Monday, March 29, 2010

गुलाबी रंग .........

गुलाबी रंग .........
मेरा पसंदीदा रंग गुलाबी रहा है..यह कब से है मैं नहीं जानता..........
अल्लाहाबाद में जाने के बाद मैंने सोचना शुरू किया की अपने बारे में जाना जाये..मुझे क्या पसंद है ? क्या अच्छा लगता है ? कैसा खाना अच्छा है , कैसा पहनावा ?
असल में गाँव में इतनी फुर्सत ही नहीं होती थी की इसके बारे में सोचा जाये...जो मिल गया वही पसंद है..........
पिता जी ने इतने कहानिया सुना के हमें भर दिया था की हर खाना अच्छा लगता था ...करेला में विटामिन होता है..नीबू से दांत  ठीक होते है....दूध में कैल्सियम  होता है.....वगैरह वगैरह.........
अब जब शहर में आ गए तो एक फैशन सा चल पड़ा की थोडा चूजी होना चाहिए ,,,,,,,,,पशुओं के तरह सब कुछ न पसंद करना चाहिए.....(ऐसा लोगो ने समझाया था).....
            तो  हमने  भी  तय  किया की हम  भी  चूजी  हो  जायेंगे ........अब   पहले  रंग से शुरू कर  दिया तो  गुलाबी रंग चुन  लिया  हमने,  क्योंकि  ये  प्यार  का रंग  है साथ  ही इससे  bp control होता है. ........
  सारे  तर्कों  को  सोचके  हमने  निर्णय  लिया  की मेरा पसंदीदा रंग गुलाबी ही होगा .......हम  जैसो  की एक ही समस्या  है की हम  जिधर  मन  लगा  लेते  हैं  वही   अच्छा लगने  लगता है....हालाँकि  वो  खुद  से प्रकट  न होके  हमारे  द्वारा  चुना  गया होता है ,अब इसे अच्छा समझिये या बुरा ...
              खैर  अब जब चुन  लिया  तो इसे स्वीकार करने की कोशिस करने लगा.....और  एक दिन  की बात  है ,,,,,मैं अपने पप्पू  टाइप  स्टाइल  में college गया था ..स्टैंड  के पास  एक लड़की  गुलाबी रंग के ड्रेस  में , गुलाबी रंग के scooti से उतरी........(..चौकिये मत पप्पू टाइप कोई स्टाइल नहीं है बल्कि एक ऐसा तरीका है जिसमे वक्ती बिना वजह अपने को महत्व देता है ,,,यह जानते हुए की कोई उसे नोटिस नहीं कर रहा है...)
        मैं कुछ  देर  उसे  देखता  रह  गया मुझे इस  जहाँ  का ध्यान  ही नहीं रहा...जब मैं  क्लास   में पहुंचा  तो वहां  भी  वही  थी,,,,मेरे  दोस्तों  ने मुझे देख  लिया  था और  वे  उसका  घर  का पता  तक  ले  आये ..............
मनीष   ने तो पूरी  लव  स्टोरी  तैयार  कर  दी ....मैं शहमा  हुआ सा लैब्ररी   में चला  गया ,,,,,अरे  ये  क्या वो  तो मेरे  सामने  वाली  सीट  पे  आ के बैठ  गयी .......
मैं उसकी  तरफ  देख  भी  नहीं पा  रहा था, उसी  समय  एक आवाज  मुझे सुनाई  दी " क्या आप  मुझे ये  बता  देंगे ? अरे  ये  हो  क्या रहा है? और  क्यों ? मैंने खुद  को  संभाला  और   कोशिस  करके  उनके  सवालो  का जवाब  दे  दिया..
              बाहर  आके  मैं खूब  हंसा ....ऊपर  वाले  पे ...."तेरा  नाटक " एक ही  दिन  में गुलाबी रंग को  दिल    के करीब  पहुँचाने  के लिए उसे महसूस करने के लिए..............मैं शतर्क था . .
                   मैं जानता था की मैं दुनिया     से लड़  नहीं सकता  और  अपने  चाहने  वालों  को  तकलीफ  नहीं  दे  सकता...............मैंने अपने आँखों को सुनहरे ख्वाब बुनने से रोक दिया....मैं जानता था की परिचय से ही प्रेम की शुरुआत होती है...(मैं वास्तव में डर गया था)..  खुद को समझा लिया हमने. एक सुखद भाविश्ग्य का ख्वाब दिखा के....तर्कों की भरमार लगा के ,,,,आशिको की दुर्दशा सोच के ........
          आज भी  उसी मानसिक अवस्था में जी रहा हूँ. लेकिन ये तर्क अब कुंद हो चुके हैं...अब  ...ये सोचके की शादी के बाद अपनी धर्मपत्नी को दुनिया की सारी खुशियाँ दूंगा,,वहां खोने का डर न होगा .....उस प्रेम पे सामाजिक मोहर लगी होगी ....न मैं रुशवा हूँगा और न वो....
 .. इसी भ्रम में जिंदगी जिए जा रहें  हैं..
            पर क्या मैं कायर नहीं हूँ?  क्या मैं खुद अपने सपनो की भ्रूण हत्या का दोषी नहीं  हूँ?
. मैं कभी कभी बहुत ही शर्मिंदगी महसूस  करता हूँ....... ...मैंने ये क्या कर डाला.?  भविष्य का क्या  कोई भरोषा है? कल हो न हो, या फिर अगर हो भी तो उस लायक न हो...............................
  ..लेकिन फिर भी शायद वही  निर्णय सही था.......क्या करूँ?  
"गुलाबी रंग आज भी देखकर मैं दुनिया से कट जाता हूँ.."...उस लड़की का चेहरा और नाम तो मुझे याद नहीं लेकिन उसकी वो ड्रेस मुझे आज भी याद है....मेरा परिचय केवल ड्रेस से ही होके रह गया...
...(समझदार होके  प्यार नहीं किया जाता).. शायद प्यार अभी मुझमे जिन्दा है. या उसकी भ्रूण हत्या हो गयी..ये तो मैं नहीं जानता .पर जो भी हो गुलाबी रंग अभी भी अच्छा लगता है......
अब आप ही बताइए मैंने जो किया वो क्या था? मेरा  डर , मेरा धर्म या फिर अपनों के प्रति लगाव? .
(पाठक जन  इसे कोई वक्तिगत समस्या या प्रश्न न समझे बल्कि इसे एक विशेस प्रकार की सामाजिक-वक्तिगत  समस्या समझके उसपर टिप्पड़ी दे ..मैं जानना चाहता  हूँ  की ऐसे समय में क्या मेरा निर्णय सही था...या फिर मैंने प्यार को खो दिया ,मेरी चिंता किये बगैर अपनी राय दे.)

Saturday, March 27, 2010

माँ की.एक कहानी.

. मैं जब छोटा था तो माँ अक्सर मुझे कहानियां  सुनाया करती थी. सच्ची वाली.........
मैं शेर वाली या भेड़ वाली भी सुनता था लेकिन यदि कहानी के पात्र मेरे परिचित होते तो मुझे बड़ा मजा आता.......
एक कहानी जो मुझे आज याद आ रही है..........
                   एक गाँव में एक परिवार रहता था...उसमे छ बच्चे थे...दो लडकियां  और चार लड़के..(रेखा, दिया, अमन, कमल, मुकेश और सुरेश)..परिवार कि आर्थिक हालत दयनीय थी....बच्चों की परवरिश भी  ठीक से नहीं हो पा रही थी. पिता कि कमाई इतनी अच्छी नहीं थी कि बच्चो को पढाया  जा सके...भोजन की व्यस्था ही नहीं हो पा रही थी...
                            रेखा तीसरे नंबर कि संतान थी. उसकी उम्र जब ७ साल कि थी तभी उसने ये निर्णय लिया कि वो आगे पढाई नहीं करेगी और दिया को पढने का पूरा मौका दिया जायेगा..अमन और कमल  दोनों बड़े होने के बावजूद घर से उतना मतलब नहीं रखते थे..उन्हें केवल अपने सेहत का ध्यान रहता था...वे कोशिस करके भी पढ़ नहीं पाते थे...उन्होंने ये निर्णय किया कि वो कुछ काम करंगे....और बड़े आदमी बन जायेंगे...........
इधर  मुकेश कि पढने में रूचि थी किन्तु उसे भी लगता था कि अपने से छोटे भाई के लिए (सुरेश) के लिए उसे भी रेखा कि तरह त्याग करना चाहिए...........जब छोटे बच्चे त्याग कि बात करते है तो मुझे बड़ा आस्चर्य होता है कि ये दुनिया कितनी  स्वार्थी है और उसे भी जायज ठहराने कि कोशिस करते हैं......लेकिन उन बच्चो  के पास तर्क न होने पर  भी उनका  मासूम व्यव्हार कितना सही और अच्छा लगता है....
     रेखा को जब ये पाता चला तो उसने मुकेश को समझाया  कि देख भाई जीवन में बहुत सी तकलीफ आयेंगी , मैं लड़की हूँ मुझे दुसरे घर जाना है मेरे लिए पढाई इतनी जरुरी नहीं है...तू कुछ पढ़ लेगा तो छोटे को भी मदद मिलेगी और पढाके तू खर्चा भी निकाल सकता है......
सच है जब मजबुरिया आती है तो वे अपना इलाज भी खुद ही  बता देती हैं ,,,,उसके लिए उम्र का बंधन नहीं होता....
छोटे भाई और बहन "सुरेश  और दिया" में बालसुलभ वे सारी चंचल्ताये थी कि वे खामोश बलिदानों को समझ नहीं पाते..........(बलिदानों का ढिंढोरा नहीं पीटा जाता )...
    एक दिन रेखा रोटी बना रही थी, सुरेश को काफी तेज भूख  लगी थी, सुरेश दीदी के पास दौड़ता हुआ आया और रोटी कि जिद करने लगा,,,,,दीदी ने उसे रोटी दी वो चीनी कि मांग करने लगा दीदी ने दूध में थोडा सा आटा डाल दिया और बोली खा लो....सुरेश को मीठा न लगा उसने शिकायत कि तो दीदी ने कहा कि दुकान वाला अच्छी चीनी नहीं देता....उससे बात कर लेना...मुकेश सब समझ रहा था,,,
                     ,दिया और मुकेश दोनों साथ में खाने आये और मुकेश ने बिना खाए ही पेट दर्द का बहाना कर के चला गया....सभी के खा लेने के बाद रेखा ने बची रोटिया मुकेश के साथ बैठकर उसे समझाते हुए खिलायीं और खायी...........
उस परिवार के दिन इसी तरह कट रहे थे....दोनों बड़े भाइयों के द्वारा कमाने से कुछ सुगमता हुई...और तीनो छोटों ने अपनी पढाई पूरी कि...(रेखा को छोडकर)...
सुरेश का मन डॉक्टर बनने का था लेकिन उसकी पढाई तो शायद वो कभी नहीं कर सकता क्योंकि न तो उस समय बैंक के प्लान थे और न ही कोई और  सहारा .........
उसने अपने सपने को मार दिया.......आज उसका अपना एक दुकान है जिसमे वो दिन भर सामान बेचता है........मुकेश का भी वही हाल है............बड़े दोनों भाई अपने दुनिया में मस्त है....दिया कि शादी भी हो गयी.........रेखा कि तो सबसे पहले ही हो गयी थी.............
कुल मिलाके यदि इसे सुखी जीवन कहते है तो  सभी अपने जिंदगी में अच्छे से हैं...................
                 कहानी ख़त्म होने पे मैंने माँ से पूछा  था कि माँ रेखा ने ऐसा क्यों किया ? उसके सपने का क्या हुआ? क्या उसका कोई सपना नहीं था?
       माँ ने कहा कि पढाई का उदेश्य जिम्मेदारी का बोध कराना है,,,,,,,,,,और केवल अपने सपने के लिए तो कोई भी जी लेता है, किसी के सपने पूरा करने का सुख ही कुछ और होता है.............
मुझे उनमे रेखा बोलती दिखाई दी..........मेरी आंखे नाम थी..और जुबान खामोश.
          मुझे अब लग रहा था कि मैं अक्सर अपनी जिम्मेदारियों से बचने के लिए जो छोटा होने का दावा करता हूँ वो कितना खोखला है...........वास्तव में खुदा ऐसे लोगों को खुद बना के ही भेजता है उन्हें उम्र कि सीमा से परे किसी बहाने से परे .........बस वो अपनी जिम्मेदारियों को पूरा करते जाते हैं ,,,,,,बिना किसी अपेक्षा के ........पता नहीं ये सुख है  या कुछ और.......... 

Friday, March 26, 2010

ये क्या हो रहा है?

आज मैं थोडा क्षुब्द हूँ.
इसका कारण पिछले दिन आया उच्चतम न्यायालय का एक निर्णय है. दक्षिण  कि एक अभिनेत्री द्वारा दायर याचिका में "live in relationship" को जायज़ ठहराने कि मांग कि गयी थी और उससे उत्पन्न संतान को जायज ठहराने कि मांग कि गयी थी. मुझे इससे कोई तकलीफ नहीं, कोई विरोध नहीं. विवाह का बंधन आवश्यक  नहीं.दो समझदार लोग यदि बिना विवाह के बंधन में बंधे एक दुसरे के प्रति समर्पित है तो यह जायज हो सकता है.बशर्ते यह वासना पूर्ति का मार्ग न बन जाये...और न ही  अपनी सामाजिक जिम्मेदारी से पलायन का मार्ग .
              मैं दुखी इस बात से हूँ कि इस निर्णय में एक ऐसी टिप्पड़ी जोड़ दी गयी कि "राधा-कृष्ण भी तो live in relationship में ही जी रहे थे....जो मुझे बहुत बुरी लगी....
              और ये टिप्पड़ी माननीय मुख्य न्यायाधीश की पीठ  द्वारा कि गयी.
मैं अभी तक यही जानता रहा  हूँ कि live in relationship पश्चिमी देशों में विवाह का एक विकल्प है. अर्थात बिना विवाह के पति-पत्नी के जैसा व्यव्हार और संतान उतन्पन्न करने कि स्वत्रंता...
लेकिन जब भी प्रेम के दिव्य  स्वरुप कि बात होती है तो कृष्ण राधा के प्रेम कि चर्चा कि जाती है और वासना विहीन प्रेम का  उदाहरण दिया  जाता  है.....
क्या platonic love जैसे शब्द अब इस दुनिया से गायब हो गए हैं. या फिर उसका मतलब ही बदल गया है.....,
एक आश्चर्य और भी है कि अभी तक छोटी सी बात पे पुतला फूंकने वाली सड़क छाप राजनितिक लाभ लेने वाली पार्टियाँ भी मौन है... धर्म के ठेकेदार भी ...........क्या महज इसलिए कि इस  निर्णय का विरोध  किसी खास वोट बैंक को प्रभावित कर देगा..............(हमारे मुख्य न्यायाधीश महोदय minorties हैं ?)
पाता नहीं क्या हो रहा है? मैंने कुछ कड़े शब्दों का प्रयोग कर दिया , मेरा अभिप्राय किसी कि निंदा करना  नहीं है...
 मैं उनकी बौद्धिकता पर प्रश्न चिन्ह नहीं लगा रहा हूँ.
किन्तु हम किस दिशा में जा रहे हैं ,,,,सोचना होगा ........ये क्या हो रहा है?
क्या बौद्धिक जन केवल विश्वास तोड़ने के लिए ही  होते हैं, वे अपने तेज  तर्कों से विश्वासी लोगों के जीवन का सहारा छीन  लेने का प्रयास करते हैं.. हो सकता है वे अपने तर्कों से अपनी टिप्पड़ी को सही सिद्ध कर दें..
लेकिन हमसे हमारे सपने , कल्पनाएँ  छिनने का उन्हें कोई हक़ नहीं ,,,,,किसी को भी  नहीं............ कभी  भी नहीं.

Tuesday, March 9, 2010

खुद से मिलना


..मिलना खुद से..
एक दिन शाम को मैं गंगा किनारे बैठा हुआ था, थोडा उदास सा शांत, जीवन के प्रति  पश्चमुखी  सोच से ग्रसित।  मैं अपने अतीत कि खुशियों को याद कर रहा था, वर्तमान से दुखी (अपरिचित) (अतीत में जीना अच्छा लगता है)।  ऐसा लगता था कि जब वापस गाँव  जाऊंगा तो फिर खुश हो   पाउँगा। कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिनअपने भविष्य कि कल्पनाओ में अपने गाँव, अपने लोगों को जोड़कर देख रहा था ,  मेरे लिए तो बस उतनी ही दुनिया थी।
      मैं उनके साथ जीने कि कोशिस कर रहा था, पता नहीं था कि वक्त के बहाव में फिर वही स्तिथि प्राप्त नहीं कि जा सकती जिससे आप गुजर चुके हों। नदी शीतल और मंद गति से प्रवाहित थी, वो अपनी ठंडी हवा से मुझे सहला रही थी।  
                "मेरा जीवन भी तो तुम्हारी तरह है .क्यों उदास होते हो?" एक आवाज सुनाई दी। मैंने चौक कर इधर-उधर देखा फिर मैंने नदी की ओर गौर से देखा,  मुझे साफ-साफ सुनाई देने लगा, नदी कुछ कह रही थी मुझसेमैं भी तुम्हारी तरह ही तो हूँ, क्यों उदास होते हो ? मेरा जीवनचक्र भी तुम्हारी तरह ही हैमैंने पूछा, वो कैसे?
      नदी ने कहना शुरू किया, मेरा जन्म सुदूर बर्फीले पहाड़ो में हुआ। मैंने  अपना  बचपन उनके पास उछलते, कूदते मस्ती के साथ बिताया  जैसे तुमने अपना बचपन अपने माता-पिता , अपने दोस्तों के साथ अपने गाँव मेंफिर मैं बड़ी हुई  मैं बाहर जाने कि जिद करने लगीमेरे पिता (पर्वतोंने मुझे समझाया कि जाना चाहती हो ,जाओ इस संसार के सभी चर-अचर प्राणियों की एक नियति होती है, एक उद्देश्य होता है। तुम्हारे जीवन का भी एक लक्ष्य है, और वह है निरंतर स्वयं को बेहतर बनाना , अपने से उच्चतर अवस्था  की ओर गतिमान होना तुम्हारा लक्ष्य है सागर से मिलना, और अच्छी बात यहै कि  तुम इसे जानती हो, वरना अधिकांश लोग अपने जीवन का लक्ष्य जान ही नहीं पाते।  नदी ने आगे कहा, पिता जी ने मुझसे पूछा था कि" लेकिन तुम्हारा लक्ष्य (सागर) बहुत दूर है।  रास्ता अत्यंत कठिन , कभी सघन तो कभी  विरल जन समुदाय मिलेंगे, कभी बीहड़  मिलेंगे सैकड़ों  उतार-चढाव मिलेंगे इस रास्ते मे, .क्या तुम जा सकोगी?"
      मैंने कहा, हाँ ! मैं हर जगह जाउंगी। मैं आपका ही प्रवाह मान रूप हूँआप जहाँ नहीं पहुंचे ,वहां भी जाउंगी, उन्हें आपकी शीतलता से तृप्त करुँगी और आपका सन्देश दूंगी। मैं उन्हे आपके वजूद का एहसास दिलाउंगीउन्होंने शशंकित  होते हुए पूछा कि हर नदी तो सागर में नहीं मिलती, तब क्या होगा? तब तो तुम्हारी सारी यात्रा व्यर्थ हो जाएगी ?
      मैंने उन्हे समझाया, पिता जी!  नदी अपने नाम से नहीं मिलती सागर से, किन्तु उसका तत्व तो किसी रूप में सागर में  मिल ही जाता है.और आपने ही तो सिखाया है, लक्ष्य प्राप्ति से महत्वपूर्ण तो उसके लिए कि जाने वाली यात्रा है, किया गया प्रयास है।
हो सकता है कि सूरज दादा कि मदद से मैं अपना रूप बदल के वापस किसी और जगह पहुँच जाउंगी पर अपनी यात्रा जारी रखूंगी, सदैव अपने से बेहतर स्थिति प्राप्त करने के लिए और तुम देख सकते हो, मैं चल ही रही हूँ, शांत, संयत बिना सोचे कि सागर में मिल पाऊँगी या नहीं!
      मुझे अपना भविष्य देखने कि प्रेरणा  हुई मैंने खुद कि तुलना नदी से करना शुरू कर दिया। मैं हमेशा अचानक बदलने वाली परिस्थिति से परेशाथा, लेकिन ये तो मात्र उतार -चढाव  हैं। जब सब साथ होते हैं तो ख़ुशी और जब नहीं होते तो ष्ट होता  था, लेकिन ये तो केवल यात्रा में सघन एवम विरल आबादी से गुजरना है। मुझे सब कुछ स्पष्ट दिखने लगा। 
      हम जितना आगे बढ़ते हैं,प्रगति करते हैं उतनी ही दूरी  हम अपने परिवार , घर से आगे चले आते हैं।  और लौटने का कोई सीधा मार्ग नहीं होता।  (हम फिर से अमरुद चुराकर नहीं खा सकतेया किसी गन्ने के खेत में बिना पूछे नहीं घुस  सकते....या जामुन नहीं बिन सकते )
समय के साथ हमसे समाज कि अपेक्षाए बदल जाती हैं, और हमें उसी के अनुरूप खुद को ढालना पड़ता है। लेकिन ये भी सत्य है कि नदी कि तरह ही हमारी प्रगति ,ख़ुशी का श्रोत भी हमारा जन्मस्थान (मूल) ही है सब कुछ  उनके साथ के  बिना अधुरा लगता है, वही  से हमें ताकत और उर्जा मिलती है।
      इस तरह से सोचने पर मुझे बहुत आश्चर्य हुआ कि जीवन कितना आसान है ! हर प्रश्न का जवाब  कितना  सरल है ! सुख-दुःख ,दोस्त-शत्रु, मिलना-बिछड़ना आदि सभी जीवन यात्रा के पड़ाव मात्र है,  जो जीवन में अपने तरीके से कुछ सिखाकर  जाते हैं और वो सीख मेरी यात्रा के लिए आवश्यक होगी या फिर उस यात्रा में  काम आयेगी। कई दिन से मैं परेशा था कि मेरा व्यवहार कैसा  हो,  मैं गर्म विचारधारा को मानु या फिर नरम विचारधारा को, लेकिन अब मैं विचार सागर में गोते लगा रहा था।
      जब नदी को बांध दिया जाता है, प्रदुषण  किया जाता है, जब उसका केवल शोषण किया जाता है, तो वही जीवनदायनी  अपना विकराल  रूप ले  के तबाही  लाती  है। सी प्रकार  शीतल का स्वाभाव  होना , दूसरों को संतुष्टि  देना  अच्छा  है। किन्तु शोषण  के विरुद्ध  आवाज  उठाने  के लिए कहीं से और कुछ मांगना नहीं पड़ता, बल्कि  उसका वही  जल  तबाही ला  देने के लिए भी पर्याप्त  है
      बैठा- बैठा मैं जीवन दर्शन  सीख गया। मुझे इस तरह सभी प्रश्नों  के उत्तर  मिलने  लगे, मैं बहुत खुश हुआ। जब मेरी तंद्रा टूटी तो चांद निकल आया था, चाँदनी फैली  थी,वो शांत माहौल, गंगा की  रेत  और चमकता  जल  शुकून  और धैर्य  प्रवाहित  कर रहा था, मेरे अंदर ।
वाकई  नदी का जीवन कितनी  अनिश्चितताओं  से भरा  पड़ा  है, और हमारा भी !
      हमारी अन्तः – प्रेरणा हमें हमेशा रास्ता दिखाती  है, इसके साथ केवल  शर्त यह है कि निडर  हो के  अपने दिल  कि आवाज़  सुनी  जायेयदि  एक बार  हृदय बोलना  सीख  गया तो फिर कहीं  और से किसी और प्रेरणा कि आवश्यकता   नहीं रहती  है। "ब्रह्माण्ड  का प्रत्येक   कण  सिखाने  लगता है."....
एक फिल्म आई थी, पिछले दिनों, ओम शांति ओम  उसी का यह संवाद मन मे घूम गया कि
"जब आप किसी को पूरे  दिल  से चाहते  है तो सारी कायनात  उससे  मिलाने  में आपकी मदद करती  है"

      और इस तरह मैं नयी  उर्जा से  भरा  हुआ खुद को हल्का  महसूस  करने लगा, गुनगुनाता  हुआ मैं वापस कमरे  की ओर चल पड़ा, मुस्कुराते हुये।  

      कभी-कभी अपने आप से बात  कर लेने  से कई उलझे प्रश्नों के जवाब मिल जाते   हैं.......कोशिश   करके  देखिये , अच्छा लगता है.....मिलना खुदसे............. 

                                --(सौरभ)