Wednesday, December 12, 2012

एक एक काम...

               सुकन्या की कल ही शादी हुयी....विदाई के बाद पुरानी यादों को आँसू के रूप में बहाते हुए, नए सपने सजोंते हुए उसकी कब आंख लग गयी, पता ही नहीं चला ....कुछ देर बाद राहुल ने बड़े प्यार से पूछा था , "कुछ खाओगी?" हल्की सी हिचक के साथ उसने गर्दन हिला दी थी....और वो खुश हो गयी थी ..उसे लगा था कितना ख्याल रखने वाला पति मिला था उसे....वो मन ही मन ईश्वर को बार बार धन्यवाद दे रही थी...
              
               ससुराल पहुचंते ही "सब ने 'उसका स्वागत किया,,,पुरे गाँव की औरते आयीं हुयीं थी..."बहुरानी का चेहरा देखने" उसे बहुत आश्चर्य हो रहा था, क्या वो देखने लायक है...? लेकिन बड़ी खुशकिस्मत है वो जो उसे लोग इतना चाहते हैं.....छुटकी दीदी/छोटा देवर/ सासु माँ सभी पूरी मुस्तैदी से उसे क्या चाहिए पूछती रहती और हाँ कहने से पहले ही उसे दे देती फिर चाहे वो पानी का गिलास हो या चाय का कप....
               
               दूसरे दिन घर का पूजन, ढोलक पूजन ......कई तरह की पूजाएं हुयीं...हर जगह उसी की बातें होतीं सभी उसे ही सुनना चाहते थे....चौथे दिन "चौका-पूजन " के बाद ससुर ने उसे एक गले का हार और कुछ रूपये दिए.तोहफे के रूप में.."कहा था बहू अब ये घर तुम्हारा है ." सासु माँ ने तो कंगन दिए साथ ही घर की चाभी..कहा "लो सम्भालों अपने घर को" अब मैं आराम करुँगी...मैंने बहुत संभाला .....
             
               सुकन्या बहुत खुश हुयी थी......इन सबमें वो अपने पुराने घर को भूलने लगी थी....अब यही उसका घर था..सुबह से शाम तक वो दौड़ते रहती..पिता जी की दवा .....घर की रसोई...सारे काम .....उसे झटका तो तब लगा जब  छुटकी दीदी को कहते सुना.कि ..अब तक हम सब कर ही रहीं थी...'अब आयीं हैं भाभी  जी ....सब करें.."
                  सबसे बड़ा अंतर तो उसे 'राहुल " में दिख रहा था...इतना ध्यान रखने वाला....स्त्री-पुरुष की समानता की बात करने वाला...कैसे एक गिलास पानी के लिए उसे आवाज दे देता...अपने कपड़े धोने और किचन में मदद करने की बात तो दूर......
                     
                       शुरू में 'प्रेम का जूनून" तो उसे ये सब अच्छा लगता की सबने उसे इस काबिल समझा....लेकिन आज इतने दिनों बाद जब प्रेम का भ्रम टूटा तो उसे सब साफ साफ दिखने लगा....प्रेम की भावुकता ने उसे कब कैसे और क्या बना दिया........."बहुरानी' से नौकरानी" ....
                        उसे झटका इस बात से लगा था की 'उसे ये समझाया जा रहा था की ये तुम्हारा कर्तव्य है और तुम कुछ अलग नहीं कर रही हो' उसने खुद से सवाल पूछा, 'सभी को दूसरे के कर्तव्य क्यों याद रहते हैं? ": अपने कर्तव्य क्यों भूल जाते हैं..."

                          ये जीवन स्वर्ग से नरक कैसे बनता है.....उसे अब समझ में आ रहा था...सबने केवल एक एक काम छोड़ दिया था कहकर की 'इतने दिनों से हम कर रहे थे, अब आप कीजिये" ...और वो एक एक काम उसके लिए दिनभर का काम हो गया.

                       आज जब मायके में उसने अपनी भाभी के साथ भी ऐसा ही व्यवहार होता देखा तो उससे रहा न गया...सबसे पुरे अधिकार के साथ कहा था...."ये एक एक काम कहकर छोड़ना बंद करो' वो इंसान है ....उसे जीने दो...भाई को झिड़की दी थी...."सुविधा इंसानों को सामंत बना देती है....तू खुद को मत बदलना....न जाने कब उसके आँखों से आँसू बहने लगे थे.....कितने दिनों बाद उसके अंदर का गुबार बह निकला था ....एक समाधान के रूप में...ऐसी समस्या के जिसे लोग समस्या मानने को तैयार ही नहीं....

नोट: मित्रों ये कहानी केवल इस लक्ष्य के साथ लिखी गयी है कि शायद किसी और घर को "अनजाने में हम स्वर्ग से नरक न बना दें....

2 comments:

Manish Yadav said...

आखिर आपने वह लिख ही दिया, लगता है आने वाले दिन स्वर्ग से ही रहेंगे. आखिर देवता जो रहेंगे. :)

saurabh said...

पता नहीं मित्र.....लेकिन एक वादा है अपने आप से किसी और के दिन नर्क के जैसे तो नहीं ही बनायेंगे....