Sunday, February 28, 2010

"शादी क्यों होती है?"

" शादी क्यों होती है? इस प्रश्न ने मुझे चौका दिया ...... मैं उधर देखने लगा ..एक महिला जो की २८ से ज्यादा की नहीं लग रही थी अपने लगभग ५-६ साल के बच्ची और ४- ५ साल के बच्चे के साथ थी। वो उन्हें कुछ बता रही थी।
मैंने धीरे से अपने कान उधर कर दिए ......वास्तव में वो मेरे तिरछे दूसरी सीट पे थीं। दिल्ली की बसों में ये विशेष सुविधा होती है की "हम देख सके और सामने वाला उसे देखते हुए हमें न देख सके (इतनी भीड़ जो होती है) ...माँ ने हँसते हुए कहा की सब की होती है, और तुम्हारी भी होगी ............और ......तुम मुझे छोडके.....................



इतना कहकर वो सुनी आँखों से बाहर की ओर देखने लगी .......जैसे कुछ (ऐसा) जिसे छिपाने की कोशिस कर रही हो .....बच्ची परेशां हो गयी और मेरे तरफ देखने लगी उसे कुछ भी समझ नहीं आ रहा था. उसका चेहरा ये पूछ रहा था की क्या हुआ? उसने माँ सेकहा की मैं तुम्हे छोड़कर कहीं नहीं जाउंगी .............इस पर माँ की आंखे गीली हो गयी और उसे थपकी देते हुए कहा की पगली .......और कुछ याद करके मुस्करा दिया ...लड़की फिर बोली "मैं आपको छोडके नही जाउंगी" ...............बेटा थोडा परेशां था उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था उसने जल्दी से कहा की मैं भी न जाऊंगा ! माँ को हंसी आ गयी......................

बच्चे कितने संवेदनशील होते हैं! उन्हें यदि पता चल जाये की लोग किस बात से खुश हैं तो वो उसे ही दोहराते हैं,,, कभी कभी क्रोध आने की हद तक ...................माँ ने दोनों को गले से लगा लिया............... वो लड़की मेरे तरफ चुप-चाप देखेने लगी ..उसकी खामोश आंखे मुझे अतीत की तरफ खिंच कर ले गयी और बार -बार एक ही प्रश्न मेरे सामने घुमने लगा ............."शादी क्यों होती है?????????????? "

ये प्रश्न हर लड़की (लड़का ) अपने माता-पिता ,भाई से जरूर पूछती है और उनके पास इसका कोई जवाब नहीं होता......."तर्क तो बहुत किया जा सकता है....लेकिन भावना का स्थान तर्क से ऊपर होता है ..इसीलिए इसका संतोषजनक जवाब संभव ही नहीं हो  ...............

इस प्रश्न से पहली बार मैं तब वाकिफ हुआ जब मै ५ वि का छात्र था ................दीदी की शादी के बारे में मेरी चाची मेरे माँ को सलाह दे रही थी की लड़की की शादी जितनी जल्दी हो जाये उतना ही अच्छा है,,,लड़की जितनी जल्दी अपने घर चली जाये उतना ही अच्छा ..................

( बाद में एक दिन "अपना घर'’ नाम से एक कहानी पढ़ी थी ........"..एक लड़की खाना बना रही थी उसकी सास ने कहा तेरा नखरा अपने घर में करना ,,,यहाँ नहीं सहा जायेगा ....पता नहीं तेरी माँ ने क्या सिखया है ? यही सिख के आई है अपने घर से ....लड़की को वो दिन याद आया " जब माँ से जेंस पहनने की जिद कर रही थी और माँ ने कहा था की अपने घर जाना तो जैसे जी चाहे वैसे रहना ,,जो मन करे करना.......................वो सोचने लगी मेरा अपना घर कहाँ है? )

माँ को वैसे इतनी जल्दी फालतू बात समझ में तो नहीं आती किन्तु उस रोज शायद पहली बार उन्हें लगा की "नहीं बात तो सही है ' उन्होंने दीदी से कहा की अब तेरी शादी के बारे में सोचना होगा .... दीदी वर्ग ६ की विद्यार्थी थी ...शायद उनका इस संवाद से पाला पहले ही पद चूका था ........उन्होंने कहा की ये शादी क्यों होती है?????
माँ ने तब दुनियादारी समझाई और मुझसे कहा जल्दी -जल्दी मन लगा के पढो दीदी की शादी के लिए तैर्यारी करनी है॥ । ............ मैंने कहा मैं तो तैयार हूँ मेरी पहले कर दो . ....दीदी तो झूठे रोने लगती है ............माँ ने हँसते हुए कहा की पहले कमाओ तो ...... मैं कहना चाहता की और दीदी के लिए कोई शर्त नहीं ,,,,,,सारे शर्त मेरे लिए ही हैं..
लेकिन जब मैं १० वि में था तो दी की पहली फोटो भेजी गयी थी ......और दीदी ने फिर पूछा की ये शादी इतनी जरुरी क्यों है??????????????
"MAIN PADHANA CHAHTI HOON , अपने पैरों पे खड़ा होना चाहती हूँ ......तब पापा ने कहा था की बेटी तुम जो चाहती हो करो लेकिन अच्छे लड़के तो एक दिन में नहीं मिलते न ...इसलिए मुझे मेरा कम करने दो और तुम अपना काम करो ...........

SAMAY का चक्र चलता रहा ..दीदी ने अपना LLB पूरा किया और बनारस कुत्चेरी में प्रक्टिस करने लगी ..इस बिच कई जगह बात चलटी रही ...........और पिछले महीने उनकी शादी हो गयी .............और वही प्रश्न पूछते हुए चली गयी...............
PICHHLE ५ महीनो में इतनीबार ये प्रश्न दोहराया गया है की मैं इसका जवाब न तो खोज पाया .....................और न ही समझ पाया

DUKHI HOKE BAAHAR DEKHNE LAGTA HOON ...और पता ही नहीं चला की कब पलकें भारी हो गयी और सब कुछ धुंधला सा लगने लगा मैंने अपने हाथ से आंखे छुए तो उंगलियाँ भींग गयी ...............अरे मैं तो रोने लगा (लेकिन आंसुओं का गिरना रोना नहीं होता है)...कहीं कोई देख न ले मैं बाहर की औ देखने लगा ..तेज निकलती गाड़िया और लाल बत्ती पे कड़ी गाड़िया ........दिल्ली के भीड़ में खुद को भुला देने की कोशिश करने लगा .........लेकिन नाकाम रहा ...............खिड़की से आती ठंडी बसंती हवा आंसुओं को सुखा चुकी थी ...मन प्रशन्न था लेकिन अधीर भी..मैंने आंखे बंद बंद कर ली और गाना गुनगुनाने लगा ...कुछ देर बाद जब मैंने आंखे खोली और देखा तो वो लड़की अब भी मुझे घूर रही थी ......मुझे लगा की उसके खामोश प्रश्नों से मैं भाग नहीं सकता ...... ........आज ये लड़की मुझे अपने छोटी बहन की यद् दिला रही थी जो शायद यही प्रश्न मुझसे पूछे और मैं फिर कोई जवाब न दे सकूँ ..........................

मैंने घडी देखि ९.१० हो रहे थे अभी OFFICE पहुँचने में २० MINT लगेंगे । मैंने सोचा तब तक कुछ सोचा जाये .....क्यों न मानसिक व्यायाम ही कर लिया जाये ...कितना मुर्खता पूर्ण कार्य था ये ! जिस प्रश्न से हजारों सालों से भारतीय लोग संगर्ष कर रहे हैं उन्हें 20 MINT में हल करना चाह रहा था......तभी दिमाग ने कहा की पिछले १५-१६ सालों से तुम भी तो इस प्रश्न से जूझ्ह रहे हो तो क्यों नहीं उन सबों को इकठ्ठा करो शायद कुछ मिल जाये ..... फिर एक -एक करके ये प्रश्न मेरे सामने आते जाने "लगा कभी मेरी माँ द्वारा अपनी माँ से , कभी मौसी द्वारा अपनी माँ से , कभी भाभी के द्वारा ..................कभी किसी नारी के द्वारा तो कभी किसी ........अंत में पूरा नारी समाज मुझे पुरुष शारीर प्राप्त करने के कारन यही प्रश्न पूछता नजर आया और मैं पुरुष समाज के प्रतिनिधि के रूप में खामोश .........

आज ये लड़की मुझे अपने छोटी बहन की यद् दिला रही थी जो शायद यही प्रश्न मुझसे पूछे और मैं फिर कोई जवाब न दे सकूँ..........................
इस प्रकार इतनी आवाज़े गूंजने लगी की पूरा सर तेज दर्द से फटने लगा और मैं खुद को बहरा महसूस करने लगा बाहर की कोई आवाज़ सुनाई नहीं दे रही थी ..........कई चींजे एक साथ लड़ने लगी और टकराने लगी। मैंने घबडा के अपनी आंखे खोली और अपना सर पकड़ लिया .........
मैं अपना सर पकड़ के बहर देखने लगता हूँ और बिना बात के मुस्कराने की कोशिश करता हूँ .......".शादी क्यों होती है????"



इसी समय उस छोटे से परिवार का स्टैंड आ गया और वे उतर गए (मैंने सोचा जान छूती)। वो बच्ची अभी भी घूरते हुए जा रही थी .........जैसे कह रही हो आपको छोड़ने वाली नहीं हूँ। मैं इस देश का भविष्य हूँ, और ये आपका कर्तव्य है की आप जवाब दें ........... मैं उसकी तरफ देखकर मुस्करा दिया ........और अपने ऑफिस की तरफ बढ़ चला........
उसका वो प्रश्न पूछता चेहरा अब भी मेरे सामने था। मैं भूलना चाहता था लेकिन जैसे वो पूछती ही जा रही थी .......मैंने खुद से कहा की दुनिया का ठेका ले रखा है ,,मैं ही क्यों सोचूं.....

वास्तव में जब आदमी को अपनी लघुता का एहसास होता है तो या तो वो विनम्र हो जाता है या फिर अपनी गलतियों को छुपाने केलिए आक्रामक हो जाता है और सामने वाले पर दोस देने लगता है...जब भी आप किसी को दोष दे तो ये जरूर सोचे की कहीं मैं अपनी कमजोरी तो नही छिपा रहा हूँ ...मेरे चिल्लाने में मेरी हार छुपी है...........
ये ख्याल आते ही मैंने खुद से कहा की कोई बात नहीं मुझे कुछ समय चाहिए ताकि मैं और सोच सकूँ......(इस प्रकार मैं उस समय बच निकलना चाहता था) ....लेकिन फिर एक प्रश्न कितना समय??...........सदियों से तुम पुरषों ने बार -बार हमें मुर्ख बनाया है और आज फिर..........
इतने में ऑफिस आ गया मैं ऑफिस में सबको नमस्ते करते, हाथ मिलते हुए अंदर चला गया..(सोचा बकवास बंद काम शुरू) .............

अपने काम में मैं भूलने का प्रयास करता हूँ, की कोई प्रश्न था "शादी क्यों होती है?" लेकिन क्या भूलने से इसका कोई समाधान मिल पायेगा। क्या आप मेरी मदद करेंगे............................................
हम सब की ये जिम्मेदारी है की हम एक जिम्मेदार अनुगामी और जवाबदेह पथप्रदर्शक बने......आने वाली पीढ़िय ये जरूर पूछेंगी ...............और हमें जवाब देना होगा.................
मैंने कुछ सोचा है......
शादी एक ऐसा माध्यम है जो हमें नयी जिम्मेदारियों के साथ जीने योग्य बनता है......परिवर्तन के माध्यम से हम जीवन में खुश रह सकते हैं...और आनंद की प्राप्ति कर सकतें हैं.....(जब हमारी क्षमता बढती है तो जिम्मेदारी भी उसी अनुपात में बढ़नी चाहिए और उसे पूरा करने के लिए आपको आपके जैसा सहयोगी मिल जाता है........जो सब जनता है..बिलकुल आपकी तरह॥) और इस प्रकार समाज की सरंचना में ,उसकी गतिशीलता में आप सहयोग देते हैं. .......

बुद्ध ने कहा " प्रिय से बिछड़ना और अप्रिय से मिलना दुःख का कारन है" किन्तु कोई वस्तु कभी प्रिय या अप्रिय नहीं होती बल्कि एक ही वस्तु/स्थिति यदि लगातार रहे तो वो सुख से दुःख में और दुःख से सुख में बदल जाती है...दुःख से सुख में (दर्द का हद से गुजरना है ,,उसका दवा हो जाना)......
ये सर्वविदित है की स्त्रियाँ ,पुरुषों से जयादा संवेदनशील होती है (जल्दी दुखी-सुखी दोनों हो जाती है)...इसलिए उनका स्थान -परिवर्तन उनकी ख़ुशी को ध्यान में रखकर अवश्यक होता है..वो बहुत तेजी से नयी स्थिति में संतुलन बना लेती है..दोनों जगह सम्हाल लेती है......

पुरुष के जीवन में भी परिवर्तन होता है लेकिन उनका कम संवेदनशील होना उन्हें इस विरह वेदना से बचा लेता है,,(ये कहना सही नहीं होगा) उनके विरह का रूप दूसरा होता है ...रोजी- रोटी के जुगाड़ में दुनिया घुमानी पड़ती है। अपने प्रिय जानो से विछोह होता है। दोनों के साथ संतुलन बनाना पड़ता है, एक तरफ माता -पिता ,एक तरफ पत्नी..(दोनों के सपनो और उम्मीदों की डोर उससे जुडी होती है ... और वो बेचारा कुछ कह भी नहीं सकता "मर्द होके रोता है। और उस पे ये आरोप भी की पत्नी की ज्यादा सुनता है ,या फिर जल्लाद है पत्नी की सुनता ही नहीं) नारी समाज को लगता है की पुरुष वर्ग बहुत खुश है उसे कोई तकलीफ नहीं है ( लेकिन दूर के ढोल सुहावन )।

रुकिए -रुकिए इससे पहले की आप अपने तर्कों से इस कमजोर पक्ष को धरासायी करे मेरी एक कहानी सुनिए जिसे मैंने कहीं पढ़ा था....

"नदी का बहाव बहुत तेज था , उसमे दो तिनके बहते जा रहे थे। एक तिनका उसमे बहते हुए सोच रह था की मैं इस नदी को सागर से मिला के ही रहूँगा और नाचता जा रहा था,मस्ती में.......जबकि दूसरा उसके बहाव को रोकने की कोशिश कर रहा था। उसने नदी की दिशा बदलने की सोची थी। और इस प्रयास में वो दर्द के मारे टूटने की कगार पे पहुँच गया.........यह वाकया एक चिड़िया ऊपर से देख रही थी उसने सोचा की दोनों मूर्खों के अस्तित्व का इस नदी पे कुछ भी असर नहीं पद रह है। किन्तु एक ने अपनी सोच से आने जीवन में ख़ुशी प्राप्त कर ली और दूसरे ने अपनी जिंदगी दुखों से भर ली..."

मैं तो बस उस तिनके की तरह ख़ुशी खोजने और फ़ैलाने की कोशिश कर रहा हूँ।

रही बात उस प्रश्न की तो कुछ प्रश्न ऐसे होते हैं की जिनका जवाब केवल मौन होता है। जितना इनका जवाब सोचों उतना उलझते जायेंगे। मौन ही इनका सर्वोतम जवाब हो सकता है...आप भावना के जिस इस्तर पे हो जो दिल कहे उसे करो .(दिल कहे से मतलब ये नहीं की मनमाना व्यवहार। ये तो बस गहराई से महसूस भावना है। गाँधी के शब्दों में अंतरात्मा की आवाज)।

ऐसा लग रहा है की मैं भी उसी तरह से सोचने लगा हूँ। अब आप ही बताइए की कैसे इस प्रश्न का उत्तर दिया जाये। शादी क्यों होत्ती है? उन प्रश्न पूछती आनासुओं से भरी आँखों का जवाब क्या हो? शादी क्यों होती है???

6 comments:

Manish said...

Vaah......... aisi samvedana to mujhme bhi nahin..

maine kabhi is tarah sochaa hi nahin...lekin ab to mera no. aa rahaa hai...

shayad main kisi ke ghar na jaa paaun... lekin ab kisi ladki ko uska ghar chhudavaana achchha nahin lag rahaa hai....

bahut achchha bhai..... party ke liye save rupees me 100 aur add kar lo.... :) :)

जयराम “विप्लव” { jayram"viplav" } said...

कली बेंच देगें चमन बेंच देगें,

धरा बेंच देगें गगन बेंच देगें,

कलम के पुजारी अगर सो गये तो

ये धन के पुजारी वतन बेंच देगें।

हिंदी चिट्ठाकारी की सरस और रहस्यमई दुनिया में राज-समाज और जन की आवाज "जनोक्ति "आपके इस सुन्दर चिट्ठे का स्वागत करता है . . चिट्ठे की सार्थकता को बनाये रखें . नीचे लिंक दिए गये हैं . http://www.janokti.com/ , साथ हीं जनोक्ति द्वारा संचालित एग्रीगेटर " ब्लॉग समाचार " से भी अपने ब्लॉग को अवश्य जोड़ें .

jayanti jain said...

great

संगीता पुरी said...

इस नए चिट्ठे के साथ आपको हिंदी चिट्ठा जगत में आपको देखकर खुशी हुई .. सफलता के लिए बहुत शुभकामनाएं !!

uday said...

Great Bhai,

aap esi trah ankho se Parde Hataya kare,,

Keep It Up.

satya_dwivedi2010@yahoo.com said...

khoobsurat