Monday, August 2, 2010

.. बस यूँ ही...

कभी कभी यूँ ही बैठे हुए कुछ भाव मन में उभरते हैं , जिन्हें कलमबंध करने की एक छोटी सी कोशिश है.......


होती है हर रोज जंग अपने आप से ही ..
खामोश चींखो से जिसका फैसला होता है.....
जब हंसी बह जाती है, इन आँखों से..
तो फिर एक बार जीने का हौसला होता है...

घबडा जाते हैं जब वो अपने ही दिल कि तन्हाई से ....
लगा देते हैं कोई इल्जाम बड़ी ही बेवफाई से...
पूछने लगते हैं कुछ बेतुके से सवाल...
सही बात छुपा लेते हैं बड़ी सफाई से....

कभी पास तो कभी दूर नजर आते हैं
अपनी हरकतों से मगरूर नजर आते हैं..
पिसते रहते हैं वो भावनाओं कि चक्की में
हमें तो वो बड़े मजबूर नजर आते हैं...

चाहोगे  जिसे वो मगरूर हो जायेगा . .
बस ऐसे ही वो हमसे दूर हो जायेगा ..
महसूस होगी  जब उसे, तासीर-इ-मोहब्बत...
वापस आने पे खुद ही मजबूर हो जायेगा.....

जब से उन्होंने कह दिया , मेरे काबिल नहीं हो तुम..
फिर रूबरू होने कि उनसे हमने खता न की..
वो पछताएँ खुद अपने ही गलती पे...
ऐसी हरकत हमने फिर, दुबारा कभी न की.. ..

1 comment:

Manish said...

Delhi ka hi asar dikh raha hai. lekin universal truth kahne ka andaaz aapko hi pataa hai..

ham hote to 10-20 page likh maarte.. aap ne to chand lines me hi kah diya.. :)