Saturday, February 20, 2010

मोहब्बत कहते जिसे हैं.........

यूँ तो प्यार इतनी ऊँची भावना है की इसके बारे में बहुत कुछ कहा जा सकता है, लिखा जा सकता है, और ऐसा किया भी गया है।,
मैंने अब तक के समय में जो देखा है , महसूस किया है , समझा है उसे जरूर बताना चाहूँगा.....
हुआ यूं की मेरे एक परिचित ने मुझसे पुछा की आप किसी से प्यार करते हो? मैंने कहा हाँ... !! ये सुनकर चहकते हुए पूछे की कौन है, वो लड़की.....? मैं चौक गया !! , मेरा इरादा उनसे बहस करने का नहीं था सो मैं चुप होना चाहता था , लेकिन मेरी ख़ामोशी को उन्होंने मेरा शरमाना समझ लिया.....और कोहनी से धक्का देते हुए फिर वही दोहराया..... अब मेरी बारी थी , मैंने उनको समझाने का असफल प्रयास करते हुए कहा की "प्यार कोई जरुरी नहीं की लड़की से ही किया जाये ... इससे पहले की मैं अपनी बात पूरी करूँ उन्होंने नहले पे दहला फेंकते हुए कहा की ठीक है मम्मी पापा, अपने परिवार , मित्र से सभी प्यार करते हैं......मैं तो वो वाला प्यार पूछ रहा हूँ.....
तब पहली बार लगा की प्यार भी कई प्रकार का होता है वो वाला , इ वाला , ........
लेकिन मेरा तार्किक दिमाग ये मानने को तैयार न था ,,, मैंने तो इतना ही जाना है की "प्यार तो बस प्यार होता है."..उसमे किसी को दुनिया की तमाम ख़ुशी देने की इच्छा होती है, ऐसा लगता है की बस .......वो खुश रहे , ,उसकी हर ख्वाविश पूरी हो ,,, हे खुदा तू उसे इतनी ख़ुशी दे की दुनिया के सारे ग़म उससे दूर चले जाएँ ,, वो हरदम हँसता रहे ,,उसका हमेशा ध्यान लगा रहता है...... आदमी जिम्मेदार हो जाता है , ख्याल रखने वाला बन जाता है । यही तो खासियत होती है प्यार की आप को सब कुछ अच्छा लगने लगता है। आप सबके साथ अच्छा व्यव्हार करने लगते हो ...."। जब इतनी मोहब्बत हो तो नफरत के लिए जगह ही नहीं बचती "...
लेकिन अभी उनके तर्क तो बाकि ही थे ..... तब मैंने अपने को समझाया की वो बेचारे प्यार तो सुने हैं किन्तु शायद उसका मतलब आत्मसात नहीं कर पाए ,और इसीलिए तर्कों में उलझे हैं ,,, वर्ना प्यार में तर्कों की कोई जगह नहीं होती ....प्यार करने वाला तो कभी अपने दुःख से दुखी ही नहीं होता उसे तो चिंता अपने प्रिय की होती है ॥
अगर उसके आँखों से आंसू भी निकले तो अपने प्यार के लिए , कोई दुआ भी मांगी तो अपने प्यार के लिए.....
खैर वो ये सब नहीं समझ सकते,........
इन सब को समझने के लिए वक्ती का प्यार में होना जरुरी होता है...........मेरा ये दावा नहीं है की मैं प्यार को समझ सकता हूँ ....या समझ गया हूँ....किन्तु...
अब आप ही बताइए की माँ का प्यार जिसमे कोई मिलावट नहीं होती ,,,उसको प्यार नहीं कह सकते क्यों?? पहले के समय में लड़कियों को ये आशीर्वाद दिया जाता था की तेरे दस पुत्र हों , ओर दसवां पुत्र तेरा पति हो....
चौंकिय मत... ये इसलिए था की प्रेम की पराकाष्ठ माँ का प्यार ही है जो निश्छल होता है.....और तुम वहां तक पहुँचो....
रही बात ये वाली , वो वाली तो उनको मैंने इतना ही कहा की ... प्यार एक नदी की तरह है किनारे पर थोडा गहरा और बिच में अधिक ....इससे आप किनारे को नदी मानने से इंकार तो नहीं कर सकते ...
उसी तरह से प्रेम हर संबंधो में होता है ,,,, या यूँ कहे की प्रेम ही संबंधो को आधार होता है ,,,,अलग- अलग संबंधों की अलग मर्यादाएं , अपेक्षाएं होती हैं .... और यही उसे भिन्न बनता है... लेकिन प्रेम अलग नहीं होता ये तो बस गहराई की बात है....
इस प्रकार उन्हें संतुष्ट करने का प्रयास किया .......
किन्तु उनका प्रशन ये था की लोग फिर प्यार में दुखी क्यों दिखाई देते हैं.....
इसका जवाब मैंने दिया की वे मोह को प्यार समझते हैं...... मोह , बंधन होता है जबकि प्यार मुक्त करता है.....
जैसे पिंजरे में चिड़िया को बंद करना मोह है जो उसे तकलीफ देता है, खुले आकाश में चिड़िया को उड़ते देखना प्यार है ....इसलिए प्यार करने वाला दुखी नहीं होता क्योंकि उसे अपने प्रिय से ये अपेक्षा नहीं होती की वो भी बदले में उससे प्यार करे ..... प्यार तो बस प्यार है वो व्यापर नहीं है ......की लाभ -हानि सोचा जाये॥
पति- पत्नी (प्रेमी या प्रेमिका) का सम्बन्ध हो सकता है की कोई बंधन न माने और इसीलिए पत्नी का किसी के तरफ देखना गवारा नहीं होता , " तुम हमें चाहो न चाहो कोई बात नहीं तुम किसी और को चाहो तो मुस्किल होगी "..............
शायद ये बात उनकी समझ में आ गयी.............. और भी बहुत से प्रश्न थे जिनका जिक्र फिर कभी......................

1 comment:

Uday said...

es fellings ko Padhne ke baad mere pass koi sabd nhi hai ki mai kaise esko appreciate karo because it is not only actaully right explantaion but also true heart love..

thanks saurabh ji jo apne madham se logo ko ek achi rasta dikhane ke liye

mai apka Fan ho gya plsssssssssss keep it,,
God Bless You..