Sunday, December 30, 2012

मंथन

विरोध और प्रदर्शन के बाद आज जब समाधान खोज रहा हूँ,,,,,इस अनाचार का ,,,
,,,,,कठघरे में खुद को भी  पाता हूँ,,,,,,एक आईना दिखा दिया , "दामिनी" ने सभी को,,,,
पुलिस, समाज, नेता (पक्ष +विपक्ष) , सभी खड़े हैं इस कठघरे में ,,,,[यहाँ कृष्ण और अर्जुन दोनों की भूमिका एक साथ निभानी है] 
 मंथन करना ही होगा,,,अब चाहे विष निकले या अमृत   ,,,,उसे पीना होगा हम सभी को,, 
पीढ़ियों ने हँस हँस कर टाला है इस अनाचार को,(जबरदस्ती),,,,,,इसे झेला है ,,,सहा है ,,,,सहती आयीं हैं,,,,,"
पिलाया जाता रहा है ,,,दूध में घुट्टी की तरह,,,"तुम लड़की हो" ,लड़की की तरह रहो,,,,(याद आता है सिमोन बेफोय का कथन "लड़कियां पैदा नहीं होती, बना दी जाती हैं" )
तसलीमा नसरीन के लिखे हर लेख एक चुनौती हैं ,,,,एक आगाज है परिवर्तन के ,,,जो मांग रहीं हैं अपना अधिकार समाज में सर उठाकर चलने के लिए,,
,,,,और उन्हें ये हक़ मिलना ही चाहिए,,,,,,,,
आज  की दुनिया में दो ही समस्या है ,,जिस पर काम करना है पूरी इंसानियत को ,,,
1. गरीबी,,,,
2. समाज में स्त्रियों को स्थान ,,,;उन्हें इन्सान का दर्जा  देने का,,,,भोग की वस्तु नहीं अपितु मुकम्मल इन्सान "
30 साल पहले ही गरीबी दूर करने का प्रयास शुरू कर दिया,,,बात करनी शुरू की ,,,,काम भी किया और राजनीती भी की,,,,,,
 ,,,,,,,,लेकिन आज तक महिलाओं की  स्थिति को लेकर सोचा ही नहीं,,,,,छेड़-छाड़ , कमेन्ट,  को माना ही नहीं की ये समस्या भी  है,,,ये गलत है, जो आगे चल कर इस तरह की वहशियाना हरकतों की वजह बनते रहे हैं,,,,
दामिनी की मौत ने "कम से कम इस चर्चा को जन्म तो दिया, लोग सोचने लगे , सुनने लगे,,शर्मिंदगी महसूस करने लगे,,,,,,
अब सोच तो बदलनी ही होगी,,,,न जाने कब  से शोक, नाउम्मीदी और शर्मिंदगी का बोझ लिए समाधान खोज रहा हूँ,,,
अब या तो समाज को देना होगा उसे वो अधिकार या फिर समाज से  छीन लिया जायेगा,,,,,,,,और उसे स्वीकार करना ही होगा,,,

नेतृत्व करने वालों आप लोग को यदि नेतृत्व सँभालने का शौक है तो ये जान लो "हम तुन्हें कुछ अधिकार देते हैं तो तुमसे छीन भी सकते हैं"
तुम्हे विशेष सुरक्षा दी है तो केवल इसलिए की तुम हमारे लिए सोचो,,,,,आखिर तुम हमारे सेवक हो ये याद रखो,,,"
वरना खाली  करो ,,,,,,क्योंकि हम अब रुकने वाले नहीं,,,,,,"दामिनी को न्याय दिलाना " केवल यही मकसद नहीं रहा ,,,,,अब सोच का विस्तार हो रहा है,,,,,
हमें पूर्ण सुधार चाहिए,,,सुरक्षा चाहिए,,,,अपने चुनावी घोषणा पत्र  सुधारो, अपनी सोच बदलो,,,,,इसे प्राथमिकता में डालो,,,,,
अब अपने घर में दूध की घुट्टी में पियो और पिलाओ ,,,,,,"इन्सान को सम्मान देना, स्त्री को सम्मान देना,,,,,,वो इन्सान है भोग की वस्तु नहीं,,," 
,,,,,ताकि हम अपने आने वाली पीढ़ियों से  गर्व से कह सकें ,,,,,
हमारा मुल्क महान है ,,,,और जब वे इसका कारन पूछे तो कहने को कुछ हो ,,,,खोखले नारे नहीं,,,,समुचित उत्तर जिससे हम स्वयम भी संतुष्ट हों,,,
,,,,,'जहाँ कोई भी माँ कह सके ,,,मुझे बेटी चाहिए,,,,,अगले जन्म भी मैं बेटी बनकर आऊं।"जहाँ पिता गर्व करे,,,
आईये ऐसा मुल्क बनायें,,,,,अपना हिन्दुस्तान बनायें,,,,
हर उस पुरानी सोच/कानून/परम्परा को तोड़ दें जो इस मकसद में बाधक हैं,,,,,सुधार ...पूर्ण सुधार,,,,
आप लोग देंगे न मेरा साथ ?

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