Monday, May 24, 2010

व्यथित प्रेम....

 इस संधर्भ को को देखकर आप सोच रहे होंगे.....की प्रेम वो भी व्यथित ,,,,,,,,,कुछ दिलचस्प होगा.............
तो आप सही है...........दिलचस्प का तात्पर्य ही होता है जो दिल में चस्पा हो जाये वही  दिलचस्प है...........
खैर आज मुझे प्रेम की व्यथा लिखने की प्रेरणा कहा से हुई पहले ये बताता चलूँ........पिछले दिनों मैंने "खाप पंचायत" के बारे में अपने सहकर्मियों के माध्यम से जाना..............
   खाप पंचायत "समाज के स्थायित्व के ठेकेदारों की ऐसी फौज होती है जो दिल पे पहरा लगाने की नाकाम कोशिस को वैधता प्रदान करने का प्रयास करती है." और इस प्रयास में वो प्रेमियों को जिन्दा जलाने से लेकर उन सभी कार्य को वैधता प्रदान करने की कोशिस करती है जो मानवाधिकारों के हनन से सम्बंधित होते हैं...'
इन मूर्खों ने अपने अनुसार शाश्त्रों की व्याख्या भी करनी सीख ली है..(करते तो ये बहुत पहले से आये हैं, लेकिन अब नये कलेवर में)..............
जैसे ........मनुस्मृति में ये लिखा है........एकं त्याजयेत कुलं सार्थे, त्यजेत कुलं रास्त्र सार्थे..........इत्यादि.
अब भैया जो मनु के कल में सही था जरुरी तो नहीं की आज भी सही हो..........वक्त बदलता है,,,,,,,मूल्य बदलते हैं....विचार बदलते है.......पहले राजतन्त्र था अब लोकतंत्र है...........लेकिन इन मूर्खों को फ्रायड के शब्दों में कहूँ तो अपनी दमित इच्छा की प्रतिक्रिया देते हैं ,,,ये इस रूप में ....
मैं अपने अध्ययन काल से ही प्रेम विषय पे शोधार्थी  रहा हूँ........केवल शैधान्तिक रूप से ......(....प्रयोग करने की कभी हिम्मत नहीं हुई)......................
मेरे कई मित्र जिन्हें दुनिया की नजर में पागल कहा जाता था.........वास्तव में  वे कुछ पा गए थे (ये व्याख्या मेरी छोटी बहन ने की थी)  इस अंदाज में घूमते रहते थे.............(.उनमे से किसी की भी प्रेम कहानी अपने अंजाम तक नहीं पहुँच सकी .........कारण चाहे जो रहा हो............)...
                उन लोगो को देखके दिल बड़ा खुश हो जाया करता था............अच्छा लगता था...आज भी मैं एक शोधार्थी ही हूँ.........लेकिन  अब कई नए आयाम दिखाई पड़ने लगे हैं..अब शायद सोच का विस्तार हो गया है ..........प्रेमियों की व्यथा देखिये....
प्रेमी युगल पहले तो आपस के विश्वास के लिए लड़ते हैं......फिर दुनिया से लड़ते हैं.........प्यार की जगह लड़ना ही उनकी नियति बन जाती है....मोहब्बत के लिए वक्त ही नहीं मिलता  वैसे  .आज के समय में मोहब्बत भी बहुत  तेज हो गयी है.........रात रात भर जाग के मोबाइल से बाते करते रहना उन्हें एक दुसरे के एकदम नजदीक पहुंचा देता है........जीने मरने की कसमों के साथ साथ उनका प्यार परवान चढ़ता है.................
लेकिन कुछ छुटता  जा रहा है...........देखा गया है की प्रेम विवाह से ज्यादा व्यवस्थित विवाह  सफल होते हैं.(या दिखाया जा रहा है)..............हमारे देश में विवाह केवल दो  व्यक्तियों का सम्बन्ध नहीं होता बल्कि ये दो परिवारों के  संबंधो पे आधारित होते हैं.............प्रेमी जोड़े अपने परिवार और समाज को राजी करके आगे बढ़ने का प्रयास करते हैं (करना चाहिए)....जबकि अभिभावकों को इस प्रस्थिति  में व्यक्ति (प्रियजन) की मानसिक स्थिति का अनुमान करके ही उसके अनुरूप आचरण करना चाहिए..............
समाज के स्थायित्व के लिए ये अवश्यक है की नियमों का पालन कड़े रूप में किया जाये ..........प्रेम और व्यभिचार में भेद हो,,,,,, किन्तु प्रेम के साथ वही दुर्दांत व्यव्हार न दोहराया जाना चाहिए....जैसा प्रेमियों के साथ अब तक दोहराया जाता रहा है......
        मुझे तो कभी कभी ये सोच के शर्म आती है की मैं उस देश का नागरिक हूँ जिसमे प्रेम की चर्चा हो तो कृष्ण, मीरा, राधा, शबरी, राम,,,,,,,,,का नाम तो खूब ज्रोरो सेलिया जाता  है.......भक्ति में शीश नवाया जाता है.......लेकिन आज भी किसी भी प्रेमी जोड़े को सम्मान के साथ स्थान नहीं दिया जाता....उन्हें आत्महंता बनने पे मजबूर कर दिया जाता है............कभी गोत्र के नाम पे, कभी धर्म, जाति या फिर कोई और आधार ढूंढ लिया जाता है................
बारबार हम मीरा के भजनों को सुनके आंसू बहते हैं लेकिन पता  नहीं हमने क्या सिखा की आज भी दो व्यक्तियों के सम्बन्ध को हम स्वीकृति नहीं दे पाते ......स्वीकृति तो दूर की बात है उन्हें मानसिक सहयोग भी नहीं दिया जाता.......
ये लेख केवल प्रेमी युगल; अर्थात लड़का या लड़की से ही सम्बंधित नहीं है......प्रेम के व्यापक आकाश में कई समबन्ध है जिनका आधार प्रेम ही है.............इश्वर के पुजारी तुलसी, कबीर , नरोत्तम दास  या फिर कोई सूफी संत ........सभी ने खुदा को प्यार कहा है......सभी धर्माचार  मोहब्बत के आगे असफल हो जाते हैं......क्योंकि धर्मं का आधार भी प्रेम ही  है..................प्रेम जीवन जीने का तरिका  है.....जीवन का विस्तार है.........इसका रंग हैं ..........खुदा का नूर है.........किसी के लिए कुछ भी कर गुजरने का अरमान है ......वो भक्ति है पूजा है.................प्रतेक संबंधो की जड़ है.................
लेकिन हमारे लोग जिन्हें हम नफरत भी नहीं कर सकते (क्योंकि मोहब्बत नफ़रत नहीं सिखाती ),,,,,,,,,,,,बार बार यीशु को शूली पे चढ़ाके (हम) रोते आये हैं लेकिन आज तक (हमें)  उनका मार्ग समझ में नहीं आया...........
          दुनिया में जीवन जीने (शांति पाने) के दो रस्ते हैं एक दिल का,,,, एक दिमाग का ........दिमाग तर्कों में उलझता है जबकि दिल अक्सर एक बार में निर्णय लेता है.....और  जो सही भी होता है.............
जब अपना संविधान इतना अध्यात्मिक है की वो सभी को सामान अधिकार देता है लेकिन हम एक अच्छे नागरिक भी नहीं बन पाए जो इसकी कदर कर सके ......और मानव मात्र का सम्मान कर सके///////////////////
            आज भी खाप पंचायत की तरफदारी करने वाले मिल जायेंगे और तर्क भी जुटा लेंगे............मैं सिर्फ इतना कहता हूँ की अपने दिल से पूछिये क्या आप जो कर रहे हैं सही है?
अरे किसी को बचाने के लिए आप उसकी जान ले ले रहे हो और उसके भले की सोच रहे हो.भाई वाह  !.....उसका जीवन है वो अपने किये की सजा आजीवन भुगतने को तैयार है फिर आप अपने सीमा का उल्लंघन करके उसके जीवन का निर्धारण करने का प्रयास क्यों कर रहे हो?
आप सलाह दे सकते हो, समझा सकते हो  किन्तु विकल्पों में से चयन उस व्यक्ति विशेस का ही होना चाहिए..................ये उसका अधिकार है............जो हमारा संविधान उसे देता है....
मानव जीवन सदैव आधार खोजता रहता है,,,,, जिस के पास जाके उसकी सारी चिंता दुःख तकलीफ सब कम हो जाते हैं...........प्रारम्भ  में व्यक्ति निस्वार्थ प्रेम पाता है ,,,,,,,बाद में वो प्यार करना सीखता है उसे लौटना सीखता है ........इस तरह दुनिया का नाटक चलता है.....जीवन आनंदित होता है और सुखमय बनता है......................
लेकिन अब खाप पंचायत वाले कहेंगे की पहले किसी से मिलो तो उससे उसकी नाम, जाति , धर्म, गोत्र, सब कुछ पूछ लो फिर दिल से कहो की वो धडके.........
लेकिन बंधू ,,,,,,,जब सदियों से उन्होंने जैसा किया है  वे नहीं सुधरे तो प्रेमी कहा मानने वाले हैं...............वे भी अपनी धुन के पक्के ..........चले जा रहे हैं....................व्यथा के ओर...मस्ती में झूमते हुए...
(मोहब्बत है क्या बस इतना समझ लीजिये एक आग का दरिया है और डूब के पर जाना है ..........ग़ालिब ,,,ये फूलों की सेज में कब बदल पायेगा ,,,,,,,,,,,,,,,,,,)..
(कोई भी संवेदन शील व्यक्ति,, वो प्रेमी होता है...........उसका प्रेम व्यक्ति विशेष के प्रति न होके भावना विशेस की ओर होता है......किसी के साथ पुस्तकों का प्रेम किसी के साथ माता-पिता का प्रेम, किसी के साथ देश प्रेम होता है.........आधार कुछ भी हो लेकिन प्रेम तो संवेदना है.......जिम्मेदारी है......
अतः सभी संवेदन शील व्यक्तिसे मेरा  एक विनम्र निवदेन है की कही भी प्रेम की फुहार हो और अगर आप उसे अपने दिल से पूछे सही है तो उसका कम से कम मानसिक समर्थन जरुर करें.....................
एक व्यथित प्रेमी की ओर से..........साभार ......)

1 comment:

Manish said...

कोई भी संवेदन शील व्यक्ति,, वो प्रेमी होता है...........उसका प्रेम व्यक्ति विशेष के प्रति न होके भावना विशेस की ओर होता है......किसी के साथ पुस्तकों का प्रेम किसी के साथ माता-पिता का प्रेम, किसी के साथ देश प्रेम होता है.........आधार कुछ भी हो लेकिन प्रेम तो संवेदना है.......जिम्मेदारी है......

कितना सुन्दर लेख, लेकिन मियाँ यहाँ पोल खोलना उचित नहीं, अकेले मिलिये अच्छे से कमेंट मिलेगा