Friday, March 26, 2010

ये क्या हो रहा है?

आज मैं थोडा क्षुब्द हूँ.
इसका कारण पिछले दिन आया उच्चतम न्यायालय का एक निर्णय है. दक्षिण  कि एक अभिनेत्री द्वारा दायर याचिका में "live in relationship" को जायज़ ठहराने कि मांग कि गयी थी और उससे उत्पन्न संतान को जायज ठहराने कि मांग कि गयी थी. मुझे इससे कोई तकलीफ नहीं, कोई विरोध नहीं. विवाह का बंधन आवश्यक  नहीं.दो समझदार लोग यदि बिना विवाह के बंधन में बंधे एक दुसरे के प्रति समर्पित है तो यह जायज हो सकता है.बशर्ते यह वासना पूर्ति का मार्ग न बन जाये...और न ही  अपनी सामाजिक जिम्मेदारी से पलायन का मार्ग .
              मैं दुखी इस बात से हूँ कि इस निर्णय में एक ऐसी टिप्पड़ी जोड़ दी गयी कि "राधा-कृष्ण भी तो live in relationship में ही जी रहे थे....जो मुझे बहुत बुरी लगी....
              और ये टिप्पड़ी माननीय मुख्य न्यायाधीश की पीठ  द्वारा कि गयी.
मैं अभी तक यही जानता रहा  हूँ कि live in relationship पश्चिमी देशों में विवाह का एक विकल्प है. अर्थात बिना विवाह के पति-पत्नी के जैसा व्यव्हार और संतान उतन्पन्न करने कि स्वत्रंता...
लेकिन जब भी प्रेम के दिव्य  स्वरुप कि बात होती है तो कृष्ण राधा के प्रेम कि चर्चा कि जाती है और वासना विहीन प्रेम का  उदाहरण दिया  जाता  है.....
क्या platonic love जैसे शब्द अब इस दुनिया से गायब हो गए हैं. या फिर उसका मतलब ही बदल गया है.....,
एक आश्चर्य और भी है कि अभी तक छोटी सी बात पे पुतला फूंकने वाली सड़क छाप राजनितिक लाभ लेने वाली पार्टियाँ भी मौन है... धर्म के ठेकेदार भी ...........क्या महज इसलिए कि इस  निर्णय का विरोध  किसी खास वोट बैंक को प्रभावित कर देगा..............(हमारे मुख्य न्यायाधीश महोदय minorties हैं ?)
पाता नहीं क्या हो रहा है? मैंने कुछ कड़े शब्दों का प्रयोग कर दिया , मेरा अभिप्राय किसी कि निंदा करना  नहीं है...
 मैं उनकी बौद्धिकता पर प्रश्न चिन्ह नहीं लगा रहा हूँ.
किन्तु हम किस दिशा में जा रहे हैं ,,,,सोचना होगा ........ये क्या हो रहा है?
क्या बौद्धिक जन केवल विश्वास तोड़ने के लिए ही  होते हैं, वे अपने तेज  तर्कों से विश्वासी लोगों के जीवन का सहारा छीन  लेने का प्रयास करते हैं.. हो सकता है वे अपने तर्कों से अपनी टिप्पड़ी को सही सिद्ध कर दें..
लेकिन हमसे हमारे सपने , कल्पनाएँ  छिनने का उन्हें कोई हक़ नहीं ,,,,,किसी को भी  नहीं............ कभी  भी नहीं.

2 comments:

Udan Tashtari said...

गुस्सा और क्षोब जायज है..किसी को हमारी आस्था और विश्वास पर हमला करने का अधिकार नहीं है.

बाकी तो कोर्ट का फैसला अपनी जगह है और लोगों की सोच..

Manish said...

सब पगला गए हैं..... ऐसा कहकर हमारे सामने फैसला सुनाये होते तो हम तो थपडिया देते x-( इन ससुरों को हमारी आस्था के साथ खिलवाड़ करने मे मज़ा आ रहा हैं?? एक पेंटिंग बना कर पगला रहा हैं... एक ये बचे रह गए थे
बौद्धिकता रहेगी तब प्रश्न चिन्ह लगेगा न!!.......
बिना सोचे समझे ऐसा कह जाना तो चूतियापा हैं और कुछ नहीं