Tuesday, March 2, 2010

स्वर्णिम काल

"युवा रास्ट्र पे बोझ है! " ऐसा कहते हुए शर्मा जी ने मेज पे अपना मुक्का दे मारा. उनके शब्दों ने तो नहीं किन्तु धडाम की आवाज़ ने सब सहकर्मियों का ध्यान अपनी ओर एक झटके  में खिंच लिया. सब उनकी तरफ देखने लगे. पूछने पे पता चला की उनके २६ वर्षीय पुत्र श्री अनिल शर्मा जी इलाहाबाद में तैयारी करते है. और पिछले ८ सालों से अनुत्पादक कार्य कर रहे हैं.
शर्मा जी अपने बेटे की नाकामी को राष्ट्रीय बोझ का नाम देकर और समस्या को बड़ा बनाके गौरवान्वित होने का प्रयास कर रहे थे.(कभी कभी व्यक्ति बड़ी समस्या में खुद को फंसा देखकर भी संतोष का अनुभव करता है..कितने आश्चर्य की बात है!!)
जाहिर सी बात है की सभी की सहानुभूति उन्हें बखूबी मिल रही थी. वे एक असहाय  पिता के रूप में थे और (उनके) सहकर्मी उन्हें सांत्वना देने का प्रयास कर रहे थे. इस प्रयास में वे अनिल के साथ साथ युवाओं को भी खूब खरी खूटी सुना के सुख पा रहे थे .
मामले की तहकीकात करने पे पता चला की १२ वीं के बाद शर्मा जी ने बड़ी उम्मीदों के साथ अनिल को इलाहाबाद भेजा. अनिल ने अपना स्नातक वहीँ से पूरा किया और पिता की आज्ञा से  सिविल सर्विस की तैयारी करने लगा. शर्मा जी के उम्मीदों को पंख लग गए. वे सब रिश्तेदारों, अवम मित्रों से अनिल की सफलता की संभावना को जोर देके बताते .............अनिल से जुडी ना जाने कितनी किवदंतिया उन्होंने बना दी
( कुछ तो मुझे भी बता चुके थे , जैसे वो बचपन से ही सफ़ेद अम्बेसडर पसंद करता है. उसका मन तो किताबों में बसता है , जब छोटा था तो हमेशा सालूट मारता था...).............

शर्मा जी के धैर्य ने २ साल के बाद अपना जवाब देना शुरू कर दिया और आज उसका बांध टूट गया..
आज बिहार (मैन्स) का परिणाम आया था  और वो नकारात्मक रहने के नाते उनके भावना का ज्वार नहीं थम सका. उनकी अपनी मजबूरी थी , जिसे वो बच्चे से नहीं कह सकते थे , अपने सहकर्मियों के साथ कहना उचित समझा. ..................
......लेकिन धमाकेदार ध्यान खींचने का तरीका बड़ा जोरदार था, एक दम फ़िल्मी ........

सभी को अपनी बात सुना लेने के बाद वो छत की तरफ देखते हुए एक दम निर्विकार भाव थे . उनके चेहरे की शांति , उस ठेले वाले की तरह थी जिसकी साडी सदी सब्जी बिक गयी हो ......................
उन्होंने अपनी कुर्सी पे अपने सर को पीछे की ओर टिका के एक अंगड़ाई ली और गंभीर होते हुए बोले                    ( देश के सामाजिक , राजनितिक , और आर्थिक समस्यों के समाधान के पूर्ण ज्ञाता के रूप में ) हमरा देश कैसे प्रगति करेगा????   जब देश का एक बड़ा वर्ग जो युवा है , तैयारी के नाम पे देश के बजट का एक बड़ा हिस्सा अवशोषित कर लेता है. और उसकी कोई सार्थक वापसी नहीं हो पाती......
.....इसके पक्ष में लाजवाब तर्क देने शुरू किये..................
मैंने विरोध करते हुए कहा की इसे राष्ट्र  निर्माण भी  कहा जा सकता है ..आप इसकी गलत व्याख्या कर रहे हैं..शर्मा जी भड़कते हुए बोले अरे आप जैसे सभी भाग्यशाली नहीं होते दुबे जी."  अकादमिक रूप से बच्चो को पढ़ाना राष्ट्र  निर्माण हो सकता है ,किन्तु ये तैयारी के नाम पे इतना वक्त बिताना , ये संबंधों का शोषण है,,,,,,,,,,,,,,,
अगर वे सफल होते है तो कुछ दिन के सम्मान और साथ के बाद.......... वे हमें दुत्कार देंगे ................आप को केवल बोलना है, दुबे जी समझ में तो तब आता है जब आप उस स्तिथि से गुजरे....

इस ब्रह्मस्त्र का मेरे पास कोई जवाब नहीं होता ,,फिर उन्होंने स्वर्णिम काल की चर्चा शुरू कर दी  और सिद्ध करने लगे की विद्यार्थियों को कोई समस्या ही नहीं है और दुनिया के सबसे निरीह और गम झेलने वाले प्राणी शर्मा जी जैसे लोग हैं..

मैं चुप था किन्तु ख़ामोशी कुछ बोल रही थी..."और सारे काल स्वर्णिम नहीं है"...बचपन में सुना था की बालकपन स्वर्णिम कल होता है,,,जवानी में सुना की युवावस्था स्वर्णिम काल है,,,,आज मुझे तो ये लगता है की पूरा जीवन ही स्वर्णिम अवसर से भरा पड़ा है , जो जब जग जाये और इसका सदुपयोग कर ले ...
सभी सदस्य उनकी हाँ में हाँ मिला रहे थे, और अनिल को क्या करना चाहिए उसकी पूरी श्रृंखला ही बना दी थी .
उसे ही पूरा दोष दिया जा रहा था बिना उसके पक्ष को सुने...........

मैं खुद को शर्मा जी के स्थान पे रखने के बाद भी अनिल को दोषी नहीं मान पा रहा था .
.स्वर्णिम अवसर जिसमे पिता अपने पुत्र पे आरोप लगता है. मुझे लग रहा था की अनिल अगर थोडा भी संवेदनशील होगा तो वह अवस्य अपना सर्वोतम प्रयत्न कर रहा होगा......परिस्थिति इतनी जटिल कभी न थी.

"वैश्विक मंदी, बढ़ता पूंजीवाद , भ्रस्ताचार, पूंजीपतियों का हर वर्ग के प्रतिनिधिओं के साथ गठजोड़ ................इतना दुर्गम पथ बनता है की उससे पर पाना दुस्कर होता है....इसके अलावा अप्रत्यक्ष रूप से भावात्मक युद्ध (बाजार के साथ ) लड़ना पड़ता है........उम्र के इस पड़ाव पे उसे सबसे जयादा जरुरत अपनों की होती है..लेकिन ...............

वो अपने बारे में कोई सोच ही नहीं बना पते , लोगो के अनुसार उन्हें पता चलता है की वो तो इतने बड़े हो गए...उनसे की गयी अपेक्षा उनकी सोच का निर्माण करती है  ,,,,
(हम )  लोगो को आइना मानकर व्यवहार तय करते हैं..........

" जब घर जाने पे गाँव वाले पूछते हैं..........कब जाओगे? कहाँ हो आजकल?   पढाई बहुत दिन किये अब कुछ काम करो ? ऐसे प्रश्नों से उनका स्वागत किया जाता है..रिश्तेदारों के प्रश्नों की  तो चर्चा ही ना करे ........वे सामने तो साथ देते है लेकिन पीछे उनका व्यंग्य दृदय के टुकड़े कर देता है.................
उनको झेलकर लक्ष्य की तरफ बढ़ना , खर्चे को न्यूनतम करने का यथा संभव प्रयास करना .....ये विद्यार्थी जीवन को स्वर्णिम कहाँ रहने देता है??????"

इससे अच्छा तो नौकरी करते हुए लोग है ,,जो जिम्मेदारी को पूरी करने के लिए लड़ रहे है ...खर्च करके पुनः प्राप्ति की उम्मीद है साथ ही खर्च करने का आत्मविश्वास भी ................
अपने संघर्ष में विद्यार्थी यदि जीत पाया तो सिकंदर वरना नकारा, आवारा, बेगैरत...............आदि
तो पता नहीं ये कैसे स्वर्णिम अवसर हो गया?

मैं शर्मा जी को समझाना चाहता \था लेकिन वो तो ऑफिस का कम छोडके चाय की चुस्की के साथ रास्ट्र के आर्थिक क्षमता एवं  विकास पे विचारो को प्रगट करके खुद को महत्वपूर्ण समझ रहे थे . बीच -बीच में हमदर्दी के दो बोल बोलके अनिल के पक्ष का भी समर्थन कर दे रहे थे ,,
,साथी लोग चाय की चुस्की के साथ सी गप में शामिल थे और  अपने छोटे- छोटे विचार दे रहे थे...................

तभी मुझे दिख लगा  की यही है स्वर्णिम अवसर , स्वर्णिम काल..................
दूसरे को कोसने का , आरोप लगाने का खुद को महत्वपूर्ण बनाने का और  जीत हो या हार हो......
खुद को हमेशा महत्वपूर्ण बनाये रखने का ....

मेरी सारी सहानुभूति शर्मा जी से हट गयी और मैं सोचता रह गया की पिता भी ऐसे हो सकते हैं , या फिर ये बाजार का प्रभाव  है ...या एक विकृति सोच खुद को महत्वपूर्ण बनाने की...........................

1 comment:

Manish said...

e bhaiya....e hamaar kahaani ta naa hauve...

Anil bhai ki bhi nahin lag rahi hai..

lekin chapete me ham sab hain....

shukra hai ki aap hame samjhe aur aapne apun ka hii saath diya....
:)