Monday, May 3, 2010

मासूम इर्ष्या....

ईर्ष्या.........आम तौर पे इसे नकारात्मक भावना के साथ जोड़ा जाता है........किन्तु मैंने इसे मासूम इर्ष्या का नाम इसलिए दिया है की वे बेचारे इससे ग्रसित होने पे बड़े ही नादानी से अपनी हरकतों द्वारा सामने वालों को कष्ट देने का पूरा प्रयास करते हैं ..............(.कभी कभी तो कुछ देर के लिए सफल भी हो जाते हैं................
इनका इलाज तो बस ये है की इन पर ध्यान न दो......वो कष्ट से मर जायेंगे..).......

                    मैं इसकी जरा व्याख्या करता हूँ..........
कुछ दिन पहले मैं गाँव गया था....काफी दिनों बाद गाँव जाने पे मन में एक अलग उत्साह होता  ही है/..वही स्थितिया अब नयी और आकर्षक लगती हैं.........लोग, खेत , पेड़ , नहर ,,सब कुछ और ज्यादा करीब लगता है...(दुरी होने पर ही प्यार का एहसास होता है )
 लोग हंस के मिल रहे थे,खुश थे  ................................ उनमे से  कुछ लोग तो खुश थे  हंस रहे थे लेकिन कुछ के व्यंग्य क्रोध दिला रहे थे......मुझे गुस्सा इस बात पे आ रही थी की वे निरर्थक तुलना कर रहे थे. मुझे समझ नहीं आ रहा था की मैं जब तक सफल नहीं था तब तक उनका था, ज्योंही सफल हुआ उनका लक्ष्य बन गया और सहज इर्ष्या का शिकार हो गया.......
               मजा तो तब आता है जब आपके चाची , बड़ी मम्मी इस प्रकार से  व्यंग्य कहे की  जैसे आप कुछ समझ नहीं सकते और वे दुनिया के सबसे चतुर लोग हैं,  तो बहुत बुरा भी  लगता है और आश्चर्य भी होता hai.................
    मेरे साथ दीदी भी गयी थी, विवाह के बाद उनकी पहली ग्राम -यात्रा थी/ मेरे साथ कुछ विनम्रता के साथ व्यव्हार किया जा रहा था लेकिन दीदी को तो स्वागत के बजाय व्यंग्य के घोल दिए जा रहे थे............
कोशिश की जा रही थी की वो हँसे नहीं बल्कि रो के अपने ससुराल के दुखों को प्रगट करें........
मैं इसका कारण नहीं समझ पा रहा था......................
            शाम को हम अपने द्वार पे अमरुद के पेड़ के निचे बैठे , लोगों के बदले व्यवहार से दुखी थे ........हम भाई बहन इसका कारण नहीं समझ पा रहे थे ...........
कुछ देर बाद मम्मी- पापा भी हमारे पास आ गए.......उन्होंने हमसे बाते की और जानना चाहा की तुम लोग दुखी क्यों हो?
मैंने कहा  की लोग अचानक ऐसा व्यव्हार क्यों कर रहे हैं,?.सब स्वार्थी हैं, मुर्ख कपटी और ईर्ष्यालु हैं.......
   पापा ने गंभीरता से मेरी बात सुनी और कहा की उन लोगों के व्यवहार को समझने की कोशिस करो.......वे लोग ऐसा क्यों करते हैं ये जानने की कोशिस करो............मैं तुम्हे समझाता हूँ...............देखो, लोगों को प्रतियोगिता और संघर्ष में अंतर नहीं समझ में आता , और हम उनसे इतने की उम्मीद भी नहीं कर सकते....(क्योंकि अगर वो इतना सोच लेते तो वो कहीं और होते) ....प्रतियोगिता में आप दूसरों की सफलता का आनंद लेते हैं और वैसा करने का प्रयास करते हैं....लेकिन संघर्ष में आप इर्ष्या करने लगते हैं.और किसी तरह अपने विपक्षी को हारते देखना चाहते हैं.....या उनसे नफरत करने लगते हैं...........
        .मेरी छोटी बहन  हँसते हुए बोली "प्यार और जंग में सब जायज़ है." है न ? सभी उसकी तरफ देखने लगे,मैंने उसे घुर की पापा बैठे हैं , (लेकिन जब आप तर्क और ज्ञान की बात करते हैं  तो फिर मर्यादा की आड़  लेके बच्चों के सहज प्रश्नों से भागना  नहीं चाहिए)
     पापा बोले अगर प्यार में नफरत या फिर प्रिय को निचा दिखाना आ जाये तो वो प्यार नहीं हो सकता...........और रही जंग  की बात तो फिर बोलने तक ही क्यों ? कुछ हथियार का इस्तेमाल करो.
       मैंने परेशां हो  के पुछा तो फिर ये क्या है...........हम उन्हें प्यार करते हैं सम्मान देते हैं और वे दीदी को ऐसे बोल रहे हैं........
         पापा ने कहा की व्यक्ति की ऐसी प्रवित्ति होती है की वो तुलना करके खुद को खुश महसूस करता है...अब तुम लड़के हो तो मान लो की वो औरते तुमसे इतनी इर्ष्या नहीं कर पा रही की वे तुम्हे दूसरा समझती हैं...और वे तुम्हे खुद से आगे मानती हैं जिससे वे तुमसे तुलना नहीं कर पा रही .....तुमने गौर किया होगा की तुम्हे उन्ही ने व्यंग्य किया जिनका पुत्र तुम्हारी उम्र का होगा..........अब दीदी के केस में सभी औरते हैं और दीदी का सुख उन्हें तुलनात्मक रूप से ज्यादा लग रहा है इसलिए सभी मिल के उन्हें निचा दिखा के खुश होने का प्रयास कर रही हैं.या यूँ कहो की अपने दुखों को कम करने का प्रयास कर रही हैं ....................
        मैंने कहा तो ये बात है.................तब तो बेचारे कितने मासूम हैं की ये भी नहीं समझ पा रहे की जीवन को खुश बनाने के लिए दूसरों को निचा दिखाना नहीं बल्कि उन्हें सम्मान देना होता है........
प्रकृति में जो आप देते हो प्रकृति उसी को आप  को लौटाती है.........मुझे सब समझ में आ गया.............

" लेकिन अचानक एक बात दिमाग में आई की यहाँ तो सभी पिता के उम्र के हैं और सभी के बच्चे हैं ............मतलब पापा को तो रोज हर बात पे इनके उलटे सीधे व्यंग्यों  को झेलना होता होगा.....और माँ  का क्या होता होगा? शरीर में  एक सिहरन सी दौड़ गयी और मेरा मन श्रधा से उनके चरणों में झुक गया...........
       और फिर  मासूम इर्ष्या पे क्रोध करने  के बजाय हंसी आने लगी (सच माता पिता के बिना सुखी जीवन  की कल्पना नहीं की जा सकती )........ 
 तभी मेरी माँ की आवाज सुनाई दी की अब चलो सब लोग खाना खा लो और हम सब अपने मानसिक दुखों से छुट के भोजन (भौतिक) सुख लेने चल पड़े...................

3 comments:

राजेन्द्र मीणा 'नटखट' said...

सच को स्पर्श करते हुए आपने एक ..अच्छा सन्देश दिया है ...और आपके पिता जी के विचार भी बहुत प्रेरणादायक है ..पहली बार आया आपके ब्लॉग पर ....ख़ुशी हुई बस ..कलम को कैद ना करे ...युही चलते रहे एक दिन आपकी मंजिल के बहुत करीब ले जायेगी बस उसे हांसिल करने में सयंम के आवश्यकता होगी ......आपका सन्देश अच्छा है ...एक सुन्दर अभिव्यक्ति के लिए बधाई स्वीकारे ........कभी समय हो तो यहाँ भी नज़र डाले आपकी टिपण्णी अमूल्य है hamraae लिए ..

http://athaah.blogspot.com/

Shekhar Kumawat said...

bahut khub

Manish said...

आप मासूम इर्ष्या से परेशान हैं और हम कठोर उलाहना से......... एक सफल होकर झेलता हैं एक असफल होकर..... किसी भी स्थिति मे ये रावण के खानदान वाले नहीं छोड़ते.... आखिर राक्षसी प्रवृत्ति छोड़ देना उनके लिए गुनाह सामान हैं.... फिर भी आपके मन में उपजे इस भाव का हम सम्मान करते हैं...