अंतहीन इंतजार,
'
चाहतें' और 'जरूरतें' दोनों पूरी होंगी,
'
एक ही साथ', जरुर ! जरुर ! 


                                       --------सौरभ--