Thursday, January 12, 2012

वो डूब रहा है .


किनारे बैठ के , हमको बताते वो, 
जा के उसे बचा लो, वो डूब रहा है....

बार बार हमको यही समझाते वो, 
जाके उन्हें बचा लो, वो डूब रहा है...

हमने जो पूछा उनसे , खुद क्यों नहीं जाते....
कहने लगे वो हंस के , वहा डूबता है हर कोई..

मैं भेजता हूँ, तुमको डूबने की खातिर..
पहले उसे बचा ले वो डूब रहा है ....

लौटने पे उनसे मैंने  कुछ नहीं पूछा, 
कहने लगा था मैं भी,  वो डूब रहा है....

Tuesday, January 10, 2012

अनुभव ....जो हुआ..


लगने लगा था हमको, कि मुझसा तू भी  है...
करने लगे थे, बातें,  बड़ी बेबाक हम....

सच  जानने  को  तुने , हमसे  जिरह बहुत की...
सुनने का हौसला, मगर तुझमे कभी  न  था ...

हम बोलते थे अब तक तो सिर्फ इसलिए....
पहले खबर नहीं थी, तुझे बेजुबा पसंद....

Monday, January 9, 2012

नायक ya खलनायक


नायक या खलनायक होना व्यक्तित्व पर निर्भर है या फिर व्याख्या पर....
डाकू अन्गुलिमान के बुरे आदमी से अच्छा बनने की कहानी तो आपने सुनी होगी, लेकिन उसके बुरे बनने की कहानी सामान्य रूप से नहीं सुनाई जाती,
मैं सुनाता हूँ  .....
वो अपने गुरु कुल में गुरु के प्रिय शिष्यों में से एक था, किन्तु कुछ ईर्ष्यालु मित्रो ने गुरु जी के कान में ये बात डाल दी की गुरु माता और अन्गुलिमान में अवैध सम्बन्ध है, गुरु जी ने सत्यता की जांच किये बिना उसे गुरुकुल से निकाल दिया. समाज में तिरस्कृत होके जीना बहुत मुस्किल था, सो वो जंगलो की और चला गया....
और एक प्रसिद्द डाकू बना,,,,...
मैंने जब ये कहानी पहली बार पढ़ी तो, मुझे लगा ज्ञान उसे ही हो पता है जिसमे पहले से कुछ हो, उसर धरती में खेती नहीं होती..
लेकिन आज सोच रहा हु...उसके बुरे बनने में कारन क्या था, वो इर्ष्या, संदेह, अदूर दर्शिता या फिर नियति....
कही ऐसा तो नहीं की " हर खलनायक स्वभावतः एक नायक ही होता है....बस उसका चित्रण खलनायक के रूप में होता है...."
और यदि चित्रण ही वय्क्तिताव है तो फिर समाज में ये मानक और मूल्य किस लिए....
कुछ लोगो का कहना ही सब कुछ है......तो हम कहाँ  आगे बढ़ रहे हैं ये समाज प्रगति कहाँ कर पा  रहा है..., 
पहले भी राम ने सीता को धोबी के आरोप से निकला था, और आज भी ऐसा ही होता है....
लोग उसी को रामराज्य के नाम पे सही सिद्ध करने का प्रयास सफलता पूर्वक कर रहे हैं....

a Message to them...



ये लोग जो रहनुमा होने का गुमा पाले हैं...
कहो उनसे की शिकायत सुनना भी सिख ले...

समझा दो उनको की हमसे न खेले राजनीति का खेल...
बताओ उन्हें इन खेलो की जिन्दगी हमसे ही शुरू होती है.....

जाके देख ले, इतिहासों की तारीख को वो लोग ...
हमारे मचलने से ही,  ये तारीखे बदल जाती हैं...

हम जो खामोश हैं, तो इसे बुजदिली न समझो....
तुम्हारे अंजाम के बाबत ही हम  सोच रहे हैं....
.
 न खुश हो ज्यादा, कुछ दिन भटका के हमको..
हमको  तो है बस जुस्तजू, दीदारे- मंजिल की......

कब तक बचा सकोगे इस झूठी  शान को तुम ....
कर के ये बहाना,कि मुस्किल बहुत  है काम ये....

आओ करें हम बाते,  खुल के साफ-साफ....
हिम्मत नहीं अगर हो, स्वीकार कर ले उसको ....

कमजोरियों से हमको नफरत नहीं रही  ...
सब जानने का नाटक, तुम न  करो लेकिन ...








Friday, January 6, 2012

प्यार hai ya kuchh aur..


जब तक कोई हमसे नाराज नहीं होता. 
हमें उसके प्यार का एतबार नहीं होता.....

रूठ के जब वो हमसे  दूर जाने को होता है ....
उसकी जुदाई के  ख्याल  से भी दिल सहम जाता है  ..

हम भटकते रहते  हैं उनकी तलाश  में दर- बदर.......
मिलने पे फिर भी , लवो से इकरार नहीं होता....

दोस्त अक्सर कहते हैं, भाई सौरभ......
किसी को यूँ ही , कभी प्यार नहीं होता....

Thursday, January 5, 2012

हमारा साथ


हमारा साथ क्यों,अधिक चल न सका...
तुम घुल न सके और मैं मिल न सका..

..
हमने साथ में चलने की बहुत कोशिस की..
तू खुद से निकल न सका, और मैं तुझसा बन न सका..

.
हमें याद है वो साथ में हुयी (बेतक्क्लुफ़) बाते सारी...
जो कुछ तुझको चुभी और कुछ मैं भूल न सका...

.
अपने रिश्ते की गहराई देख कितनी थी...
अब भी तू समझ न सका और मैं समझा न सका..


सोचता हूँ किसकी शिकायत किससे करूँ. जाकर ..
जब साथ होके भी मैं तेरा हो ( बन) न सका....

sirf tumhare liye.......


जुदा हमसे होके, भी तू खुश रहे...सो
बेवफाई का कफ़न ओढा है हमने...

हमें याद करके न बेचैन होना...सो
जगहंसाई का दामन थामा है हमने...

रुखसत का वक्त, लो अब आ गया है..मिलने की ख्वाहिश , कही फिर जगी है..

हैरान हूँ अब भी ,मैं ये देखकर....
कि आँखों में क्यों, ये चाहत की नमी है...