Sunday, December 16, 2012

भाई कि सीख .....


छोटू को उसके भाई ने शहर पढ़ने भेजा था, दोनों भाई पढ़ने में तो बहुत होशयार थे, किन्तु शहर का खर्च केवल एक का ही उठाया जा सकता था...छोटू कि उम्र अभी कुल २१ साल ही थी इसलिए उसके बड़े भाई लगभग ३० थे, ने उसे शहर भेजा....शहर में आके छोटू उलझ सा गया था...हर विचार हर सिद्धांत एक दूसरे को काट रहे थे...वो किसी को भी लेके चलने कि कोशिश करता और उलझता जाता...एक चिडचिडापन उसके व्यवहार में शामिल हो गया था...बड़े भाई को इसका अंदेशा था ..वो उससे मिलने शहर गए...छोटू से मिलते ही उसने झुककर परनाम किया था..भाई जी संतुष्ट हो गए ..अभी इसमें घर के संस्कार बचे हैं सो अभी सब कुछ संभाला जा सकता है...उन्होंने छोटू से पूछना चाह "कोई परेशानी भाई" छोटू ने गोल मोल जवाब दिया..किन्तु वो जनता था भाई जी से चर्चा की जा सकती है वो जरुर कोई न कोई समाधान निकाल देंगे...और उसने अपने दिल कि हर बात भाई के सामने रख दी......बड़े भाई ने सब सुना और मुस्कुराने लगे....उन्हें लग रहा था कि मेरा ही जीवन ये भी जी रहा है....
बड़े भाई ने छोटे को समझाते हुए कहा जब एक ही समस्या बार बार आपके पास आ रही है और इससे आप परेशान भी हो रहे तो दो ही बातें हो सकती हैं...या तो आप समस्याओं से लड़ने को अपना जीवन दर्शन मान चुके हो...और आपके पास करने को इसके आलावा कुछ नहीं है....
दूसरी आप ने नया कुछ सीखना बंद कर दिया...अर्थात आप  लक्ष्य तक पहुँचने का केवल एक ही रास्ता जानते हो...और मानने  लगे हो कि दूसरा रास्ता नहीं होता...इसका अर्थ केवल यही है की  आपने  संभावनाओं का गला घोंट दिया है.....मेरे भाई केवल पुस्तकें समाधान कर सकतीं तो इनसे ही इंसानियत चलती...देख भाई “पुस्तकों में केवल संकेत होते हैं, जिनकी व्याख्या अलग अलग तरीके से होती है ....और ये जान ले इंसान के ह्रदय से बढ़कर कोई पुस्तक नहीं ...कोई समाधान नहीं....हर समस्या का..”
मैंने तो अपने अनुभवों से सिखा है कि जब भी आपको लगता है कि सारी दुनिया की  समस्या का समाधान आपके पास है या आप ही उसे हल कर सकते हो ....बस यही सोच आपके  दुःख का कारण होती है “....लेकिन भईया इसमें गलत क्या है ? छोटे ने पूछा था..
       बड़े भाई ने फिर कहा था,  हम सभी वास्तव में बुझते दिए से हैं, जिसमे तेल कि कमी है और हमने हवाओं को दोष देने कि आदत बना ली है....क्योंकि ये मानना कि हमारी क्षमता कम है अपने अहम को ठेस पहुँचाना है और उसका दुःख और भी गहरा होता है...
मेरे भाई ये मानो कि हम इंसान हैं..हमारी क्षमता सिमित है...हमें तकलीफ होती है ....और हम उसे भी बाँटेंगे, हम समाधान ढूंढेंगे.... जब आप अपना दुःख अपनों से नहीं बाँट सकते तो आप अपने साथ खुश होने वाले इंसान भी नहीं पा सकते.....ये आँसू बड़े अनमोल होते हैं एक दूसरे को और करीब लाते हैं.. ये कमजोरी के नहीं बल्कि तेरी संवेदनशीलता कि निशानी हैं..
जानता  है ,...जब मैं तेरी उम्र का था न तो मैं भी भगवान बनने कि कोशिस करता था सोचता था दर्द मेरे पास रहे और सुख सबके पास ....लेकिन चाहत में भी इंसान का अहंकार संतुष्ट होता है...इससे कहीं न कहीं आप दूसरे को अपने से निचे दर्जा दे रहे हो..उसे उसकी नजर में गिरा रहे हो...खुद दुखी होके किसी को खुशी नहीं दी जा सकती....आपको क्या लगता है सब भिखारी हैं और आप दाता....अगर कर सकते हो तो सेवा करो ..सेवक बनो....यही हमारी संस्कृति माँ लक्ष्य रहा है...  नहीं तो हर साधना अधूरी और प्रार्थनाएँ अनसुनी रह जाएँगी....और आके फिर पूछोगे मेरी गलती कहाँ है.????..खुद का जीवन नरक बना लोगे भाई...
सच कि राह पर चलने कि सोचने वाली पीढ़ी के लिए एक बुरा उदहारण बन कर क्या हासिल होगा तुमको..?अपनी व्यक्तिगत कमजोरियों के लिए सच/ईमानदारी/धर्म कि आड़ मत लो मेरे भाई...
सुनो दुःख और सुख का अंतर बताता हूँ.......सुख बाँटने से बढ़ता है और दुःख बाँटने से मजाक में बदल जाता है अर्थात घट जाता है ...और हँसने का कारन बनता है....शर्त है आपको हँसने आना चाहिए..खुद पर .....
आप को संतुलन बनाने नहीं आता ..यार दुनिया में और कुछ नहीं बस संतुलन का कमाल है...या यूँ कहूँ कि संतुलन बनाना ही जीवन जीने कि कला है.....
एक और बात....हर समस्या का समाधान केवल समर्पण है....और लेकिन समपर्ण प्रश्नों से नहीं आता भाई.......... समपर्ण ह्रदय का गुण है मस्तिष्क का नहीं..
भैया कि सारी बात सुनकर छोटू सोचने लगा कहाँ से जाना भाई ने ये सब कुछ ....वो तो किताब नहीं पढते इतनी जितनी की मैं पढता हूँ......फिर ख्याल आया “अगर पढ़ना आ जाये तो हर पल आप कुछ सीख सकते हो...क्योंकि अध्ययन ह्रदय का गुण है मस्तिष्क का नहीं.....
इस घटना के बाद छोटू खुश रहने लगा ....मुस्कुराना उसका स्वाभाव बन गया ....उसने ईश्वर को धन्यवाद दिया..और अपनी परवरिश को..जिसमे पिता जी ने चर्चा करना सिखाया था....मनोभावों को शब्दरूप देना......

3 comments:

Manish Yadav said...

अध्ययन का स्वरूप निखर रहा है, विशाल हृदय से कुछ निकल रहा है अभी तो बहुत कुछ छिपा है छोटे भाई की नज़रों से...!!
बहुत बढ़िया!!

saurabh said...

मित्र.......कोशिस तो यही है...देख सकें उन छुपे हुए नज़ारे को भी जो अभी तक छुट रहे थे,....

kishore said...

bahut sundar saurabh