Saturday, April 27, 2013

मुक्त कर दो !

मुक्त कर दो ! 
तुम मुझे उम्मीद से, 
विश्वास से, 
मुक्त कर दो ! 

मुक्त कर दो !
तुम मुझे वरदान से, 
अभिशाप से, 
मुक्त कर दो !

मुक्त कर दो ! 
तुम मुझे तारीफ से, 
आलोचना से, 
मुक्त कर दो! 

मुक्त कर दो ! 
तुम मुझे संबंधों के, 
व्यापार से ,,
मुक्त कर दो ! 

मुक्त कर दो ! 
तुम मुझे 'बंधनों'  के 
प्यार से ,,
मुक्त कर दो !    


नोट: कल रात पीड़ा के क्षणों में की गयी प्रार्थना जो शब्द रूप में बह निकली,,,

Friday, April 26, 2013

“धराऊँ” सम्बन्ध...


“धराऊँ” सम्बन्ध
बचपन में हमें अक्सर बताया जाता था, ये कपड़ा बहुत बढ़िया है, इसे रोज रोज नहीं पहनना चाहिए. गन्दा हो जायेगा,,,,संभाल के रखो....कहीं आने जाने के काम आयेगा,,,,मौके-बेमौके ! 
और दीवाली दशहरा, होली पर ख़रीदे गए नए कपड़ों को उमंगो के साथ हम उन्हें साजो लेते थे,,,बिल्कुल एक हसीन ख्वाब की तरह...
हम उन्हें गिन गिन कर ही खुश हो जाते थे,,,,,,पहनने की तो दूर !
"जो सबसे अच्छा हो" उसे सबसे ज्यादा संभालकर, मोड़ कर , छुपा कर.....रखते थे.,...
आज तक वो आदत नहीं गयी ! अपने सबसे करीबी संबंधो को छिपा कर , संजो कर रख देते हैं.........उन्हें देखने की भी सुध नहीं रहती,,,,केवल मौके बेमौके उन संबंधों के साथ प्रगट होना और सम्मान पाना, उन्हें सम्मानित करना.............इससे बढ़कर और ख़ुशी क्या हो सकती है ! 
अब लगता है, "धराऊँ कपड़े" ख़राब भी हो जाते थे,अधिक दिन तक बंद और पड़े पड़े ! अब संबंधों को भी रोज रखना होगा अपडेट....बिल्कुल प्रेस करके झक्कास ! .....
लेकिन एक बात अब भी खाए जा रही है कि रोज नए और अच्छे कपडे पहनने के बाद भी अब वो ख़ुशी, वो उमंग, उत्साह नहीं मिल रहा जो केवल “धराऊँ” कपड़े के होने भर से होता था....  तो क्या ऐसा ही हो जायेगा,,,, धराऊँ संबंधों के साथ भी ! ,.,
,,उन्हें बार बार याद करके कहीं हम भूलने की ओर तो नहीं जा रहे,,,,
याद आता है गर्मी के छुट्टी का मतलब केवल ‘नानी का घर’ या फिर मौसी का घर होता था,,,,,साल भर उनसे बात भी नहीं होती थी,,,,लेकिन उस गर्मी छुट्टी का इन्तेजार पुरे साल होता था,,,,और संबंधो में वही ऊष्मा, वही अपनापन होता था,,,,और आज तक है,,,सालों बीत गए फिर भी....
वो भी तो धराऊँ सम्बन्ध ही हैं हमारे,,! कोई प्रश्न नहीं, कोई शिकायत नहीं !
बस मैं तुम्हारा, और तुम मेरे,,केवल सत्य इतना ही ! 
हम तब सम्बन्ध निभाते नहीं थे, उन्हें जीते थे,,,और आज भी ऐसा ही करते हैं,,,! लेकिन अब लगता है निभाना सीखना होगा ! खुद को बदलना होगा,,,क्योंकि प्रश्न उठ रहे हैं, संवेदनशीलता पर, चरित्र पर, व्यवहार पर, निश्छलता पर ! 
अब समझना होगा वक्त बदल गया, समय बहुत आगे निकल आया ,,,,अब हम बड़े हो गए,,,,सो हमें न तो धराऊँ कपड़े रखने की आजादी है और न ही धराऊँ सम्बन्ध....!   



Thursday, April 25, 2013

आज मन बहुत उदास है,



आज मन बहुत उदास है...
न जाने मौसम का असर है ,,
या कोई बात खास है..
चुप भी होना चाहता हूँ,
और बोलना भी साथ में,,
इस जद्दोजहद का कैसे कहूँ. 
कैसा मुझे एहसास है,,
आज मन बहुत उदास है,,
जिसको अब तक मानता था,,
है सही रास्ता यही,,
उस हंसी रस्ते पे ही..
अब सवालों की बरसात है...
खूब कहकहे कहे,,
खूब हंसा हूँ आज मैं,,,
फिर भी न जाने दिल क्यों,,
आज, इतना उदास है,,
बात कुछ भी है नहीं,.
फिर भी बहुत खास है,,
...आज मन बहुत उदास है,
सौरभ --