Sunday, December 30, 2012

मंथन

विरोध और प्रदर्शन के बाद आज जब समाधान खोज रहा हूँ,,,,,इस अनाचार का ,,,
,,,,,कठघरे में खुद को भी  पाता हूँ,,,,,,एक आईना दिखा दिया , "दामिनी" ने सभी को,,,,
पुलिस, समाज, नेता (पक्ष +विपक्ष) , सभी खड़े हैं इस कठघरे में ,,,,[यहाँ कृष्ण और अर्जुन दोनों की भूमिका एक साथ निभानी है] 
 मंथन करना ही होगा,,,अब चाहे विष निकले या अमृत   ,,,,उसे पीना होगा हम सभी को,, 
पीढ़ियों ने हँस हँस कर टाला है इस अनाचार को,(जबरदस्ती),,,,,,इसे झेला है ,,,सहा है ,,,,सहती आयीं हैं,,,,,"
पिलाया जाता रहा है ,,,दूध में घुट्टी की तरह,,,"तुम लड़की हो" ,लड़की की तरह रहो,,,,(याद आता है सिमोन बेफोय का कथन "लड़कियां पैदा नहीं होती, बना दी जाती हैं" )
तसलीमा नसरीन के लिखे हर लेख एक चुनौती हैं ,,,,एक आगाज है परिवर्तन के ,,,जो मांग रहीं हैं अपना अधिकार समाज में सर उठाकर चलने के लिए,,
,,,,और उन्हें ये हक़ मिलना ही चाहिए,,,,,,,,
आज  की दुनिया में दो ही समस्या है ,,जिस पर काम करना है पूरी इंसानियत को ,,,
1. गरीबी,,,,
2. समाज में स्त्रियों को स्थान ,,,;उन्हें इन्सान का दर्जा  देने का,,,,भोग की वस्तु नहीं अपितु मुकम्मल इन्सान "
30 साल पहले ही गरीबी दूर करने का प्रयास शुरू कर दिया,,,बात करनी शुरू की ,,,,काम भी किया और राजनीती भी की,,,,,,
 ,,,,,,,,लेकिन आज तक महिलाओं की  स्थिति को लेकर सोचा ही नहीं,,,,,छेड़-छाड़ , कमेन्ट,  को माना ही नहीं की ये समस्या भी  है,,,ये गलत है, जो आगे चल कर इस तरह की वहशियाना हरकतों की वजह बनते रहे हैं,,,,
दामिनी की मौत ने "कम से कम इस चर्चा को जन्म तो दिया, लोग सोचने लगे , सुनने लगे,,शर्मिंदगी महसूस करने लगे,,,,,,
अब सोच तो बदलनी ही होगी,,,,न जाने कब  से शोक, नाउम्मीदी और शर्मिंदगी का बोझ लिए समाधान खोज रहा हूँ,,,
अब या तो समाज को देना होगा उसे वो अधिकार या फिर समाज से  छीन लिया जायेगा,,,,,,,,और उसे स्वीकार करना ही होगा,,,

नेतृत्व करने वालों आप लोग को यदि नेतृत्व सँभालने का शौक है तो ये जान लो "हम तुन्हें कुछ अधिकार देते हैं तो तुमसे छीन भी सकते हैं"
तुम्हे विशेष सुरक्षा दी है तो केवल इसलिए की तुम हमारे लिए सोचो,,,,,आखिर तुम हमारे सेवक हो ये याद रखो,,,"
वरना खाली  करो ,,,,,,क्योंकि हम अब रुकने वाले नहीं,,,,,,"दामिनी को न्याय दिलाना " केवल यही मकसद नहीं रहा ,,,,,अब सोच का विस्तार हो रहा है,,,,,
हमें पूर्ण सुधार चाहिए,,,सुरक्षा चाहिए,,,,अपने चुनावी घोषणा पत्र  सुधारो, अपनी सोच बदलो,,,,,इसे प्राथमिकता में डालो,,,,,
अब अपने घर में दूध की घुट्टी में पियो और पिलाओ ,,,,,,"इन्सान को सम्मान देना, स्त्री को सम्मान देना,,,,,,वो इन्सान है भोग की वस्तु नहीं,,," 
,,,,,ताकि हम अपने आने वाली पीढ़ियों से  गर्व से कह सकें ,,,,,
हमारा मुल्क महान है ,,,,और जब वे इसका कारन पूछे तो कहने को कुछ हो ,,,,खोखले नारे नहीं,,,,समुचित उत्तर जिससे हम स्वयम भी संतुष्ट हों,,,
,,,,,'जहाँ कोई भी माँ कह सके ,,,मुझे बेटी चाहिए,,,,,अगले जन्म भी मैं बेटी बनकर आऊं।"जहाँ पिता गर्व करे,,,
आईये ऐसा मुल्क बनायें,,,,,अपना हिन्दुस्तान बनायें,,,,
हर उस पुरानी सोच/कानून/परम्परा को तोड़ दें जो इस मकसद में बाधक हैं,,,,,सुधार ...पूर्ण सुधार,,,,
आप लोग देंगे न मेरा साथ ?

Wednesday, December 19, 2012

एक लड़की...


उस लड़की को देखा था। एक लट उसके चेहरे पर बार बार आती वो उसे हलके से हटा दिया करती थी। अपने कोचिंग में पढाते वक्त राकेश  ने देखा था उसे ! और उस लड़की को ये भी पता नहीं था कि उसे कोई चोर नजर से देख रहा है। उसके गालों में पड़ने वाले गड्ढे कितने खूबसूरत लग रहे थे!  बहुत गोरी भी नहीं थी और न ही उसने ऐसे कुछ पहन रखा था । उसके साँवले चेहरे में कितनी चमक है । खुले बाल उसके, ऐसा लगता था जैसे उसे ही देखने की आरजू थी मन में।
इन सभी रोमांटिक विचारों  में उलझा राकेश शाम के वक्त घर जा रहा था।  आज उसे पापा ने लड़की देखने के लिए कहा था। व्यवस्थित विवाह का अपना क्रेज होता है। राकेश जब मिला उससे तो देखते ही रह गया। अरे ये तो रश्मि है इसे ही तो देखा था उसने ! उसने पहले पहल ही मान लिया की ये बहुत तेज होगी, पढाई में ! वास्तव में व्यक्ति जो बनना चाहता है, उसे हर जगह अच्छी चीजों  में अपनी कल्पना पूरी होती दिखती है।
               वो गांव से बाहर निकला ही था की उसे एक लड़की दिखी जो अभी शाम के वक्त पैदल ही घर जा रही थी। सोचा था उसने उसे घर तक छोड़ दे, लेकिन लोग क्या सोचेंगे और खुद वो क्या सोचेगी। बस यही सोच के उसने उसके साथ साथ अपनी साईकिल लगा दी थी। उस लड़की को भी सुरक्षा का एहसास हुआ था। और एक मुस्कान के रूप में उसने धन्यवाद दिया था उसे। वो पहला अनबोला संवाद था उन दोनों का । रश्मि  सोच रही थी कितना गलत सोचती थी लड़को के बारे में ! आज उसे लग रहा था। इस उम्र के लड़के उतना सोच भी नहीं पाते जितना उसे समाज में दिखने वाले बुजुर्गों कि हरकतों से डर लगता था।
कल राकेश नहीं जा पाया था, अपने कोचिंग। तबियत कुछ खराब थी। दूसरे दिन उसे पता चला था कि रश्मि को कुछ लोगों ने उठा लिया है। बाद में पता चला एक रात वो वापस आ गई थी ।
उसने हिम्मत करके पूछा था, की क्या हुआ था तुम्हारे साथ ? ठाकुर की करतूत सुनके उसके तन-बदन में आग लग  गई थी। वो आग बबूला होकर ठाकुर को मारने के लिए निकल पड़ा था। उस लड़की से तो अब तक कोई रिश्ता भी नहीं था उसका। लेकिन ऐसे वक्त पर संस्कार ही काम आते हैं वही इंसान को दिशा देते हैं निर्णय लेने कि शक्ति देते हैं। बहुत मारा था ठाकुर के लोगों ने कुछ कटु वचनों से कुछ अपनी बूट से। उसके दद्दू ने समझाया था, तुम कुछ नहीं कर सकते इनका ! क्योंकि तुम गरीब हो ! तुम्हारा सबसे बड़ा अपराध यही है कि तुम गरीब हो। इंसाफ जैसी बातें केवल किताबों में होती हैं !जो हुआ उसे भूल जाओ ! आगे नयी जिंदगी शुरू करो !
दद्दू के अनुभवों ने उसे नयी दिशा दी थी। रश्मि से उसने शादी कर ली । उसने बहुत कोशिस कि रश्मि उस घटना को भूल जाए। खुद रोज भूलना चाहता था वो ! लेकिन नहीं हो पता था। एक अनचाहे साये के रूप में ठाकुर के शब्द गूंज जाते थे उसे कानों में !.शब्द इंसान कि शक्ल ले के खड़े हो जाते थे। उसे बार बार फ़िक्र होती थी रश्मि कि जिसपर गुजरा था ये सब !
आखिर गलती किसकी थी उसकी ?? "वो गरीब था" उस शाम वो चला गया होता तो शायद ये नहीं होता, या रश्मि की गलती थी कि वो लड़की थी ? उसे लग रहा था जिसे पहली बार देखकर उसने ऊपर वाले को खूबसूरत दुनिया  बनाने के लिए धन्यवाद दिया था ! लेकिन ठाकुर को कोई सजा क्यों नहीं देता ??
रश्मि के आंचल के आँसू आज तक नहीं सूखे। राकेश  आज भी उन खामोश चींखो को सुनता है । कोर्ट में अब भी तारीख पड़ती है। कुछ नहीं बदलता लेकिन जब भी कोई दुर्घटना घटती है किसी लड़की के साथ वो अवसाद में आ जाता है। उसे अपने अंदर कुछ टूटता सा महसूस होता....जब किसी बच्ची को हँसते देखता तो उसे अपना जीवन सार्थक लगने लगता......
आज भी उसकी जंग छिड़ी हुयी है उस खुदा से जिससे लड़ने के लिए उसके पास ऐसा कोई हथियार नहीं है। .वो आज भी पूछता है कि तुम ही अगर सब बनाते हो !  सब तुम ही करते हो, तो फिर ऐसे इंसान बनाते ही क्यों हो? क्यों नहीं मिटा देते..???.और जबसे रश्मि को भी खुदा ने छीन लिया ! वो चुनौती देता रहता है उस खुदा को ! बस एक लड़की कि खातिर, जो अब नहीं है ! और जिसके बिना उसके जीवन में कुछ बचा भी नहीं! कुछ भी नहीं!
कल मिला था मुझसे ! वो जीना नहीं चाहता । उसके पास कुछ सूखे आँसू, कुछ खामोश चींखे और कुछ अनुत्तरित सवाल हैं। जो उसने इस नयी पीढ़ी को सौंप दिया है। और यह उम्मीद जताई है कि शायद हम उसके जवाब ढूंढ सकें।
                              -------सौरभ 

Sunday, December 16, 2012

तीन तरह के लोग..


'सुनो बेटे !" दुनिया मे मुख्य रूप से तीन तरह के लोग होते हैं।
       पहले वो जो कोई काम नहीं करते। उन्हें बनाकर  ईश्वर अपनी गलती पर पछताता है और ईश्वर उनके जीवन में मज़बूरी में बार बार आके उनके काम कर देता है। ऐसे लोग खुद के भाग्यशाली होने की डिंग हांकते हैं, और ईश्वर इनके बचपने पर हँसता है ।

       दूसरे वो लोग होते हैं, जो खूब मेहनत करते हैं। ऐसे लोग अपने काम गिना गिना कर ईश्वर से उसके बदले कुछ बेहतर मांगते रहते हैं। मोटे शब्दों में इनके पास बहीखाता होता है जिसमे हर दिन की की गयी अच्छाई को वो खुद नोट कर रहे होते हैं, इसलिए अशांत होते हैं। ईश्वर ऐसे लोगों के बचपने पर मुस्कुराता है। 

       तीसरे किस्म के इंसान वो होते हैं, जो केवल मेहनत करते हैं।  वो कोई भी काम बिना किसी स्वार्थ, किसी ख्वाहिश के करते हैं, उनको इससे फर्क नहीं पड़ता की सामने वाला उनका इस्तेमाल कर रहा है। ऐसे लोग ईश्वर को अपना  सब कुछ सौंप चुके होते हैं। ये लोग मस्त (फक्कड़) किस्म के होते हैं, इन्हे हिसाब करने की फुर्सत नहीं होती। ईश्वर ऐसे लोगों को बना के खुश हो जाता है। ईश्वर बार बार ये चाहता है,  ये कुछ भी मांग लें, कुछ भी, और ऐसे लोगों को जब तकलीफ होती है न, तो उस ऊपरवाले के भी आँसू निकल जाते हैं।     

       'पापा' ! इसमें सबसे अच्छे कौन से लोग होते हैं?
बेटा ! तीसरे किस्म के लोग उस विधाता के  सर्वोच्च कृति होते हैं। यही संसार की धुरी होते हैं, इन्ही के कारण संसार में धर्म (अच्छाई ) जिन्दा रहती है।

       अच्छा पापा ! मैं इनमे से कौन सा हूँ ?  या मुझे कौन सा रास्ता चुनना चाहिए, जो मेरे जीवन को सरल और आनंद से भर दे ? 
'बेटे !'  तुम्हें  एक खास किस्म की चौथी प्रजाति से होना चाहिए।
       अब ये कौन सी प्रजाति है, पापा ?
       'बेटे!'  ये प्रजाति अभी नयी है, इनके विकास में थोडा वक्त लगेगा और वो है 'प्रेक्षक'। ऐसे लोग तीनों तरह के लोगों का अध्ययन करके अपना रास्ता तय करते हैं ये लोग सोचते है, हर घटना/परिघटना को नए नजरिए से, पूर्वाग्रह से बिलकुल मुक्त होकर। ये भावावेश मे निर्णय नहीं लेते और न ही बिल्कुल भावशून्य होके। ये सम्मिश्रण होते हैं, निश्छल हृदय और सतर्क मस्तिष्क के।   
       बेटे ! ऐसे लोग जानते हैं, सच्चाई हर रस्ते में हैं, सच्चाई(अच्छाई) विरोधी नहीं होती। बल्कि ये उसी एक मंजिल तक पहुँचने के अलग अलग पड़ाव हैं जहाँ जाना सबका लक्ष्य है। 

भाई कि सीख .....


छोटू को उसके भाई ने शहर पढ़ने भेजा था, दोनों भाई पढ़ने में तो बहुत होशयार थे, किन्तु शहर का खर्च केवल एक का ही उठाया जा सकता था...छोटू कि उम्र अभी कुल २१ साल ही थी इसलिए उसके बड़े भाई लगभग ३० थे, ने उसे शहर भेजा....शहर में आके छोटू उलझ सा गया था...हर विचार हर सिद्धांत एक दूसरे को काट रहे थे...वो किसी को भी लेके चलने कि कोशिश करता और उलझता जाता...एक चिडचिडापन उसके व्यवहार में शामिल हो गया था...बड़े भाई को इसका अंदेशा था ..वो उससे मिलने शहर गए...छोटू से मिलते ही उसने झुककर परनाम किया था..भाई जी संतुष्ट हो गए ..अभी इसमें घर के संस्कार बचे हैं सो अभी सब कुछ संभाला जा सकता है...उन्होंने छोटू से पूछना चाह "कोई परेशानी भाई" छोटू ने गोल मोल जवाब दिया..किन्तु वो जनता था भाई जी से चर्चा की जा सकती है वो जरुर कोई न कोई समाधान निकाल देंगे...और उसने अपने दिल कि हर बात भाई के सामने रख दी......बड़े भाई ने सब सुना और मुस्कुराने लगे....उन्हें लग रहा था कि मेरा ही जीवन ये भी जी रहा है....
बड़े भाई ने छोटे को समझाते हुए कहा जब एक ही समस्या बार बार आपके पास आ रही है और इससे आप परेशान भी हो रहे तो दो ही बातें हो सकती हैं...या तो आप समस्याओं से लड़ने को अपना जीवन दर्शन मान चुके हो...और आपके पास करने को इसके आलावा कुछ नहीं है....
दूसरी आप ने नया कुछ सीखना बंद कर दिया...अर्थात आप  लक्ष्य तक पहुँचने का केवल एक ही रास्ता जानते हो...और मानने  लगे हो कि दूसरा रास्ता नहीं होता...इसका अर्थ केवल यही है की  आपने  संभावनाओं का गला घोंट दिया है.....मेरे भाई केवल पुस्तकें समाधान कर सकतीं तो इनसे ही इंसानियत चलती...देख भाई “पुस्तकों में केवल संकेत होते हैं, जिनकी व्याख्या अलग अलग तरीके से होती है ....और ये जान ले इंसान के ह्रदय से बढ़कर कोई पुस्तक नहीं ...कोई समाधान नहीं....हर समस्या का..”
मैंने तो अपने अनुभवों से सिखा है कि जब भी आपको लगता है कि सारी दुनिया की  समस्या का समाधान आपके पास है या आप ही उसे हल कर सकते हो ....बस यही सोच आपके  दुःख का कारण होती है “....लेकिन भईया इसमें गलत क्या है ? छोटे ने पूछा था..
       बड़े भाई ने फिर कहा था,  हम सभी वास्तव में बुझते दिए से हैं, जिसमे तेल कि कमी है और हमने हवाओं को दोष देने कि आदत बना ली है....क्योंकि ये मानना कि हमारी क्षमता कम है अपने अहम को ठेस पहुँचाना है और उसका दुःख और भी गहरा होता है...
मेरे भाई ये मानो कि हम इंसान हैं..हमारी क्षमता सिमित है...हमें तकलीफ होती है ....और हम उसे भी बाँटेंगे, हम समाधान ढूंढेंगे.... जब आप अपना दुःख अपनों से नहीं बाँट सकते तो आप अपने साथ खुश होने वाले इंसान भी नहीं पा सकते.....ये आँसू बड़े अनमोल होते हैं एक दूसरे को और करीब लाते हैं.. ये कमजोरी के नहीं बल्कि तेरी संवेदनशीलता कि निशानी हैं..
जानता  है ,...जब मैं तेरी उम्र का था न तो मैं भी भगवान बनने कि कोशिस करता था सोचता था दर्द मेरे पास रहे और सुख सबके पास ....लेकिन चाहत में भी इंसान का अहंकार संतुष्ट होता है...इससे कहीं न कहीं आप दूसरे को अपने से निचे दर्जा दे रहे हो..उसे उसकी नजर में गिरा रहे हो...खुद दुखी होके किसी को खुशी नहीं दी जा सकती....आपको क्या लगता है सब भिखारी हैं और आप दाता....अगर कर सकते हो तो सेवा करो ..सेवक बनो....यही हमारी संस्कृति माँ लक्ष्य रहा है...  नहीं तो हर साधना अधूरी और प्रार्थनाएँ अनसुनी रह जाएँगी....और आके फिर पूछोगे मेरी गलती कहाँ है.????..खुद का जीवन नरक बना लोगे भाई...
सच कि राह पर चलने कि सोचने वाली पीढ़ी के लिए एक बुरा उदहारण बन कर क्या हासिल होगा तुमको..?अपनी व्यक्तिगत कमजोरियों के लिए सच/ईमानदारी/धर्म कि आड़ मत लो मेरे भाई...
सुनो दुःख और सुख का अंतर बताता हूँ.......सुख बाँटने से बढ़ता है और दुःख बाँटने से मजाक में बदल जाता है अर्थात घट जाता है ...और हँसने का कारन बनता है....शर्त है आपको हँसने आना चाहिए..खुद पर .....
आप को संतुलन बनाने नहीं आता ..यार दुनिया में और कुछ नहीं बस संतुलन का कमाल है...या यूँ कहूँ कि संतुलन बनाना ही जीवन जीने कि कला है.....
एक और बात....हर समस्या का समाधान केवल समर्पण है....और लेकिन समपर्ण प्रश्नों से नहीं आता भाई.......... समपर्ण ह्रदय का गुण है मस्तिष्क का नहीं..
भैया कि सारी बात सुनकर छोटू सोचने लगा कहाँ से जाना भाई ने ये सब कुछ ....वो तो किताब नहीं पढते इतनी जितनी की मैं पढता हूँ......फिर ख्याल आया “अगर पढ़ना आ जाये तो हर पल आप कुछ सीख सकते हो...क्योंकि अध्ययन ह्रदय का गुण है मस्तिष्क का नहीं.....
इस घटना के बाद छोटू खुश रहने लगा ....मुस्कुराना उसका स्वाभाव बन गया ....उसने ईश्वर को धन्यवाद दिया..और अपनी परवरिश को..जिसमे पिता जी ने चर्चा करना सिखाया था....मनोभावों को शब्दरूप देना......

Saturday, December 15, 2012

आईना ...



ये दुनिया आईना है मित्र...सबको उसकी सूरत दिखाती है....यार इस दुनिया में आईने की जरुरत क्या है? मुझे तो लगता है लोगों का खुद से विश्वास उठ गया है...अब अपनी प्रतिक्रिया देने के लिए भी इसके मोहताज हो गए....
दूसरा मित्र: नहीं मियां आईने तो हमें हमारी हकीकत से रूबरू करते हैं...हमारा विश्वास बढ़ाते हैं हमारी खूबसूरती का एहसास दिलाते हैं.......और ...और सच पर आपका भरोसा पक्का करते हैं....
पहला मित्र मुस्कुराते हुए बोला तुझे समझाना पड़ेगा....देख भाई ...वो लड़की जो सामने बैठी है न बहुत अक्लमंद है ...वो भी अपनी तारीफ सुनकर खुश हो जायेगी.....और देखना बदले में तेरी भी तारीफ करेगी....इंसानी फितरत है यार...वाही लौटाता है जो मिलता है...और इसके लिए भी आएना ही जिम्मेदार है....लेकिन याद रखना कोई यदि तेरी तारीफ कर रहा हो और तू उस पर ध्यान न दे फिर देखना क्या होता है...?? ..नहीं यार देख तो कितनी तेजी से “आप बहुत अछे हैं, आप बहुत ध्यान रखते हैं, बहुत केरिंग हैं...इतना कोई एक साँस में रटकर तो नहीं बोल सकता ..उसका दिल बहुत साफ है...इसलिए वो ऐसा बोल रही है....”
“उससे भी तेजी से तुझे गलियां निकालेगी “...
जो जितनी तेजी से पास आता है उतनी तेजी से दूर भी जाता है....
देख भाई “शब्द ऐसे ही नहीं अपने अर्थ खो रहे हैं..... मित्र....
इस शीशे ने दुष्टों के साथ दुष्टता का व्यवहार करना सिखा दिया...अर्थात प्रतिक्रिया देना वो भी सामने वाले की मर्जी से ...हमारे मन की शांति इस शीशे ने हर ली है यार......ये दुनिया अब शीशे की हो गयी है....जो प्रतिक्रिया पर चल रही है....”वो जब तक नहीं बदलेगा मैं भी नहीं बदलूँगा.”..
दूसरे मित्र ने कहा .....समझ गया मित्र....हमारी संस्कृति ‘दुष्टों के साथ प्रेम का व्यवहार करने की क्यों रही.??
.” असली परिवर्तन प्रतिक्रिया देने से नहीं बल्कि सोच समझ के प्रतिक्रिया देने से आयेगी ...और तब शब्द अपने अर्थ भी नहीं खोयेंगे...उनके कुछ मतलब होंगे और जिनसे संवेदनाओं का प्रेषण हो सकेगा....सच में तुने आएना दिखा दिया यार......

Wednesday, December 12, 2012

एक एक काम...

               सुकन्या की कल ही शादी हुयी....विदाई के बाद पुरानी यादों को आँसू के रूप में बहाते हुए, नए सपने सजोंते हुए उसकी कब आंख लग गयी, पता ही नहीं चला ....कुछ देर बाद राहुल ने बड़े प्यार से पूछा था , "कुछ खाओगी?" हल्की सी हिचक के साथ उसने गर्दन हिला दी थी....और वो खुश हो गयी थी ..उसे लगा था कितना ख्याल रखने वाला पति मिला था उसे....वो मन ही मन ईश्वर को बार बार धन्यवाद दे रही थी...
              
               ससुराल पहुचंते ही "सब ने 'उसका स्वागत किया,,,पुरे गाँव की औरते आयीं हुयीं थी..."बहुरानी का चेहरा देखने" उसे बहुत आश्चर्य हो रहा था, क्या वो देखने लायक है...? लेकिन बड़ी खुशकिस्मत है वो जो उसे लोग इतना चाहते हैं.....छुटकी दीदी/छोटा देवर/ सासु माँ सभी पूरी मुस्तैदी से उसे क्या चाहिए पूछती रहती और हाँ कहने से पहले ही उसे दे देती फिर चाहे वो पानी का गिलास हो या चाय का कप....
               
               दूसरे दिन घर का पूजन, ढोलक पूजन ......कई तरह की पूजाएं हुयीं...हर जगह उसी की बातें होतीं सभी उसे ही सुनना चाहते थे....चौथे दिन "चौका-पूजन " के बाद ससुर ने उसे एक गले का हार और कुछ रूपये दिए.तोहफे के रूप में.."कहा था बहू अब ये घर तुम्हारा है ." सासु माँ ने तो कंगन दिए साथ ही घर की चाभी..कहा "लो सम्भालों अपने घर को" अब मैं आराम करुँगी...मैंने बहुत संभाला .....
             
               सुकन्या बहुत खुश हुयी थी......इन सबमें वो अपने पुराने घर को भूलने लगी थी....अब यही उसका घर था..सुबह से शाम तक वो दौड़ते रहती..पिता जी की दवा .....घर की रसोई...सारे काम .....उसे झटका तो तब लगा जब  छुटकी दीदी को कहते सुना.कि ..अब तक हम सब कर ही रहीं थी...'अब आयीं हैं भाभी  जी ....सब करें.."
                  सबसे बड़ा अंतर तो उसे 'राहुल " में दिख रहा था...इतना ध्यान रखने वाला....स्त्री-पुरुष की समानता की बात करने वाला...कैसे एक गिलास पानी के लिए उसे आवाज दे देता...अपने कपड़े धोने और किचन में मदद करने की बात तो दूर......
                     
                       शुरू में 'प्रेम का जूनून" तो उसे ये सब अच्छा लगता की सबने उसे इस काबिल समझा....लेकिन आज इतने दिनों बाद जब प्रेम का भ्रम टूटा तो उसे सब साफ साफ दिखने लगा....प्रेम की भावुकता ने उसे कब कैसे और क्या बना दिया........."बहुरानी' से नौकरानी" ....
                        उसे झटका इस बात से लगा था की 'उसे ये समझाया जा रहा था की ये तुम्हारा कर्तव्य है और तुम कुछ अलग नहीं कर रही हो' उसने खुद से सवाल पूछा, 'सभी को दूसरे के कर्तव्य क्यों याद रहते हैं? ": अपने कर्तव्य क्यों भूल जाते हैं..."

                          ये जीवन स्वर्ग से नरक कैसे बनता है.....उसे अब समझ में आ रहा था...सबने केवल एक एक काम छोड़ दिया था कहकर की 'इतने दिनों से हम कर रहे थे, अब आप कीजिये" ...और वो एक एक काम उसके लिए दिनभर का काम हो गया.

                       आज जब मायके में उसने अपनी भाभी के साथ भी ऐसा ही व्यवहार होता देखा तो उससे रहा न गया...सबसे पुरे अधिकार के साथ कहा था...."ये एक एक काम कहकर छोड़ना बंद करो' वो इंसान है ....उसे जीने दो...भाई को झिड़की दी थी...."सुविधा इंसानों को सामंत बना देती है....तू खुद को मत बदलना....न जाने कब उसके आँखों से आँसू बहने लगे थे.....कितने दिनों बाद उसके अंदर का गुबार बह निकला था ....एक समाधान के रूप में...ऐसी समस्या के जिसे लोग समस्या मानने को तैयार ही नहीं....

नोट: मित्रों ये कहानी केवल इस लक्ष्य के साथ लिखी गयी है कि शायद किसी और घर को "अनजाने में हम स्वर्ग से नरक न बना दें....

Tuesday, November 27, 2012

क्योंकि तुम महान हो....



देते रहो तुम इन्तेहाँ क्योंकि तुम महान हो...
हो जाओ तुम कुर्बान क्योंकि तुम महान हो..

हमारा काम है चोरी, सो तो हम करते ही रहेंगे..
तुम चलो सच के रस्ते, क्योंकि तूम महान हो..

ये भी सुनो, तुम्हें कभी चैन से जीने  नहीं देंगे....
हर  बार हमें माफ़ करना, क्योंकि तुम महान हो..

न जाने दुनिया हमको किस रूप में याद करेगी..
तेरा नाम होगा हर जगह, क्योंकि तुम महान हो..



Thursday, November 8, 2012

हमारी जंग उनसे है,



हमारी जंग उनसे है, जिन्हें  हम प्यार करते हैं। 
बड़े मासूम हैं वो, जो खुल के वार करते हैं।। 

हमारी हार तय है  इसमें, ये भी हमें मालूम. 
हमें तो देखना है, तेरी कोई  हद भी है कहीं ? 




Tuesday, October 30, 2012

प्रार्थना


प्रार्थना:

माँ  हमको  इंसान  बना  दे , प्यारी  सी  संतान  बना  दे।
सबके  दिल  में  बसने  वाले , तू  प्यारे  अरमान  जगा  दे॥
माँ  हमको  इंसान  बना  दे ,,,.......
माँ  हमने  ये  जान  लिया  है , सच  को  अब  पहचान  लिया  है।
इन क्षेत्रवाद  के  नारों  से,  नहीं  सियासत चलने देंगे।
नफरत के इस चक्रव्यूह मेंमोहब्बत का पैगाम दिला दे॥
माँ हमको इंसान बना  दे ....
हमको सिन्धी  गुजराती, नहीं मराठा बनना है।
सबके दिल में फिर से वो, प्यारा हिंदुस्तान बना दे॥
माँ हमको इंसान बना  दे................
राम ,कृष्ण ,गौतम की धरती पे हमने है जन्म लिया।
कर्ण ,दधिची ,जनक के किस्से सुनकर है बचपन ये पला
याद  हमें फिर भूला , वो गौरव सम्मान दिला दे
माँ हमको इंसान बना  दे......
टैगोर ,तिलक  गाँधी को हम, अपना आदर्श बनायेंगे।  
आजादभगत की क़ुरबानी को अब ना कभी  भुलायेंगे।।
माँ तुझसे ये वादा है ,अब कभी ना तुझे रुलायेंगे।  
जाती धर्म मजहब के नाम पे  कभी ना खून बहायेंगे
बस हमको इंसान बना दे, प्यारी सी संतान बना दे॥
माँ हमको इंसान बना  दे ......
      ---(सौरभ)

नोट: ये प्रार्थना सामाजिक परिस्थितियों के बदलते स्वरुप को पूर्ण समर्पण के द्वारा बदलने का प्रयास है।