Sunday, October 21, 2012

कुछ बातें फ़िल्मी सी ....

पिछले कई दिनों से अरविन्द केजरीवाल एवं आन्दोलन पर पुरे मनोयोग से ध्यान लगाये हुए हूँ....
ये वक्त (दौर) वो समय है...जो राजनीती की बेचैनियों एवं बौखलाहट के माध्यम से परिवर्तन की दस्तक दे रहा है....
"समय की चाल समझने की कोशिस कर रहा हूँ....क्योंकि जो समय की चल को नहीं समझते , कम से कम वे परिवर्तन के वाहक तो नहीं ही हो सकते हैं....
वे होते हैं केवल परिवर्तन के बेहोश शिकार.....
खैर.....फिल्म देखने का 
मूड बनाया.....लेकिन फिर वही सार्थकता की तलाश सोचा कोई सार्थक फिल्म देखि जाई....
विचार बनाया....कोई ऐसी फिल्म जिसमे दोस्ती को दिखाया हो....
कमाल  की बात ये है की बालीवुड ने आज तक केवल पुरुष मित्रों पर फिल्मे बनायीं हैं.....
पुरुष एवं महिला मित्र पर अगर शुरू भी की तो....ले दे के प्यार करा दिया.....दोस्ती रहने ही नहीं दी....
"मालुम है हमारा समाज मानता है, की लड़के और लड़की कभी दोस्त बने रह ही नहीं सकते ....प्यार तो हो ही जायेगा....."
कमाल ये है की ये सोच हमें विरासत के रूप में मिलती है ....और हम उसके दास बने रह जा रहे हैं....इससे कई व्यक्तिगत जीवन/विवाहित जीवन भी बर्बाद हो जाते रहे हैं और हो रहे हैं.."
बालीवुड से बहुत उम्मीद है की इसे तोड़ने की कोशिस तो शुरू करें....क्योंकि ये वो जगह है जहाँ सपने देखे जाते हैं, दिखाए जाते हैं....विचार को जन्म ही नहीं दिया जाता बाकि उसे पाला पोषा भी जाता है....
हमारे यहाँ बदलाव फिल्मों/साहित्य से ही शुरू होता है....

प्रेम त्रिकोण की शुरुआत की थी...चन्द्र धर शर्मा गुलेरी की कहानी "उसने कहा था" त्याग की कहानी और प्यार के लिए खुद को मिटा देने की कहानी...
वीर जरा में रानी मुख़र्जी का किरदार "ये बताता है हमारे व्यक्तिगत जीवन के विचार" किसी और की जंग के हथियार भी बन सकते हैं....

लेकिन अभी भी इन्तेजार है....उस फिल्म का उस विचार के स्वीकार्यता का जब हमारा समाज इतना उन्नत हो की
" किसी से से परिचय कराया जाये तो केवल यह कहना पर्याप्त हो ये मेरे/मेरी मित्र है.......और प्रतिप्रश्न न हो....मित्र या फिर गर्ल/ब्यायफ्रेंड.. ??

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