Sunday, January 20, 2013

संवाद : (दो पीढ़ियों का)



(छुट्टी का दिन,,,,शहर की भागदौड़ में खुद के लिए वक्त निकालना थोड़ा मुश्किल है,,,,इसमें एक विचार आता है और उसकी श्रृंखला बन जाती है,,,,आज उसी विचार श्रृंखला को पिरोने के कोशिस को शब्द रूप देने का प्रयास किया है ...शुरुआत होती है फोन से,,,,पिता का फोन आता है,,,एक दुसरे को हाल चाल लेने के बाद कुछ भविष्य की चर्चा होनी शुरू होती है,,,,, और मिलने के वादे, सुधार की उम्मीदों के साथ ख़त्म ,,,,तो प्रस्तुत है,,,,)

पिता : तुम्हारी शादी की चर्चा चल रही है,,,,तुम्हारा क्या विचार है ?
पुत्र:   जैसा आप ठीक समझें,,
पिता: तुम्हें क्या चाहिए,,?
पुत्र:   कुछ नहीं..
पिता:  फिर भी ?
पुत्र:   एक काम करेंगे,,,,दहेज़ मत लीजियेगा,,,
पिता: ये क्या बात हुयी ....नहीं लेंगे तो फिर शादी क्या घर से करेंगे...?
पुत्र:   हाँ,,,इसमें गलत क्या है ?
पिता:  तुमपर इतना खर्च किया है ...बेटियों को देना पड़ा है ,,,सो अब हमारी बारी है ,,,तो हम क्यों न लें,,,
पुत्र:   बेटियों को देते समय कितनी परेशानी हुयी थी ..भूल गए,,,,,फिर उसी  मनसिक कष्ट में किसी को जानबूझकर क्यों डाल  रहे हैं,,
पिता: बेटे तुम अभी बच्चे हो ! तुम नहीं समझोगे,,,
पुत्र:   हो सकता है...लेकिन अगर इसे आप नहीं लेते तो मुझे ज्यादा ख़ुशी होती...
पिता:  जब बाप बनोगे तो जानोगे,,,
पुत्र:   मैं इसे ख़त्म कर दूंगा ...ये तो नहीं जानता लेकिन इसके पक्ष में कभी तर्क नहीं जुटाऊंगा...
पिता:  तुम मुझे निचा दिखाना चाहते हो,,,समाज में लोग क्या कहेंगे,,,
पुत्र:   पिता जी ,,,फिर से अपनी कमजोरियों को समाज पर थोपना उचित नहीं,,,,जिस तरह बेटियों के लिए जोड़े थे पैसे वैसे मेरी शादी के लिए भी जोड़ने चाहिए थे....
पिता: अब यही दिन रहा गया था,,,यही सुनना बाकि था,,,तुम्हे कोई पसंद हो तो तुम्ही बता दो,,,मुझे सबके सामने नीचा दिखाना चाहते हो तो यही सही....
पुत्र:   आपको निचा दिखा के मुझे क्या मिलेगा,,,मैं तो उस सोच को गलत काट रहा हूँ,,,जो विवाह को माता पिता की जिम्मेदारी तो मानता है लेकिन उसके लिए दूसरों के ऊपर निर्भर रहना सिखाता है...(दहेज़)
पिता: इसका मतलब मैं गलत था,,,हूँ,,,ठीक है...मैं कुछ नहीं कहूँगा....लेकिन मेरे पास पैसा नहीं है तुम्हारी शादी करने को...
पुत्र;   मुझे कोई जल्दी नहीं है...आप को जब ठीक लगे,,,जो उचित लगे कीजिये,,,अगर आप इसको अपनी जिम्मेदारी मानते हैं तो आप तय कीजिये आपको क्या करना है....लेकिन यदि आप ‘दहेज़’ नहीं मांगते तो मुझे अच्छा लगता,,,,आप मेरे प्रेरणाश्रोत रहे हैं,,,आप पर मुझे और अधिक गर्व होता,,,
पिता: (एक खामोश) आह ! देखता हूँ,,,मुझे कुछ समय दो,,,”मुझे तुमपर गर्व है “ मैं ईश्वर को धन्यवाद देता हूँ,,,कि मैं तुम्हारा बाप हूँ...
पुत्र: पिता जी ! ये आपकी शिक्षा और संस्कार हैं, जिसने स्वतंत्र रूप से सोचना सिखाया ,,,,मैं आपका ही प्रतिबिम्ब हूँ,,,,,आपका हर निर्णय मुझे स्वीकार है,,,,मैंने कोई गलती की हो तो मुझे क्षमा कीजिये,,,,,
पिता: ठीक है फिर ! घर आओ ,,फिर आराम से बात करेंगे....

(फोन कट जाता है...मैं सोचने लगता हूँ क्या कुछ बदलेगा,,,,,जिस समाज ने उनके अन्दर अच्छे इन्सान को जिन्दा तो रहने दिया लेकिन कभी सर उठाकर चलने नहीं दिया,,,मेरा उससे सामना होगा तो क्या मैं चल पाउँगा ,,,,,समाज के रुढ़िवादी विचारों को रौंदते हुए,,,उसे चुनौती देते हुए,,,उसकी आँखों में आंखे डाल कर उसे गलत सिद्ध करते हुए,,,,पता नहीं,,,,फ़िलहाल तो एक वादा ही कर सकता हूँ खुद से शायद कर पाउँगा ऐसा.....)
(****कई बार “भविष्य से किया वादा” वर्तमान की समस्याओं का सर्वोत्तम समाधान होता है.,,)



Friday, January 18, 2013

अक्ल का परदा


सुनसान सड़क पर दो सज्जन कुछ तकरार कर रहे थे,,,,शायद एक लड़का और लड़की थे,,,
लड़की ने नाराज होते हुए कहा,,,,मैं लड़की हूँ,,,,तुम मुझे फोन क्यों नहीं करते,,,,
लड़के ने अकड़कर कहा,,,,तुम लड़की हो तो !  क्या लड़का ही फोन करेगा ? ये कहाँ लिखा है ?
प्यार में लड़का/लड़की कहाँ से आ गया। इतना कहकर लड़का कुछ दूर बिना पीछे देखे चला गया,,,,,
लड़की मुंह फुला के वहीँ बैठ गयी,,,और बुदबुदाने लगी ,,, मैं लड़की हूँ,,,अबला/ कमजोर,,मुझे हमेशा से सताया गया है,,,मेरी परवाह कोई नहीं करता,,,,,  
रोने की आवाज सुनकर एक (चिरकुट) राहगीर से रहा न गया,,, 
राहगीर : तुम कौन हो ?
लड़की: तुम अन्धे हो ,,दिखाई नहीं देता।  मैं लड़की हूँ। 
राहगीर  : अच्छा ! जान गया,,,,तुम मानती हो की तुम लड़की हो,,,
लड़की : मतलब ?
लड़का : मैं तो अँधा हूँ। तुम अक्ल की अंधी हो,,,,

" लडकियाँ पैदा नहीं होतीं,,,,बना दी जातीं हैं"( समाज के द्वारा ) 
तुम एक इन्सान हो बस,,,,उतना ही जानो और मानो,,, 

"जा  जिन्दगी को जी ले कुछ इस अदा के साथ,,,
ज़माने से न कोई गिला कर , न उस खुदा के साथ,,"

वो लड़की चौंकर उस राहगीर को देखने लगी,,,,,,उसे लगा ये सारे भ्रम उसके खुद के बनाये हुए हैं,,,उसके आंसू मुस्कुराने लगे,,,,सच ! ये सारे बंधन तो उसके सोच/दिमाग  की उपज है,,,कितनी जल्दी वो खुद को मुक्त समझने लगी,,,,उसने हँस कर ,,,राहगीर का धन्यवाद किया ,,, 
लड़का छिप कर ये सब देख रहा था,,,वो दौड़ता हुआ वापस आया,,,और बोला  चलो ,,पता नहीं किस किस से यूँ ही बात करने लगती है,,,,और संशय भरी नजरों से राहगीर को देखा,,,, 
लड़की ने लड़के से बड़े प्यार से कहा , " तुम सही थे !" तुम जानते हो मैं थोड़ी बेवकूफ हूँ,,,,
जिस वक्त जिसे भी याद आ जाये वो फोन करेगा,,,,,और किसी तरह भी बात करने के रास्ते तलाश लेगा,,,
" प्रेम की ताकत विश्वास है," जो बिना खुद पर हुए एक बोझ बन जाता है,,,,
लड़का अपना सर खुजलाते हुए बोला " अचानक इतना ज्ञान ! " लड़की ने हंसकर कहा , ये यही समझा रहे थे,,,,लड़के ने सर झुकाकर नमस्कार किया और कहा आज आपने मेरी जिन्दगी में खुशियों और समझदारी के बीज रोप दिए,,,(और उम्मीद करने लगा अब सज्जन जाएँ) राहगीर ने दोनों को नमस्कार किया .
... राहगीर के चेहरे पर एक मुस्कान थी, जो लड़की को देखकर बरबस ही आ गयी,,,,,,,,लड़का परेशान न हो,,,इसलिए वो राहगीर चल पड़ा ,,,,,कहीं और/किसी और की अक्ल  से पर्दा उठाने ...
.यहाँ तो उसका पर्दा गिर चूका था,,,