Sunday, March 7, 2010

परिचय प्रेम से ..........

जिया के हाथो को  अपने हाथो  में लेकर पवन ने कहा " तुम इतना क्यों सोचती हो?" जिया के आंसू छलक पड़े. उसकी भार्राती आवाज़ ने जैसे घुटकर रह गयी हो. वो कुछ कहना चाहती थी. उसकी ख़ामोशी में एक सवाल था "क्या प्यार  करने के लिए इंसान होना काफी नहीं?" लेकिन वो दोनों  इसका   उत्तर  जानते  थे.  दोनों   खामोश  थे. उनकी  जुबान  तो  बंद  थी  लेकिन  आंखे  दोनों  कि  बाते  कर  रही  थी, शायद  एक -दुसरे को  समझा  रही थी .........
जिया  अल्लाहाबाद  विश्विदालय  में   पढ़ती  थी, वास्तव  में  दोनों  साथ  -साथ ही पढ़ते  थे. पवन senior था, उसे केवल  दुनिया  समाज  से ही  मतलब  था ...दोनों  का  परिचय एक सादे  -माहोल   में हुआ  था....एक दो  बार   और  वे  मिले   थे , लेकिन दोनों ने कभी एक दूसरे को इतना महत्व कभी न दिया था ....
उनकी  असली  मुलाकात  तो  एक debate competiion  में हुई  थी.......जिसका विषय   था-----------"समाज का प्रेमियों  के साथ व्यव्हार  -उचित  या  अनुचित "......
जिया ने समाज  के व्यव्हार  को अनुचित  माना  था जबकि  पवन ने उचित  ठहराया   था.... तब  दोनों  को पता  कहाँ  था कि  इन  तर्कों  के आगे  वे  दोनों  स्वयं  इसके  पात्र  बन  जायेंगे ................
जिया ने उस  competition के बाद  अपने सोच  में एक बदलाव  पाया  था....अपने बेलगाम  सोच  पे  एक लगाम  पाया  था.....खुद  को क्रन्तिकारी  साबित  करने कि  होड़  से अलग  वो   अब  दूसरे पक्ष  को भी  देखने  लगी  थी.....शायद  ये प्यार  कि   शुरुआत   थी...(वो सामजिक  हो रही थी...अब वो परवाह करने लगी थी )
इधर  पवन अब  तक  केवल  समाज, देश के बारे  में सोचता  रहता  था, लेकिन आज  वो बेचैन  था. सारे तर्क  मिलकर  भी  उसे  संतुष्ट  नहीं कर  पा रहे  थे . दिल  में कुछ चुभ  रहा  था. आज  उसे  अपना  तर्क   खोखला  और  कमजोर  लग  रहा  था........
.उसे  महसूस  हुआ  कि  प्यार के बिना  ये  सब  अधुरा  है ....
उसे हरदम  जिया में सवाल पूछता  प्यार नजर  आने  लगा  था. वो उसे  देखकर   झेप  जाता  था.....दोनों  सहमे  से एक दूसरे  को देखा  करते  थे ...
मैं  उन  दिनों  पवन के साथ  ही  पढता  था....पवन ने अपने दिल  कि  हर  एक बात  मुझसे  कही थी   ......मैंने  और  हमारे  दोस्तों  ने मिलकर  उसे  समझाया  कि  वो उसे  बोल  दे  ................
उधर जिया भी पवन को पसंद  करती  थी,,,,ये रिया  ने बताया 
      दोनों  के मिलने  का  स्थान हम सब ने मिलके  फिक्स  किया,,,, दोनों मिलने पहुँच गए. जिया कुछ बोल  ही  नहीं पा  रही  थी,, इधर  पवन ने खूब  तैयारी  कि थी, लेकिन वहां  जाके  वो  सब  भूल गया ,उसके  दिल  कि  धड़कन तेज हो  गयी,  उसके  होठ  सुख  रहे  थे .................उसने कहने  कि  कोशिश  कि  और  इतना ही  बोल  पाया  कि  तुम बहुत  अच्छी  लगती  हो,और  कागज  का  एक टुकड़ा  पकड़ा  दिया ,,,,,,,जिया ने उसे  पढ़ा  और  मुस्कराने  लगी ......ये उसकी सहमती का प्रतिक था. पवन भागता  हुआ  आया   और  मुझे  गले  लगाते  हुए  सारी  कहानी  सुना  दी ....
आज  वो बहुत  खुश  था,,उसके   पैर  जमीन  पे  नहीं पड़ रहे  थे ...अंतर  तो  मैं  भी उसके व्यव्हार में   महसूस  कर  रहा  था लेकिन आज   कुछ और  ही  बात  थी..... उधर  जिया कि  भी  यही  हालत  थी.....(रिया  ने बतया  था ,,,,,,,,,,,,,,(रिया  मनीष  कि  अच्छी  दोस्त  थी और  उसी  से मुझे  पता  चला ) .....
पवन और  जिया दोनों  अक्सर  मिलने  लगे, उन्हें  लगने  लगा था  कि  समाज  और  प्यार दोनों  को साथ -साथ  लेके  चला  जा  सकता  है ..........(कितने नादा थे वे ! )
आज  ही  दोनों  घर  से आये  थे  और  पवन ने मुझे  बताया कि  आज  वो जिया को हमेशा  के लिए छोड़  देगा ...........मैं अवाक् था ! पूछने पर पाता चला कि
पवन को उसके  ग्रामीण  समाज  ने अपनी  उम्मीदों  और  आशाओं  कि  जंजीरों  से बाँध दिया  था, उसके  पैरो  में सामाजिक  इज्ज़त  कि  मर्यादा  थी.....
 मैं  उसे  समझाना चाहता  था लेकिन ये  संभव  नहीं हो पा  रहा था.  मैंने  उसे  कहा कि  एक बार  वो जिया से मिल  ले ....
आज  वो उससे   मिलने  गया  था,,,,लेकिन वहां भी हालत ठीक नहीं थे.जिया को  पिता  कि  पगड़ी  और  माँ  कि  इज्ज़त  दोनों  बचानी  थी ...वो आज मर्यादा  को इतना महत्व  दे  रही  थी....मैं  ये सुनकर  आस्चर्य  में था !!!!!!!!!!!,,, 
   उसे  समझाया  गया  था कि  छोटे  भाई  बहनों   का  भविष्य  बिगाड़ने   का  हक़  किसने  दिया .....................
प्यार एक नया  रूप मुझे  दिखा  कि  प्यार कभी  स्वार्थी  नहीं हो सकता ...वो हमेशा  दूसरो  कि  ख़ुशी  चाहता  है ..और इसी आधार पे वो आज तक ठगा जाता रहा है ..........
आज  वो दोनों  तैयार  थे  एक-दूसरे  को छोड़ने  के लिए............
मेरी  हालत  तो  एक दम  अलग  थी.  मैंने  पवन को समझाया  कि  तुम यार  समाज  को जानते  हो, उसका  काम  ही  ऐसा  है ,,,उसके  तर्कों  को याद भी  दिलाया .....लेकिन.........वो एक सुखी  हंसी  हंस  के रह गया ...मैं  पूरी  तरह  से टूट  गया  और  अपने आंसू छिपाने  के लिए मुंह   फेर  लिया......
मैंने  जिया को समझाने  के लिए पवन से पूछा  और  उद्धव  के तरह  अपनी  छोटी  सी  बुद्धि  के साथ  उस  राधा  को ज्ञान  देने  चल  पड़ा ..................वहां  जिया ने मुझसे  कहा कि  पवन का  ध्यान  रखना  वो बहुत  भावुक  है ....मैंने  कहा कि  तुम परेशा  न  हो हम  लोग  तुम्हारे  साथ  है. तुम दोनों  साथ  रहोगे तो सब अच्छा हो जायेगा.. ,,,,,और  अगर  ब्रेक -अप   होता  ही  है  तो  क्यों न  तुम दोनों  दोस्त  के रूप  में रहो एक दुसरे  के सहारे बनकर ,,,हर रिश्ता शादी तक जाये जरुरी तो नहीं . ............
जिया ने  कहा कि  लड़की  के लिए ये  आसान  नहीं होता! मैं आस्चर्य में था कि ये वही लड़की है  ,,,,मैंने  कहा कि  तुम अपने तर्कों  को भूल  गयी................तुम प्यार करती  हो उससे!!!! ........
उसने  कहा कि  इसीलिए  तो  मैं  उसे  जीतते  हुए  देखना   चाहती हूँ ..............
वो समाज   को कुछ दे  सकता  है  ,लेकिन वो मेरे प्यार के  चक्कर  में पड़कर  अपना  सब  कुछ लुटा  देगा  ..........मैं  उसकी ख़ुशी  चाहती हूँ  और  कुछ नहीं,,,,,मेरा  पहला  परिचय प्रेम से इसी  रूप  में हुआ...जान बुझकर खुद को तकलीफ देना ताकि दूसरा बदनाम न हो,,,,,,,,,मैं उसे समाज से लड़ने कि प्रेरणा देने गया था.प्रेम समझाने  गया था .कितना मुर्ख था मैं ! 
उस  दिन  पवन और  जिया ने मुझे  ये  समझा  दिया  कि  प्यार  केवल   किसी  कहानी  का  पूरा  होना ही  नहीं होता  बल्कि  फ़िल्मी  दुनिया   से बाहर  निकलके  सोचना और  जीना होता है.        मैं  अपनी  छोटी  सी  बुद्धि  के साथ  इतना बड़ा  ज्ञान  ले  के लौटा ...कि  प्यार क्या होता  है? ..........उसे  निभाया   कैसे  जाता  है? ..............मैं  उनको  देखके  अपने आंसू रोक  नहीं पाता,,वास्तव  में सोचके  ही! ...........अब  भी  दुआ  करता  हूँ  कि  वे  खुश  रहे  ...............
    कितने ही ऐसे लोग है, जो मजबूरियों के  हाथो अपने तक़दीर का फैसला लेते हैं..मुझे अब लगने लगा है कि प्यार खुद रास्ता दिखता है, वो जीवन भी देता है और जीना भी सिखाता है...........

1 comment:

Manish said...

उफ़्फ़!! क्यों मेरे अधूरेपन को बार बार सामने खड़ा कर देते हैं,
हाँलाकि ये मेरी कमजोरी है लेकिन जब ऐसे त्याग की बात आती है तो अपनी ही अधूरी कहानी याद आती है।

भाव आ रहे हैं और कायदे से आये भी। धीरे धीरे एकदम से डूब जायेंगे।
देर के लिये क्षमा……प्रो बुढ़ाउ जरा सठिया गये थे :)