Thursday, February 25, 2010

एक बात ये भी .................

खुश होना और खुश दिखना दो अलग स्थिति है.............
खुश होने में वक्ती शांत और मस्त हो जाता है...............खुश दिखने में तनाव होता है.....
खुश होने पर ये चिंता नहीं होती की सामने वाला क्या सोच रहा है ............खुश दिखने के लिए हमेशा सामने वाले के रुख को देखकर चलना होता है ..........................
खैर ये तो रही एक बात .......................
अब मैं आपके लिए एक प्रश्न लाया हूँ ..............................
जो हमेशा मुझे सोचने पर मजबूर करते हैं.........................और तकलीफ देते हैं,,...
तो आईये चलते हैं.......................
दो सहोदर अर्थात भाई,(बहन), दयाद क्यों हो जाते हैं..........दयाद का मतलब गोतिया (या फिर ईर्ष्यालु ).........
अंग्रेजी में इसे (इर्शालू) सिबलिंग कहतें हैं.........................
अच्छा आप सोच रहे होंगे की भाई तो समझ में आता है किन्तु बहन कैसे..................
तो वो ऐसे की बहन केवल शरीर से यदि आप समझ रहें हैं तो आप गलती पर हैं.................
वास्तव में बहन को उतनी छूट समाज ने कभी दी ही नहीं की वो अपने आपको प्रतिस्पर्धी समझ सके॥ ...............और जब स्पर्धा ही नहीं तो फिर इर्ष्या कैसी....
मेरे कहने का तात्पर्य यह नहीं है की भाई -बहन में प्रेम नहीं हो सकता और वो केवल मजबूरी है ,,,,,,,,,,,एक की दीनता है और एक का गुरुर.........................
खैर दोनों सहोदरों का लालन पालन एक ही प्रकार से होता है ,,,किन्तु समय के हिसाब से (माता-पिता कि स्थिति) दोनों में किसी की मांगे पूरी हो पाती हैं और किसी कि नहीं ..............जिसकी पूरी होती हैं वो कुछ समझ नहीं पता और जिसकी पूरी नहीं होती वो काफी कुछ समझ जाता है...............
या फिर इसका उल्टा भी उतना ही सही है............(.एक दूसरे पे मिथ्या आरोप तय किये जाते हैं... मसलन तुम्हे मम्मी पापा नहीं मानते ,,या फिर मुझे नहीं मानते तुम्हे तो खूब मानते हैं।)....
दोनों एक दूसरें के साथ समय नहीं बिता पातें ,,कभी खुलकर बात नहीं कर पातें या फिर इस दुनिया में जिन्दा रहने कि प्रतिस्पर्धा उन्हें इतना समय नहीं दे पाती की वो एक दूसरे की भावनाओ और अवास्क्ताओं को समझ सकें ................एक दूसरे से परिचित हो सकें ...............................बिना परिचय के प्रेम नहीं हो सकता ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,(,बिना प्रेम के त्याग नहीं )...........और बिना त्याग के समबन्ध नहीं चल पातें .............और वे स्वार्थ सीधी जैसे निकृष्ट कार्य में लग जाते हैं...और वो उन्हें सही प्रतीत होता है...............अरे मेरा परिवार ,मेरी बीवी, मेरे बच्चे ...और उलझकर रह जाते हैं
ये भूलकर की कल वे किसी परिवार के बच्चे थे ,,,और आज किसी परिवार के पालक ....और कल किसी परिवार के फालतू सामान ।
हमारा विकास होता है............हम आगे बढ़ते हैं इसका मतलब ये नहीं की अपने अतीत को छोड़कर ,,,,,,,,,,,,,,, बंटवारा जरुरी हो सकता है ताकि भिन्न-भिन्न प्रश्ठितियों में सही निर्णय के माध्यम से ख़ुशी को अधिकतम किया जा सके.......
पर बंटवारा के बाद ये एक दूसरे के जड़े काटने की सोच कैसे सकते हैं..????????????????....................
मुझे लगता है की कुछ छूट रहा है ........कहीं न कहीं तो कुछ गड़बड़ है ..............
एक बार मैंने अपने मित्र से पुछा की इस दुनिया में विभिन्न तरंगे हमें प्रभावित कर रही हैं या फिर करना चाहती हैं ,,,,,,,,,,,,,यदि हम चट्टान की तरह अड़ जाएँ तो हो सकता है कुछ हमें छू के चली जाएँ और कुछ बिगाड़ न पायें ,,,,,,,,,,,,,लेकिन यदि मजबूत तरंग आ गयी तो हमारा टूटना तय है ...................मैं निर्णय नहीं कर पा रहा हूँ ,,,,,क्या करू?
तो उसने कहा की इतना सोचने की क्या जरूरत है ? केवल तरंगो के साथ खुद को हिलाते रहो वे आयेंगी और यूँ ही चली जाएँगी कुछ नहीं बिगाड़ पाएंगी .............
मैंने कहा की लेकिन इससे हम तो अनिश्य मन वाले दिखाई देंगे .....लोग का कहेंगे ..................
उसने हँसते हुए कहा की "दुनिया का सबसे बड़ा रोग ..... क्या कहेंगे लोग".......................
और ......कहा की हम समस्या का समाधान खोज रहें और तुम बिना मतलब के बात सोच रहे हो.............. । ये बताओ की जब तुम जानते हो की तुम सही हो ,,,,तुम्हारा खुद पर नियंत्रण है तो फिर तो जीवन रूपी शतरंज पे ये तुम्हारी एक चाल के सिवा और कुछ नहीं ..................................
तो मस्ती के साथ जियो और जितना अच्छा हो सके उतना करो ..........ज्यादा सोचना अच्छा नहीं प्यारे............
तुम यदि अच्छा सोचते हो तो इसमें केवल तुम्हारा योगदान नहीं ,,,,,,,,,,,यदि अच्छा करते हो तो इसमें भी तुम्हारा कोई कारनामा नहीं ...........ये तो तुम्हारे संस्कार और संगत का असर है...
उस देश में तुमने जन्म लिया है जो राम, कृष्ण, बुद्ध, गाँधी , दधिची, कर्ण, विदेह, .......आदि जैसे महान हस्तियों ने जन्म लिया है और इसी की मिटटी में घुल गए ...और फिर इसी मिटटी से तुम्हारे शारीर का निर्माण हुआ तो ..................समझ गए अपने अस्तित्व की कहानी .........इसलिए दुनिया में जिस कम के लिए भेजे गए हो उसे पूरा करने का प्रयास करो,.......और खुश रहो नाटक मत करो .......................जिंदादिल बनो,,,,मस्तियाँ करों ............शेष फिर कभी...............

1 comment:

Manish said...

आपकी बातों से मैं सहमत हूँ भाई लेकिन इस दुनिया में इस तरह से सोचने वाले कम मिलते हैं, दिमाग और मन दोनों बदल जाते हैं अगर इन्हें इनके मुताबिक खुराक नहीं मिली तो…… बस सब इसी का खेल है