Thursday, May 27, 2010

........सत्य की स्वीकारोक्ति ..

                     जीवन में कभी कभी खुद से आंखे मिला लेने से कोई क्षति नहीं होती..........लेकिन कभी कभी जहाँ आपकी नजर नहीं पहुँच पाए वहां कोई मित्र कोई सम्बन्धी या फिर कोई अपरिचित इश्वर का दूत बनके आपको अपने आप से मिलवा ही देता है...........अब ये कब होगा ये तो विधाता ही जाने...............
                आप सोच रहे होंगे ये व्यक्ति लम्बी लम्बी देने लगा...........इसका प्रवचन शुरू हो गया........लेकिन रुकिए मैं  अपराधबोध से ग्रसित हूँ और  क्षमा याचना करना चाहता हूँ..........(.और इसमें वो सबकुछ लिखूंगा जिससे शायद मैं इस बोझ से दूर हो जाऊं और .................)
             मुझे जब पाता चला की मेरा मित्र मनीष ब्लोग्ग लिखता है तो मैंने उसके सारे ब्लॉग पढ़ डाले........कुछ दिन के अन्दर ही मैं वो सब पढ़ गया.जो उन्होंने लिखे थे .....
               बंधू लिखते तो कॉलेज के समय से ही थे किन्तु उसपर इतनी गंभीरता से कभी सोचा नहीं.गया पर हाँ वो तब भी इतने प्यारे लगते थे.,,,जितने अब हैं लेकिन .......................अब तो वे काफी प्रगति कर चुके हैं और विकास भी ...........सच कहूँ तो व्यक्ति अपनी सीधी साधी सोच के साथ अपने जीवन में कितना ऊँचा स्थान प्राप्त कर लेता है इसे वो स्वयं नहीं जानता (आज जब दुनिया में अधिकांस लोग सफलता को मापने के लिए केवल धन के आधार पे सोचते हैं ,,,जब युवा केवल  किसी नौकरी पाने तक खुद को सिमित कर लेता है वैसे समय संसार में कुछ विशेष लोग ही संवेदना को जीवित रखे हुए हैं और इश्वर ने उन्हें यदि तकलीफ भी दी तो संसार में संवेदना को जीवित रखने के लिए ही ....और मेरे मित्र उन्ही में से एक है ,,,,,और मुझे इसका गर्व भी है )...सोच के स्तर से लेके व्यव्हार तक कुल मिलाके एक अंतर्दृष्टि  विकसित हो गयी है उनकी,,,,, और एक तरीका भी भावों को अभिव्यक्त करने का  .......
                           खैर  कॉलेज में यह केवल  मन बहलाव का साधन मात्र था..........उनकी लिखी कविताओं का पाठ तो मैं कभी कभी प्रतियोगिता  में भी किया करता था............अब प्रतियोगिता का परिणाम क्या होता ये तो नहीं बताऊंगा........क्योंकि वे प्रारम्भिक  दिन थे ............और हम भविष्य के गर्त में छिपे सत्य से बिलकुल अनजान ..........केवल जीवन के प्रसंगों की तुकबंदी करके आनंद लिया करते थे...........
                  पिछले जनवरी में जब मैं दिल्ली आया तब मै इन्टरनेट के संपर्क पूर्ण रूप से  आया और खूब जम के पढ़ा ब्लोग्गों को.................
            और मन में एक सहज इच्छा जगी की क्यों न मैं भी लिखूं..........लेकीन इतनी जल्दी कोई इतनी गंभीरता नहीं ला सकता...........और मुझे शुरुआत करने के लिए कुछ विषय नहीं मिल पा रहा था...जो कुछ आज तक सोचा था उन्हें ही तुकबन्दी करके लिखा ....सबसे बढ़िया करने का अहंकार लिए मैं लिखने लगा......कुछ लेख लिखा और उसपे पाठक जन और मित्रों के सहयोग ने मेरी हिम्मत बढाई लेकिन कुछ लेखों के बाद मैं तुलनातमक रूप से सोचने लगा................मेरे लेख भिन्न तो थे ,,,,,,,,लेकिन मुझे स्वयं वो बहुत अच्छे नहीं लगते थे  (कारण बस एक अहंकार,)..........लेकिन फिर मैंने सोचा की ऐसा होता ही है.........अपने लेख स्वयं को अच्छे नहीं लगते ............मैं उन्हें, लोगों के प्रतिक्रिया के आधार पे सोचने लगा.......(ये अहंकार खुद को तुष्ट करने के लिए खुद ही कारण ढूंढ़ लेता है और ख़ुशी का भ्रम करने लगता है   )........
                     "वास्तव में जब आप जबरन कोई काम करते हैं ,,,,तो उसमे से रचनाताम्कता ख़त्म हो जाति है....और केवल शब्दों का शरीर रह जाता है ,उसके भाव उससे तिरोहित हो जाते हैं................हम जैसे मूढ़ मति केवल लिखने के चक्कर में ये भूल जाते हैं की शब्दों का कोई अर्थ नहीं रह जाता जब तक आप अनुभव युक्त होके, अपने विशिष्ट  नजरिये से घटना का अध्ययन   न कर ले ..........और ..........उसे समझ न सके....
               यही कारण है की हम केवल अपने अहम्तुष्टि  के लिए लिखते चले जाते हैं और साहित्य को कूड़ा बना डालते हैं...............मैं अब तक जिस मनाह्स्तिथि में था उसी में अधिकतर लेखक रह जाते हैं और अपने कर्तव्यों की इतिश्री भावना विहीन लेखों की रचना  करके संतुष्ट हो जाते हैं..................
(आज मनीष के लेख 'पिछले बकवास की व्याख्या' पढके ऐसा लगा जैसे कोई मुझे इस बुरे से बचाने का प्रयास कर रहा है,,,,,,,,,,,,,,,मैं तो भाग्यवान हूँ के मेरे पास मनीष है.........)
           आज तक मैं ये सोचता रहता था की मेरे लेखों में गहराई क्यों नहीं है...अब समझ में आया की ......मैं तर्कों और शब्दों के जाल में उलझ के रह गया था.   .......   लेकिन अब नहीं ...........
            कविता तो बड़े बड़े लेखों का निचोड़ होता है...........और कविता को समझने के लिए एक अंतर्दृष्टि चाहिए जो संसार के रंगमंच पे अनुभव के रसों ( कटु अनुभव )से होके गुजरने के बाद ,,ही आ पाता hai,,,,,,,,जब मन अपेक्षाओं  के बोझ से मुक्त हो जाता है..........जब कोई भी कार्य किसी के प्रभाव बस न होके स्वाभाव बस किया जाये तो हकीकत भी आती है और गहराई भी...........
        खैर छोडिये मैं भी कहाँ की बात कहाँ ले गया..........मैं सभी पाठक जन से वादा  करता हूँ की मैंने उनका अब तक खूब  मानसिक शोसन किया है.........लेकिन अब मैं अपनी गलती सुधारना चाहता हूँ.....इसलिए  अब जब तक सत्य को समझ न लूँ और ह्रदय पूर्ण रूप से इस सत्य का अभाश न कर ले तब तक किसी लेख में बेवजह शब्दों का प्रयोग नहीं करूँगा.............

Monday, May 24, 2010

व्यथित प्रेम....

 इस संधर्भ को को देखकर आप सोच रहे होंगे.....की प्रेम वो भी व्यथित ,,,,,,,,,कुछ दिलचस्प होगा.............
तो आप सही है...........दिलचस्प का तात्पर्य ही होता है जो दिल में चस्पा हो जाये वही  दिलचस्प है...........
खैर आज मुझे प्रेम की व्यथा लिखने की प्रेरणा कहा से हुई पहले ये बताता चलूँ........पिछले दिनों मैंने "खाप पंचायत" के बारे में अपने सहकर्मियों के माध्यम से जाना..............
   खाप पंचायत "समाज के स्थायित्व के ठेकेदारों की ऐसी फौज होती है जो दिल पे पहरा लगाने की नाकाम कोशिस को वैधता प्रदान करने का प्रयास करती है." और इस प्रयास में वो प्रेमियों को जिन्दा जलाने से लेकर उन सभी कार्य को वैधता प्रदान करने की कोशिस करती है जो मानवाधिकारों के हनन से सम्बंधित होते हैं...'
इन मूर्खों ने अपने अनुसार शाश्त्रों की व्याख्या भी करनी सीख ली है..(करते तो ये बहुत पहले से आये हैं, लेकिन अब नये कलेवर में)..............
जैसे ........मनुस्मृति में ये लिखा है........एकं त्याजयेत कुलं सार्थे, त्यजेत कुलं रास्त्र सार्थे..........इत्यादि.
अब भैया जो मनु के कल में सही था जरुरी तो नहीं की आज भी सही हो..........वक्त बदलता है,,,,,,,मूल्य बदलते हैं....विचार बदलते है.......पहले राजतन्त्र था अब लोकतंत्र है...........लेकिन इन मूर्खों को फ्रायड के शब्दों में कहूँ तो अपनी दमित इच्छा की प्रतिक्रिया देते हैं ,,,ये इस रूप में ....
मैं अपने अध्ययन काल से ही प्रेम विषय पे शोधार्थी  रहा हूँ........केवल शैधान्तिक रूप से ......(....प्रयोग करने की कभी हिम्मत नहीं हुई)......................
मेरे कई मित्र जिन्हें दुनिया की नजर में पागल कहा जाता था.........वास्तव में  वे कुछ पा गए थे (ये व्याख्या मेरी छोटी बहन ने की थी)  इस अंदाज में घूमते रहते थे.............(.उनमे से किसी की भी प्रेम कहानी अपने अंजाम तक नहीं पहुँच सकी .........कारण चाहे जो रहा हो............)...
                उन लोगो को देखके दिल बड़ा खुश हो जाया करता था............अच्छा लगता था...आज भी मैं एक शोधार्थी ही हूँ.........लेकिन  अब कई नए आयाम दिखाई पड़ने लगे हैं..अब शायद सोच का विस्तार हो गया है ..........प्रेमियों की व्यथा देखिये....
प्रेमी युगल पहले तो आपस के विश्वास के लिए लड़ते हैं......फिर दुनिया से लड़ते हैं.........प्यार की जगह लड़ना ही उनकी नियति बन जाती है....मोहब्बत के लिए वक्त ही नहीं मिलता  वैसे  .आज के समय में मोहब्बत भी बहुत  तेज हो गयी है.........रात रात भर जाग के मोबाइल से बाते करते रहना उन्हें एक दुसरे के एकदम नजदीक पहुंचा देता है........जीने मरने की कसमों के साथ साथ उनका प्यार परवान चढ़ता है.................
लेकिन कुछ छुटता  जा रहा है...........देखा गया है की प्रेम विवाह से ज्यादा व्यवस्थित विवाह  सफल होते हैं.(या दिखाया जा रहा है)..............हमारे देश में विवाह केवल दो  व्यक्तियों का सम्बन्ध नहीं होता बल्कि ये दो परिवारों के  संबंधो पे आधारित होते हैं.............प्रेमी जोड़े अपने परिवार और समाज को राजी करके आगे बढ़ने का प्रयास करते हैं (करना चाहिए)....जबकि अभिभावकों को इस प्रस्थिति  में व्यक्ति (प्रियजन) की मानसिक स्थिति का अनुमान करके ही उसके अनुरूप आचरण करना चाहिए..............
समाज के स्थायित्व के लिए ये अवश्यक है की नियमों का पालन कड़े रूप में किया जाये ..........प्रेम और व्यभिचार में भेद हो,,,,,, किन्तु प्रेम के साथ वही दुर्दांत व्यव्हार न दोहराया जाना चाहिए....जैसा प्रेमियों के साथ अब तक दोहराया जाता रहा है......
        मुझे तो कभी कभी ये सोच के शर्म आती है की मैं उस देश का नागरिक हूँ जिसमे प्रेम की चर्चा हो तो कृष्ण, मीरा, राधा, शबरी, राम,,,,,,,,,का नाम तो खूब ज्रोरो सेलिया जाता  है.......भक्ति में शीश नवाया जाता है.......लेकिन आज भी किसी भी प्रेमी जोड़े को सम्मान के साथ स्थान नहीं दिया जाता....उन्हें आत्महंता बनने पे मजबूर कर दिया जाता है............कभी गोत्र के नाम पे, कभी धर्म, जाति या फिर कोई और आधार ढूंढ लिया जाता है................
बारबार हम मीरा के भजनों को सुनके आंसू बहते हैं लेकिन पता  नहीं हमने क्या सिखा की आज भी दो व्यक्तियों के सम्बन्ध को हम स्वीकृति नहीं दे पाते ......स्वीकृति तो दूर की बात है उन्हें मानसिक सहयोग भी नहीं दिया जाता.......
ये लेख केवल प्रेमी युगल; अर्थात लड़का या लड़की से ही सम्बंधित नहीं है......प्रेम के व्यापक आकाश में कई समबन्ध है जिनका आधार प्रेम ही है.............इश्वर के पुजारी तुलसी, कबीर , नरोत्तम दास  या फिर कोई सूफी संत ........सभी ने खुदा को प्यार कहा है......सभी धर्माचार  मोहब्बत के आगे असफल हो जाते हैं......क्योंकि धर्मं का आधार भी प्रेम ही  है..................प्रेम जीवन जीने का तरिका  है.....जीवन का विस्तार है.........इसका रंग हैं ..........खुदा का नूर है.........किसी के लिए कुछ भी कर गुजरने का अरमान है ......वो भक्ति है पूजा है.................प्रतेक संबंधो की जड़ है.................
लेकिन हमारे लोग जिन्हें हम नफरत भी नहीं कर सकते (क्योंकि मोहब्बत नफ़रत नहीं सिखाती ),,,,,,,,,,,,बार बार यीशु को शूली पे चढ़ाके (हम) रोते आये हैं लेकिन आज तक (हमें)  उनका मार्ग समझ में नहीं आया...........
          दुनिया में जीवन जीने (शांति पाने) के दो रस्ते हैं एक दिल का,,,, एक दिमाग का ........दिमाग तर्कों में उलझता है जबकि दिल अक्सर एक बार में निर्णय लेता है.....और  जो सही भी होता है.............
जब अपना संविधान इतना अध्यात्मिक है की वो सभी को सामान अधिकार देता है लेकिन हम एक अच्छे नागरिक भी नहीं बन पाए जो इसकी कदर कर सके ......और मानव मात्र का सम्मान कर सके///////////////////
            आज भी खाप पंचायत की तरफदारी करने वाले मिल जायेंगे और तर्क भी जुटा लेंगे............मैं सिर्फ इतना कहता हूँ की अपने दिल से पूछिये क्या आप जो कर रहे हैं सही है?
अरे किसी को बचाने के लिए आप उसकी जान ले ले रहे हो और उसके भले की सोच रहे हो.भाई वाह  !.....उसका जीवन है वो अपने किये की सजा आजीवन भुगतने को तैयार है फिर आप अपने सीमा का उल्लंघन करके उसके जीवन का निर्धारण करने का प्रयास क्यों कर रहे हो?
आप सलाह दे सकते हो, समझा सकते हो  किन्तु विकल्पों में से चयन उस व्यक्ति विशेस का ही होना चाहिए..................ये उसका अधिकार है............जो हमारा संविधान उसे देता है....
मानव जीवन सदैव आधार खोजता रहता है,,,,, जिस के पास जाके उसकी सारी चिंता दुःख तकलीफ सब कम हो जाते हैं...........प्रारम्भ  में व्यक्ति निस्वार्थ प्रेम पाता है ,,,,,,,बाद में वो प्यार करना सीखता है उसे लौटना सीखता है ........इस तरह दुनिया का नाटक चलता है.....जीवन आनंदित होता है और सुखमय बनता है......................
लेकिन अब खाप पंचायत वाले कहेंगे की पहले किसी से मिलो तो उससे उसकी नाम, जाति , धर्म, गोत्र, सब कुछ पूछ लो फिर दिल से कहो की वो धडके.........
लेकिन बंधू ,,,,,,,जब सदियों से उन्होंने जैसा किया है  वे नहीं सुधरे तो प्रेमी कहा मानने वाले हैं...............वे भी अपनी धुन के पक्के ..........चले जा रहे हैं....................व्यथा के ओर...मस्ती में झूमते हुए...
(मोहब्बत है क्या बस इतना समझ लीजिये एक आग का दरिया है और डूब के पर जाना है ..........ग़ालिब ,,,ये फूलों की सेज में कब बदल पायेगा ,,,,,,,,,,,,,,,,,,)..
(कोई भी संवेदन शील व्यक्ति,, वो प्रेमी होता है...........उसका प्रेम व्यक्ति विशेष के प्रति न होके भावना विशेस की ओर होता है......किसी के साथ पुस्तकों का प्रेम किसी के साथ माता-पिता का प्रेम, किसी के साथ देश प्रेम होता है.........आधार कुछ भी हो लेकिन प्रेम तो संवेदना है.......जिम्मेदारी है......
अतः सभी संवेदन शील व्यक्तिसे मेरा  एक विनम्र निवदेन है की कही भी प्रेम की फुहार हो और अगर आप उसे अपने दिल से पूछे सही है तो उसका कम से कम मानसिक समर्थन जरुर करें.....................
एक व्यथित प्रेमी की ओर से..........साभार ......)

Monday, May 3, 2010

मासूम इर्ष्या....

ईर्ष्या.........आम तौर पे इसे नकारात्मक भावना के साथ जोड़ा जाता है........किन्तु मैंने इसे मासूम इर्ष्या का नाम इसलिए दिया है की वे बेचारे इससे ग्रसित होने पे बड़े ही नादानी से अपनी हरकतों द्वारा सामने वालों को कष्ट देने का पूरा प्रयास करते हैं ..............(.कभी कभी तो कुछ देर के लिए सफल भी हो जाते हैं................
इनका इलाज तो बस ये है की इन पर ध्यान न दो......वो कष्ट से मर जायेंगे..).......

                    मैं इसकी जरा व्याख्या करता हूँ..........
कुछ दिन पहले मैं गाँव गया था....काफी दिनों बाद गाँव जाने पे मन में एक अलग उत्साह होता  ही है/..वही स्थितिया अब नयी और आकर्षक लगती हैं.........लोग, खेत , पेड़ , नहर ,,सब कुछ और ज्यादा करीब लगता है...(दुरी होने पर ही प्यार का एहसास होता है )
 लोग हंस के मिल रहे थे,खुश थे  ................................ उनमे से  कुछ लोग तो खुश थे  हंस रहे थे लेकिन कुछ के व्यंग्य क्रोध दिला रहे थे......मुझे गुस्सा इस बात पे आ रही थी की वे निरर्थक तुलना कर रहे थे. मुझे समझ नहीं आ रहा था की मैं जब तक सफल नहीं था तब तक उनका था, ज्योंही सफल हुआ उनका लक्ष्य बन गया और सहज इर्ष्या का शिकार हो गया.......
               मजा तो तब आता है जब आपके चाची , बड़ी मम्मी इस प्रकार से  व्यंग्य कहे की  जैसे आप कुछ समझ नहीं सकते और वे दुनिया के सबसे चतुर लोग हैं,  तो बहुत बुरा भी  लगता है और आश्चर्य भी होता hai.................
    मेरे साथ दीदी भी गयी थी, विवाह के बाद उनकी पहली ग्राम -यात्रा थी/ मेरे साथ कुछ विनम्रता के साथ व्यव्हार किया जा रहा था लेकिन दीदी को तो स्वागत के बजाय व्यंग्य के घोल दिए जा रहे थे............
कोशिश की जा रही थी की वो हँसे नहीं बल्कि रो के अपने ससुराल के दुखों को प्रगट करें........
मैं इसका कारण नहीं समझ पा रहा था......................
            शाम को हम अपने द्वार पे अमरुद के पेड़ के निचे बैठे , लोगों के बदले व्यवहार से दुखी थे ........हम भाई बहन इसका कारण नहीं समझ पा रहे थे ...........
कुछ देर बाद मम्मी- पापा भी हमारे पास आ गए.......उन्होंने हमसे बाते की और जानना चाहा की तुम लोग दुखी क्यों हो?
मैंने कहा  की लोग अचानक ऐसा व्यव्हार क्यों कर रहे हैं,?.सब स्वार्थी हैं, मुर्ख कपटी और ईर्ष्यालु हैं.......
   पापा ने गंभीरता से मेरी बात सुनी और कहा की उन लोगों के व्यवहार को समझने की कोशिस करो.......वे लोग ऐसा क्यों करते हैं ये जानने की कोशिस करो............मैं तुम्हे समझाता हूँ...............देखो, लोगों को प्रतियोगिता और संघर्ष में अंतर नहीं समझ में आता , और हम उनसे इतने की उम्मीद भी नहीं कर सकते....(क्योंकि अगर वो इतना सोच लेते तो वो कहीं और होते) ....प्रतियोगिता में आप दूसरों की सफलता का आनंद लेते हैं और वैसा करने का प्रयास करते हैं....लेकिन संघर्ष में आप इर्ष्या करने लगते हैं.और किसी तरह अपने विपक्षी को हारते देखना चाहते हैं.....या उनसे नफरत करने लगते हैं...........
        .मेरी छोटी बहन  हँसते हुए बोली "प्यार और जंग में सब जायज़ है." है न ? सभी उसकी तरफ देखने लगे,मैंने उसे घुर की पापा बैठे हैं , (लेकिन जब आप तर्क और ज्ञान की बात करते हैं  तो फिर मर्यादा की आड़  लेके बच्चों के सहज प्रश्नों से भागना  नहीं चाहिए)
     पापा बोले अगर प्यार में नफरत या फिर प्रिय को निचा दिखाना आ जाये तो वो प्यार नहीं हो सकता...........और रही जंग  की बात तो फिर बोलने तक ही क्यों ? कुछ हथियार का इस्तेमाल करो.
       मैंने परेशां हो  के पुछा तो फिर ये क्या है...........हम उन्हें प्यार करते हैं सम्मान देते हैं और वे दीदी को ऐसे बोल रहे हैं........
         पापा ने कहा की व्यक्ति की ऐसी प्रवित्ति होती है की वो तुलना करके खुद को खुश महसूस करता है...अब तुम लड़के हो तो मान लो की वो औरते तुमसे इतनी इर्ष्या नहीं कर पा रही की वे तुम्हे दूसरा समझती हैं...और वे तुम्हे खुद से आगे मानती हैं जिससे वे तुमसे तुलना नहीं कर पा रही .....तुमने गौर किया होगा की तुम्हे उन्ही ने व्यंग्य किया जिनका पुत्र तुम्हारी उम्र का होगा..........अब दीदी के केस में सभी औरते हैं और दीदी का सुख उन्हें तुलनात्मक रूप से ज्यादा लग रहा है इसलिए सभी मिल के उन्हें निचा दिखा के खुश होने का प्रयास कर रही हैं.या यूँ कहो की अपने दुखों को कम करने का प्रयास कर रही हैं ....................
        मैंने कहा तो ये बात है.................तब तो बेचारे कितने मासूम हैं की ये भी नहीं समझ पा रहे की जीवन को खुश बनाने के लिए दूसरों को निचा दिखाना नहीं बल्कि उन्हें सम्मान देना होता है........
प्रकृति में जो आप देते हो प्रकृति उसी को आप  को लौटाती है.........मुझे सब समझ में आ गया.............

" लेकिन अचानक एक बात दिमाग में आई की यहाँ तो सभी पिता के उम्र के हैं और सभी के बच्चे हैं ............मतलब पापा को तो रोज हर बात पे इनके उलटे सीधे व्यंग्यों  को झेलना होता होगा.....और माँ  का क्या होता होगा? शरीर में  एक सिहरन सी दौड़ गयी और मेरा मन श्रधा से उनके चरणों में झुक गया...........
       और फिर  मासूम इर्ष्या पे क्रोध करने  के बजाय हंसी आने लगी (सच माता पिता के बिना सुखी जीवन  की कल्पना नहीं की जा सकती )........ 
 तभी मेरी माँ की आवाज सुनाई दी की अब चलो सब लोग खाना खा लो और हम सब अपने मानसिक दुखों से छुट के भोजन (भौतिक) सुख लेने चल पड़े...................