Monday, January 9, 2012

नायक ya खलनायक


नायक या खलनायक होना व्यक्तित्व पर निर्भर है या फिर व्याख्या पर....
डाकू अन्गुलिमान के बुरे आदमी से अच्छा बनने की कहानी तो आपने सुनी होगी, लेकिन उसके बुरे बनने की कहानी सामान्य रूप से नहीं सुनाई जाती,
मैं सुनाता हूँ  .....
वो अपने गुरु कुल में गुरु के प्रिय शिष्यों में से एक था, किन्तु कुछ ईर्ष्यालु मित्रो ने गुरु जी के कान में ये बात डाल दी की गुरु माता और अन्गुलिमान में अवैध सम्बन्ध है, गुरु जी ने सत्यता की जांच किये बिना उसे गुरुकुल से निकाल दिया. समाज में तिरस्कृत होके जीना बहुत मुस्किल था, सो वो जंगलो की और चला गया....
और एक प्रसिद्द डाकू बना,,,,...
मैंने जब ये कहानी पहली बार पढ़ी तो, मुझे लगा ज्ञान उसे ही हो पता है जिसमे पहले से कुछ हो, उसर धरती में खेती नहीं होती..
लेकिन आज सोच रहा हु...उसके बुरे बनने में कारन क्या था, वो इर्ष्या, संदेह, अदूर दर्शिता या फिर नियति....
कही ऐसा तो नहीं की " हर खलनायक स्वभावतः एक नायक ही होता है....बस उसका चित्रण खलनायक के रूप में होता है...."
और यदि चित्रण ही वय्क्तिताव है तो फिर समाज में ये मानक और मूल्य किस लिए....
कुछ लोगो का कहना ही सब कुछ है......तो हम कहाँ  आगे बढ़ रहे हैं ये समाज प्रगति कहाँ कर पा  रहा है..., 
पहले भी राम ने सीता को धोबी के आरोप से निकला था, और आज भी ऐसा ही होता है....
लोग उसी को रामराज्य के नाम पे सही सिद्ध करने का प्रयास सफलता पूर्वक कर रहे हैं....

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