Saturday, April 3, 2010

......जरा सोचिए...

                आज मैंने अरुंधती रॉय का लेख पढ़ा.....(आउट लुक के २९ मार्च के अंक में)....
मन थोडा खिन्न था........अपनी व्यवस्था  पे, अपनी सरकारी मशीनरी पे. कुछ नेताओं के दोहरे व्यव्हार पे,,,उनके राजनितिक लाभ के लिए किये जाने वाले कार्य पे .........
       लेकिन फिर सोचता हूँ की मैं क्यों किसी को दोष दूं?.  मैंने इसके समाधान  के लिए क्या किया...?
केवल टाइम पास के लिए कुछ बोल दिया, या फिर सरकार को गली दे दी....और अपना नित्य कर्म पूरा कर लिया........कभी पिज्जा.बर्गर....या बिरयानी खाते हुए गरीबों के लिए हमदर्दी के  दो शब्द बोल दिए ( वो भी लोगो का ध्यान पाने के लिए, बंद बहुत समझदार है) और इससे जयादा हम कर भी क्या सकते हैं? डिस्को में जाके अपनी सिट लेके दो दोस्तों के साथ देश की हालत पे चर्चा कर ली ...........हो गया अपना  काम...............(बस बंद करो ये नाटक) ........
कोई भी समस्या एका- एक बड़ी नहीं होती ,,उसका बारूद तो धीरे धीरे जमा होता है ,,,,,और फिर विस्फोट होता है...........हमने अगर समाधान किया होता तो इतनी बड़ी समस्या बनती ही  नहीं ..........
अपने फायदे के लिए जंगले कटे उन्हें विशेस नाम दिया (बिना उनको विस्वास में लिए,,,,काम से काम पुनर्वास के काम में तो कोई घपला नहीं होना चाहिए था),,,,,,उनकी बात तो सुनी ही नहीं.........हद तो तब हो गयी जब .उनकी सेवा करने गए संगठनों ने अपने फायदे तलाशने सुरु किये..............(क्षमा कीजिये  किन्तु,,,,,,,,मुस्लिम भाई उन्हें मुसलमान बनाना , ईसाई उन्हें ईसाई बनाना ,और  हिन्दू संगठन  उन्हें हिन्दू बनाना  चाहते है, कमाल ये है की सभी अपने इश्वर को प्रसन्न कर रहे हैं ).......
उन्हें इन्सान तो  रहने ही नहीं दिया जाता.........उनके विकास करने की बात करके उनका शोषण किया जाता है....हमारा सामंती व्यव्हार उनके आत्मसम्मान को चोट पहुंचता है......
.एक और समस्या ये भी की .हमारी सरकारी मशीने संवेदना सून्य होके काम करती  है..........अपने लोगो के खिलाफ युद्ध करना पड़े ,,,,,,,,,इससे बढ़कर किसी देश के लिए शर्म की  बात और क्या  हो सकती है.??/..............
मैं अरुंधती रॉय के लेख से पूरी तरह सहमत नहीं हूँ.................या फिर मैं उन माओवादियों का पक्ष भी नहीं ले रहा हूँ और न ही लूँगा................क्योंकि उनके द्वारा उठाया गया हथियार हिंसा का माध्यम है जिससे मैं सहमत नहीं हूँ...............कितने भी तर्क कर ले उसे सही नहीं तहराया जा सकता...............
किन्तु रॉय का लेख हमें सोचने पे मजबूर जरुर करता है कुछ तो ऐसी कमी है ,,,,,कहीं कुछ तो गड़बड़ है जिससे ये समस्या बनी हुई है...............क्या वो हमारा अंतहीन लोभ है? या कुछ लोगों की साजिस/.
हम पर्यावरण दिवस खूब  जोर शोर से मनाते हैं ,,,,,,,अख़बारों में खूब लेख (छपते)  छापते हैं......लेकिन हम में से अधिकतर लोग वातानुकूलित गाड़ियों में सफ़र करना पसंद करते हैं...............क्या ये दोहरा व्यव्हार नहीं.है?.....हम किसी की छेड़खानी या बलात्कार की निंदा करते हैं.............लेकिन हम ही ब्लू फिल्मों को देखकर उन्हें इसे बनाने की प्रेणना  देते हैं( देह के व्यापर को बढ़ावा देते हैं).......क्या हम कम दोषी हैं?.............एक मशहूर लेखक श्री चेतन भगत जी ने 8 मार्च को लिखा की "एक दिन पुरुषों को भी मिलना चाहिए जिस दिन उन्हें नाहाने के लिए कोई न कहे , उन्हें ब्लू फिल्मो को देखने की छुट  हो............अब आप ही बताइए ऐसे रोल मॉडल  ऐसा कर रहे हैं और फिर बेहतर लेख लिखते हैं नारी सम्मान के पक्ष में...............(ये व्यक्तिगत आरोप न होकर प्रसंगवश की गयी चर्चा  है.)
मैं ये नहीं कहता की आप सब कुछ छोड़कर गाँधी बन जाओ ..........क्योंकि गाँधी केवल एक ही हुआ (और एक ही रहेगा.), और उसका रास्ता बहुत ही कठिन लेकिन अक्सर सही होता है)........
.हमें तो ऐसा समाधान ढूढना होगा जिसे सभी लागु कर सके ,,,जिस पर अधिकतर लोग चल सके..,
अब ,हमें सोचना ही होगा ,,,,,,,,,,क्योंकि नजदीक के फायदे में हम दूर का बहुत बड़ा नुकसान कर रहे हैं...................एक बात और अब कोई ऐसा समय नहीं आने वाला की कोई एक आदमी आएगा और सब ठीक कर देगा कोई मसीहा..........क्योंकि मानव मस्तिस्क ने इतनी प्रगति कर ली है की वो जानता हैं की हर व्यक्ति में एक महामानव छिपा है ज्यों ही वो जाग गया सब ठीक हो जायेगा,  सारे भ्रम दूर हो जायेंगे......बस ........
हमें केवल अपने कर्तव्यों को ध्यान में रखना होगा .अपनी क्षमता का सर्वोतम प्रयोग समाज के लिए करना होगा.........(समाज और व्यक्ति अलग -अलग नहीं हैं, बल्कि एक ही है...).................
एक अच्छा  गृहस्त  बनना  तो ठीक है(जो सदियों से हमारा आदर्श रहा है)  लेकिन उसके आगे हमें एक अच्छा नागरिक बनना होगा..............और तभी हम इन सभी समस्याओं को हल कर पाएंगे..........
मुझे तो ऐसा लगता है, आप क्या सोचते हो? ????????????????