Monday, January 9, 2012

a Message to them...



ये लोग जो रहनुमा होने का गुमा पाले हैं...
कहो उनसे की शिकायत सुनना भी सिख ले...

समझा दो उनको की हमसे न खेले राजनीति का खेल...
बताओ उन्हें इन खेलो की जिन्दगी हमसे ही शुरू होती है.....

जाके देख ले, इतिहासों की तारीख को वो लोग ...
हमारे मचलने से ही,  ये तारीखे बदल जाती हैं...

हम जो खामोश हैं, तो इसे बुजदिली न समझो....
तुम्हारे अंजाम के बाबत ही हम  सोच रहे हैं....
.
 न खुश हो ज्यादा, कुछ दिन भटका के हमको..
हमको  तो है बस जुस्तजू, दीदारे- मंजिल की......

कब तक बचा सकोगे इस झूठी  शान को तुम ....
कर के ये बहाना,कि मुस्किल बहुत  है काम ये....

आओ करें हम बाते,  खुल के साफ-साफ....
हिम्मत नहीं अगर हो, स्वीकार कर ले उसको ....

कमजोरियों से हमको नफरत नहीं रही  ...
सब जानने का नाटक, तुम न  करो लेकिन ...








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