Sunday, September 12, 2010

ऐ ! खुदा...

ऐ ! खुदा...
बड़े मायूस हैं वो आज, उनकी मासूमियत कहाँ गयी..
सिखाई थी जो तुमने वो, नसीहत कहाँ गयी...
बड़े बेफिक्र थे वो जब, कारवां चले..
ढलते सूरज के साथ वो, बेफिक्री कहाँ गयी...

ऐ खुदा ! उनको ऐसी शोहबत अता  कर.
जिससे कहे ना,वो तेरी इनायत नहीं रही..
देख के उनको आज, खुद से पूछता हूँ मैं...
जिसकी ख्वाहिस में ये कारवां चले ..
आज उनको ही पाने की क्यों कोशिस नहीं रही..\

क्यों ? थक हर के बैठे हैं , कुछ आज इस कदर..
की मंजिले दीदार की चाहत नहीं रही..
क्यों ? शक है आज उनको अपने इमां पे ..
क्यों याकि नहीं आज, तेरे कलाम पे..
ऐ खुदा सुन ले उनकी वो खामोश  अनकही ...
जिसको कहने की अब, उनमे हिम्मत नहीं रही..

तुम जो जिन्दा हो तो जीने का हुनर सीखो...
ऐसी वैसी हर बात की खबर रखो...
ना फंसो इन  दुनियादारी की बातों में ...
तुम इनको भी बदलने का जिगर रखो....

इतना कहूँगा आज उस परवर दिगार से...
हर बला से बचा के रखे वो मेरे यार को..

(छोटी बहन ने लिखा, उसकी पहली रचना...,,,नित्या दुबे ,biotech IIIrd year student)