Sunday, February 28, 2010

"शादी क्यों होती है?"

" शादी क्यों होती है? इस प्रश्न ने मुझे चौका दिया ...... मैं उधर देखने लगा ..एक महिला जो की २८ से ज्यादा की नहीं लग रही थी अपने लगभग ५-६ साल के बच्ची और ४- ५ साल के बच्चे के साथ थी। वो उन्हें कुछ बता रही थी।
मैंने धीरे से अपने कान उधर कर दिए ......वास्तव में वो मेरे तिरछे दूसरी सीट पे थीं। दिल्ली की बसों में ये विशेष सुविधा होती है की "हम देख सके और सामने वाला उसे देखते हुए हमें न देख सके (इतनी भीड़ जो होती है) ...माँ ने हँसते हुए कहा की सब की होती है, और तुम्हारी भी होगी ............और ......तुम मुझे छोडके.....................



इतना कहकर वो सुनी आँखों से बाहर की ओर देखने लगी .......जैसे कुछ (ऐसा) जिसे छिपाने की कोशिस कर रही हो .....बच्ची परेशां हो गयी और मेरे तरफ देखने लगी उसे कुछ भी समझ नहीं आ रहा था. उसका चेहरा ये पूछ रहा था की क्या हुआ? उसने माँ सेकहा की मैं तुम्हे छोड़कर कहीं नहीं जाउंगी .............इस पर माँ की आंखे गीली हो गयी और उसे थपकी देते हुए कहा की पगली .......और कुछ याद करके मुस्करा दिया ...लड़की फिर बोली "मैं आपको छोडके नही जाउंगी" ...............बेटा थोडा परेशां था उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था उसने जल्दी से कहा की मैं भी न जाऊंगा ! माँ को हंसी आ गयी......................

बच्चे कितने संवेदनशील होते हैं! उन्हें यदि पता चल जाये की लोग किस बात से खुश हैं तो वो उसे ही दोहराते हैं,,, कभी कभी क्रोध आने की हद तक ...................माँ ने दोनों को गले से लगा लिया............... वो लड़की मेरे तरफ चुप-चाप देखेने लगी ..उसकी खामोश आंखे मुझे अतीत की तरफ खिंच कर ले गयी और बार -बार एक ही प्रश्न मेरे सामने घुमने लगा ............."शादी क्यों होती है?????????????? "

ये प्रश्न हर लड़की (लड़का ) अपने माता-पिता ,भाई से जरूर पूछती है और उनके पास इसका कोई जवाब नहीं होता......."तर्क तो बहुत किया जा सकता है....लेकिन भावना का स्थान तर्क से ऊपर होता है ..इसीलिए इसका संतोषजनक जवाब संभव ही नहीं हो  ...............

इस प्रश्न से पहली बार मैं तब वाकिफ हुआ जब मै ५ वि का छात्र था ................दीदी की शादी के बारे में मेरी चाची मेरे माँ को सलाह दे रही थी की लड़की की शादी जितनी जल्दी हो जाये उतना ही अच्छा है,,,लड़की जितनी जल्दी अपने घर चली जाये उतना ही अच्छा ..................

( बाद में एक दिन "अपना घर'’ नाम से एक कहानी पढ़ी थी ........"..एक लड़की खाना बना रही थी उसकी सास ने कहा तेरा नखरा अपने घर में करना ,,,यहाँ नहीं सहा जायेगा ....पता नहीं तेरी माँ ने क्या सिखया है ? यही सिख के आई है अपने घर से ....लड़की को वो दिन याद आया " जब माँ से जेंस पहनने की जिद कर रही थी और माँ ने कहा था की अपने घर जाना तो जैसे जी चाहे वैसे रहना ,,जो मन करे करना.......................वो सोचने लगी मेरा अपना घर कहाँ है? )

माँ को वैसे इतनी जल्दी फालतू बात समझ में तो नहीं आती किन्तु उस रोज शायद पहली बार उन्हें लगा की "नहीं बात तो सही है ' उन्होंने दीदी से कहा की अब तेरी शादी के बारे में सोचना होगा .... दीदी वर्ग ६ की विद्यार्थी थी ...शायद उनका इस संवाद से पाला पहले ही पद चूका था ........उन्होंने कहा की ये शादी क्यों होती है?????
माँ ने तब दुनियादारी समझाई और मुझसे कहा जल्दी -जल्दी मन लगा के पढो दीदी की शादी के लिए तैर्यारी करनी है॥ । ............ मैंने कहा मैं तो तैयार हूँ मेरी पहले कर दो . ....दीदी तो झूठे रोने लगती है ............माँ ने हँसते हुए कहा की पहले कमाओ तो ...... मैं कहना चाहता की और दीदी के लिए कोई शर्त नहीं ,,,,,,सारे शर्त मेरे लिए ही हैं..
लेकिन जब मैं १० वि में था तो दी की पहली फोटो भेजी गयी थी ......और दीदी ने फिर पूछा की ये शादी इतनी जरुरी क्यों है??????????????
"MAIN PADHANA CHAHTI HOON , अपने पैरों पे खड़ा होना चाहती हूँ ......तब पापा ने कहा था की बेटी तुम जो चाहती हो करो लेकिन अच्छे लड़के तो एक दिन में नहीं मिलते न ...इसलिए मुझे मेरा कम करने दो और तुम अपना काम करो ...........

SAMAY का चक्र चलता रहा ..दीदी ने अपना LLB पूरा किया और बनारस कुत्चेरी में प्रक्टिस करने लगी ..इस बिच कई जगह बात चलटी रही ...........और पिछले महीने उनकी शादी हो गयी .............और वही प्रश्न पूछते हुए चली गयी...............
PICHHLE ५ महीनो में इतनीबार ये प्रश्न दोहराया गया है की मैं इसका जवाब न तो खोज पाया .....................और न ही समझ पाया

DUKHI HOKE BAAHAR DEKHNE LAGTA HOON ...और पता ही नहीं चला की कब पलकें भारी हो गयी और सब कुछ धुंधला सा लगने लगा मैंने अपने हाथ से आंखे छुए तो उंगलियाँ भींग गयी ...............अरे मैं तो रोने लगा (लेकिन आंसुओं का गिरना रोना नहीं होता है)...कहीं कोई देख न ले मैं बाहर की औ देखने लगा ..तेज निकलती गाड़िया और लाल बत्ती पे कड़ी गाड़िया ........दिल्ली के भीड़ में खुद को भुला देने की कोशिश करने लगा .........लेकिन नाकाम रहा ...............खिड़की से आती ठंडी बसंती हवा आंसुओं को सुखा चुकी थी ...मन प्रशन्न था लेकिन अधीर भी..मैंने आंखे बंद बंद कर ली और गाना गुनगुनाने लगा ...कुछ देर बाद जब मैंने आंखे खोली और देखा तो वो लड़की अब भी मुझे घूर रही थी ......मुझे लगा की उसके खामोश प्रश्नों से मैं भाग नहीं सकता ...... ........आज ये लड़की मुझे अपने छोटी बहन की यद् दिला रही थी जो शायद यही प्रश्न मुझसे पूछे और मैं फिर कोई जवाब न दे सकूँ ..........................

मैंने घडी देखि ९.१० हो रहे थे अभी OFFICE पहुँचने में २० MINT लगेंगे । मैंने सोचा तब तक कुछ सोचा जाये .....क्यों न मानसिक व्यायाम ही कर लिया जाये ...कितना मुर्खता पूर्ण कार्य था ये ! जिस प्रश्न से हजारों सालों से भारतीय लोग संगर्ष कर रहे हैं उन्हें 20 MINT में हल करना चाह रहा था......तभी दिमाग ने कहा की पिछले १५-१६ सालों से तुम भी तो इस प्रश्न से जूझ्ह रहे हो तो क्यों नहीं उन सबों को इकठ्ठा करो शायद कुछ मिल जाये ..... फिर एक -एक करके ये प्रश्न मेरे सामने आते जाने "लगा कभी मेरी माँ द्वारा अपनी माँ से , कभी मौसी द्वारा अपनी माँ से , कभी भाभी के द्वारा ..................कभी किसी नारी के द्वारा तो कभी किसी ........अंत में पूरा नारी समाज मुझे पुरुष शारीर प्राप्त करने के कारन यही प्रश्न पूछता नजर आया और मैं पुरुष समाज के प्रतिनिधि के रूप में खामोश .........

आज ये लड़की मुझे अपने छोटी बहन की यद् दिला रही थी जो शायद यही प्रश्न मुझसे पूछे और मैं फिर कोई जवाब न दे सकूँ..........................
इस प्रकार इतनी आवाज़े गूंजने लगी की पूरा सर तेज दर्द से फटने लगा और मैं खुद को बहरा महसूस करने लगा बाहर की कोई आवाज़ सुनाई नहीं दे रही थी ..........कई चींजे एक साथ लड़ने लगी और टकराने लगी। मैंने घबडा के अपनी आंखे खोली और अपना सर पकड़ लिया .........
मैं अपना सर पकड़ के बहर देखने लगता हूँ और बिना बात के मुस्कराने की कोशिश करता हूँ .......".शादी क्यों होती है????"



इसी समय उस छोटे से परिवार का स्टैंड आ गया और वे उतर गए (मैंने सोचा जान छूती)। वो बच्ची अभी भी घूरते हुए जा रही थी .........जैसे कह रही हो आपको छोड़ने वाली नहीं हूँ। मैं इस देश का भविष्य हूँ, और ये आपका कर्तव्य है की आप जवाब दें ........... मैं उसकी तरफ देखकर मुस्करा दिया ........और अपने ऑफिस की तरफ बढ़ चला........
उसका वो प्रश्न पूछता चेहरा अब भी मेरे सामने था। मैं भूलना चाहता था लेकिन जैसे वो पूछती ही जा रही थी .......मैंने खुद से कहा की दुनिया का ठेका ले रखा है ,,मैं ही क्यों सोचूं.....

वास्तव में जब आदमी को अपनी लघुता का एहसास होता है तो या तो वो विनम्र हो जाता है या फिर अपनी गलतियों को छुपाने केलिए आक्रामक हो जाता है और सामने वाले पर दोस देने लगता है...जब भी आप किसी को दोष दे तो ये जरूर सोचे की कहीं मैं अपनी कमजोरी तो नही छिपा रहा हूँ ...मेरे चिल्लाने में मेरी हार छुपी है...........
ये ख्याल आते ही मैंने खुद से कहा की कोई बात नहीं मुझे कुछ समय चाहिए ताकि मैं और सोच सकूँ......(इस प्रकार मैं उस समय बच निकलना चाहता था) ....लेकिन फिर एक प्रश्न कितना समय??...........सदियों से तुम पुरषों ने बार -बार हमें मुर्ख बनाया है और आज फिर..........
इतने में ऑफिस आ गया मैं ऑफिस में सबको नमस्ते करते, हाथ मिलते हुए अंदर चला गया..(सोचा बकवास बंद काम शुरू) .............

अपने काम में मैं भूलने का प्रयास करता हूँ, की कोई प्रश्न था "शादी क्यों होती है?" लेकिन क्या भूलने से इसका कोई समाधान मिल पायेगा। क्या आप मेरी मदद करेंगे............................................
हम सब की ये जिम्मेदारी है की हम एक जिम्मेदार अनुगामी और जवाबदेह पथप्रदर्शक बने......आने वाली पीढ़िय ये जरूर पूछेंगी ...............और हमें जवाब देना होगा.................
मैंने कुछ सोचा है......
शादी एक ऐसा माध्यम है जो हमें नयी जिम्मेदारियों के साथ जीने योग्य बनता है......परिवर्तन के माध्यम से हम जीवन में खुश रह सकते हैं...और आनंद की प्राप्ति कर सकतें हैं.....(जब हमारी क्षमता बढती है तो जिम्मेदारी भी उसी अनुपात में बढ़नी चाहिए और उसे पूरा करने के लिए आपको आपके जैसा सहयोगी मिल जाता है........जो सब जनता है..बिलकुल आपकी तरह॥) और इस प्रकार समाज की सरंचना में ,उसकी गतिशीलता में आप सहयोग देते हैं. .......

बुद्ध ने कहा " प्रिय से बिछड़ना और अप्रिय से मिलना दुःख का कारन है" किन्तु कोई वस्तु कभी प्रिय या अप्रिय नहीं होती बल्कि एक ही वस्तु/स्थिति यदि लगातार रहे तो वो सुख से दुःख में और दुःख से सुख में बदल जाती है...दुःख से सुख में (दर्द का हद से गुजरना है ,,उसका दवा हो जाना)......
ये सर्वविदित है की स्त्रियाँ ,पुरुषों से जयादा संवेदनशील होती है (जल्दी दुखी-सुखी दोनों हो जाती है)...इसलिए उनका स्थान -परिवर्तन उनकी ख़ुशी को ध्यान में रखकर अवश्यक होता है..वो बहुत तेजी से नयी स्थिति में संतुलन बना लेती है..दोनों जगह सम्हाल लेती है......

पुरुष के जीवन में भी परिवर्तन होता है लेकिन उनका कम संवेदनशील होना उन्हें इस विरह वेदना से बचा लेता है,,(ये कहना सही नहीं होगा) उनके विरह का रूप दूसरा होता है ...रोजी- रोटी के जुगाड़ में दुनिया घुमानी पड़ती है। अपने प्रिय जानो से विछोह होता है। दोनों के साथ संतुलन बनाना पड़ता है, एक तरफ माता -पिता ,एक तरफ पत्नी..(दोनों के सपनो और उम्मीदों की डोर उससे जुडी होती है ... और वो बेचारा कुछ कह भी नहीं सकता "मर्द होके रोता है। और उस पे ये आरोप भी की पत्नी की ज्यादा सुनता है ,या फिर जल्लाद है पत्नी की सुनता ही नहीं) नारी समाज को लगता है की पुरुष वर्ग बहुत खुश है उसे कोई तकलीफ नहीं है ( लेकिन दूर के ढोल सुहावन )।

रुकिए -रुकिए इससे पहले की आप अपने तर्कों से इस कमजोर पक्ष को धरासायी करे मेरी एक कहानी सुनिए जिसे मैंने कहीं पढ़ा था....

"नदी का बहाव बहुत तेज था , उसमे दो तिनके बहते जा रहे थे। एक तिनका उसमे बहते हुए सोच रह था की मैं इस नदी को सागर से मिला के ही रहूँगा और नाचता जा रहा था,मस्ती में.......जबकि दूसरा उसके बहाव को रोकने की कोशिश कर रहा था। उसने नदी की दिशा बदलने की सोची थी। और इस प्रयास में वो दर्द के मारे टूटने की कगार पे पहुँच गया.........यह वाकया एक चिड़िया ऊपर से देख रही थी उसने सोचा की दोनों मूर्खों के अस्तित्व का इस नदी पे कुछ भी असर नहीं पद रह है। किन्तु एक ने अपनी सोच से आने जीवन में ख़ुशी प्राप्त कर ली और दूसरे ने अपनी जिंदगी दुखों से भर ली..."

मैं तो बस उस तिनके की तरह ख़ुशी खोजने और फ़ैलाने की कोशिश कर रहा हूँ।

रही बात उस प्रश्न की तो कुछ प्रश्न ऐसे होते हैं की जिनका जवाब केवल मौन होता है। जितना इनका जवाब सोचों उतना उलझते जायेंगे। मौन ही इनका सर्वोतम जवाब हो सकता है...आप भावना के जिस इस्तर पे हो जो दिल कहे उसे करो .(दिल कहे से मतलब ये नहीं की मनमाना व्यवहार। ये तो बस गहराई से महसूस भावना है। गाँधी के शब्दों में अंतरात्मा की आवाज)।

ऐसा लग रहा है की मैं भी उसी तरह से सोचने लगा हूँ। अब आप ही बताइए की कैसे इस प्रश्न का उत्तर दिया जाये। शादी क्यों होत्ती है? उन प्रश्न पूछती आनासुओं से भरी आँखों का जवाब क्या हो? शादी क्यों होती है???

Thursday, February 25, 2010

एक बात ये भी .................

खुश होना और खुश दिखना दो अलग स्थिति है.............
खुश होने में वक्ती शांत और मस्त हो जाता है...............खुश दिखने में तनाव होता है.....
खुश होने पर ये चिंता नहीं होती की सामने वाला क्या सोच रहा है ............खुश दिखने के लिए हमेशा सामने वाले के रुख को देखकर चलना होता है ..........................
खैर ये तो रही एक बात .......................
अब मैं आपके लिए एक प्रश्न लाया हूँ ..............................
जो हमेशा मुझे सोचने पर मजबूर करते हैं.........................और तकलीफ देते हैं,,...
तो आईये चलते हैं.......................
दो सहोदर अर्थात भाई,(बहन), दयाद क्यों हो जाते हैं..........दयाद का मतलब गोतिया (या फिर ईर्ष्यालु ).........
अंग्रेजी में इसे (इर्शालू) सिबलिंग कहतें हैं.........................
अच्छा आप सोच रहे होंगे की भाई तो समझ में आता है किन्तु बहन कैसे..................
तो वो ऐसे की बहन केवल शरीर से यदि आप समझ रहें हैं तो आप गलती पर हैं.................
वास्तव में बहन को उतनी छूट समाज ने कभी दी ही नहीं की वो अपने आपको प्रतिस्पर्धी समझ सके॥ ...............और जब स्पर्धा ही नहीं तो फिर इर्ष्या कैसी....
मेरे कहने का तात्पर्य यह नहीं है की भाई -बहन में प्रेम नहीं हो सकता और वो केवल मजबूरी है ,,,,,,,,,,,एक की दीनता है और एक का गुरुर.........................
खैर दोनों सहोदरों का लालन पालन एक ही प्रकार से होता है ,,,किन्तु समय के हिसाब से (माता-पिता कि स्थिति) दोनों में किसी की मांगे पूरी हो पाती हैं और किसी कि नहीं ..............जिसकी पूरी होती हैं वो कुछ समझ नहीं पता और जिसकी पूरी नहीं होती वो काफी कुछ समझ जाता है...............
या फिर इसका उल्टा भी उतना ही सही है............(.एक दूसरे पे मिथ्या आरोप तय किये जाते हैं... मसलन तुम्हे मम्मी पापा नहीं मानते ,,या फिर मुझे नहीं मानते तुम्हे तो खूब मानते हैं।)....
दोनों एक दूसरें के साथ समय नहीं बिता पातें ,,कभी खुलकर बात नहीं कर पातें या फिर इस दुनिया में जिन्दा रहने कि प्रतिस्पर्धा उन्हें इतना समय नहीं दे पाती की वो एक दूसरे की भावनाओ और अवास्क्ताओं को समझ सकें ................एक दूसरे से परिचित हो सकें ...............................बिना परिचय के प्रेम नहीं हो सकता ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,(,बिना प्रेम के त्याग नहीं )...........और बिना त्याग के समबन्ध नहीं चल पातें .............और वे स्वार्थ सीधी जैसे निकृष्ट कार्य में लग जाते हैं...और वो उन्हें सही प्रतीत होता है...............अरे मेरा परिवार ,मेरी बीवी, मेरे बच्चे ...और उलझकर रह जाते हैं
ये भूलकर की कल वे किसी परिवार के बच्चे थे ,,,और आज किसी परिवार के पालक ....और कल किसी परिवार के फालतू सामान ।
हमारा विकास होता है............हम आगे बढ़ते हैं इसका मतलब ये नहीं की अपने अतीत को छोड़कर ,,,,,,,,,,,,,,, बंटवारा जरुरी हो सकता है ताकि भिन्न-भिन्न प्रश्ठितियों में सही निर्णय के माध्यम से ख़ुशी को अधिकतम किया जा सके.......
पर बंटवारा के बाद ये एक दूसरे के जड़े काटने की सोच कैसे सकते हैं..????????????????....................
मुझे लगता है की कुछ छूट रहा है ........कहीं न कहीं तो कुछ गड़बड़ है ..............
एक बार मैंने अपने मित्र से पुछा की इस दुनिया में विभिन्न तरंगे हमें प्रभावित कर रही हैं या फिर करना चाहती हैं ,,,,,,,,,,,,,यदि हम चट्टान की तरह अड़ जाएँ तो हो सकता है कुछ हमें छू के चली जाएँ और कुछ बिगाड़ न पायें ,,,,,,,,,,,,,लेकिन यदि मजबूत तरंग आ गयी तो हमारा टूटना तय है ...................मैं निर्णय नहीं कर पा रहा हूँ ,,,,,क्या करू?
तो उसने कहा की इतना सोचने की क्या जरूरत है ? केवल तरंगो के साथ खुद को हिलाते रहो वे आयेंगी और यूँ ही चली जाएँगी कुछ नहीं बिगाड़ पाएंगी .............
मैंने कहा की लेकिन इससे हम तो अनिश्य मन वाले दिखाई देंगे .....लोग का कहेंगे ..................
उसने हँसते हुए कहा की "दुनिया का सबसे बड़ा रोग ..... क्या कहेंगे लोग".......................
और ......कहा की हम समस्या का समाधान खोज रहें और तुम बिना मतलब के बात सोच रहे हो.............. । ये बताओ की जब तुम जानते हो की तुम सही हो ,,,,तुम्हारा खुद पर नियंत्रण है तो फिर तो जीवन रूपी शतरंज पे ये तुम्हारी एक चाल के सिवा और कुछ नहीं ..................................
तो मस्ती के साथ जियो और जितना अच्छा हो सके उतना करो ..........ज्यादा सोचना अच्छा नहीं प्यारे............
तुम यदि अच्छा सोचते हो तो इसमें केवल तुम्हारा योगदान नहीं ,,,,,,,,,,,यदि अच्छा करते हो तो इसमें भी तुम्हारा कोई कारनामा नहीं ...........ये तो तुम्हारे संस्कार और संगत का असर है...
उस देश में तुमने जन्म लिया है जो राम, कृष्ण, बुद्ध, गाँधी , दधिची, कर्ण, विदेह, .......आदि जैसे महान हस्तियों ने जन्म लिया है और इसी की मिटटी में घुल गए ...और फिर इसी मिटटी से तुम्हारे शारीर का निर्माण हुआ तो ..................समझ गए अपने अस्तित्व की कहानी .........इसलिए दुनिया में जिस कम के लिए भेजे गए हो उसे पूरा करने का प्रयास करो,.......और खुश रहो नाटक मत करो .......................जिंदादिल बनो,,,,मस्तियाँ करों ............शेष फिर कभी...............

Saturday, February 20, 2010

मोहब्बत कहते जिसे हैं.........

यूँ तो प्यार इतनी ऊँची भावना है की इसके बारे में बहुत कुछ कहा जा सकता है, लिखा जा सकता है, और ऐसा किया भी गया है।,
मैंने अब तक के समय में जो देखा है , महसूस किया है , समझा है उसे जरूर बताना चाहूँगा.....
हुआ यूं की मेरे एक परिचित ने मुझसे पुछा की आप किसी से प्यार करते हो? मैंने कहा हाँ... !! ये सुनकर चहकते हुए पूछे की कौन है, वो लड़की.....? मैं चौक गया !! , मेरा इरादा उनसे बहस करने का नहीं था सो मैं चुप होना चाहता था , लेकिन मेरी ख़ामोशी को उन्होंने मेरा शरमाना समझ लिया.....और कोहनी से धक्का देते हुए फिर वही दोहराया..... अब मेरी बारी थी , मैंने उनको समझाने का असफल प्रयास करते हुए कहा की "प्यार कोई जरुरी नहीं की लड़की से ही किया जाये ... इससे पहले की मैं अपनी बात पूरी करूँ उन्होंने नहले पे दहला फेंकते हुए कहा की ठीक है मम्मी पापा, अपने परिवार , मित्र से सभी प्यार करते हैं......मैं तो वो वाला प्यार पूछ रहा हूँ.....
तब पहली बार लगा की प्यार भी कई प्रकार का होता है वो वाला , इ वाला , ........
लेकिन मेरा तार्किक दिमाग ये मानने को तैयार न था ,,, मैंने तो इतना ही जाना है की "प्यार तो बस प्यार होता है."..उसमे किसी को दुनिया की तमाम ख़ुशी देने की इच्छा होती है, ऐसा लगता है की बस .......वो खुश रहे , ,उसकी हर ख्वाविश पूरी हो ,,, हे खुदा तू उसे इतनी ख़ुशी दे की दुनिया के सारे ग़म उससे दूर चले जाएँ ,, वो हरदम हँसता रहे ,,उसका हमेशा ध्यान लगा रहता है...... आदमी जिम्मेदार हो जाता है , ख्याल रखने वाला बन जाता है । यही तो खासियत होती है प्यार की आप को सब कुछ अच्छा लगने लगता है। आप सबके साथ अच्छा व्यव्हार करने लगते हो ...."। जब इतनी मोहब्बत हो तो नफरत के लिए जगह ही नहीं बचती "...
लेकिन अभी उनके तर्क तो बाकि ही थे ..... तब मैंने अपने को समझाया की वो बेचारे प्यार तो सुने हैं किन्तु शायद उसका मतलब आत्मसात नहीं कर पाए ,और इसीलिए तर्कों में उलझे हैं ,,, वर्ना प्यार में तर्कों की कोई जगह नहीं होती ....प्यार करने वाला तो कभी अपने दुःख से दुखी ही नहीं होता उसे तो चिंता अपने प्रिय की होती है ॥
अगर उसके आँखों से आंसू भी निकले तो अपने प्यार के लिए , कोई दुआ भी मांगी तो अपने प्यार के लिए.....
खैर वो ये सब नहीं समझ सकते,........
इन सब को समझने के लिए वक्ती का प्यार में होना जरुरी होता है...........मेरा ये दावा नहीं है की मैं प्यार को समझ सकता हूँ ....या समझ गया हूँ....किन्तु...
अब आप ही बताइए की माँ का प्यार जिसमे कोई मिलावट नहीं होती ,,,उसको प्यार नहीं कह सकते क्यों?? पहले के समय में लड़कियों को ये आशीर्वाद दिया जाता था की तेरे दस पुत्र हों , ओर दसवां पुत्र तेरा पति हो....
चौंकिय मत... ये इसलिए था की प्रेम की पराकाष्ठ माँ का प्यार ही है जो निश्छल होता है.....और तुम वहां तक पहुँचो....
रही बात ये वाली , वो वाली तो उनको मैंने इतना ही कहा की ... प्यार एक नदी की तरह है किनारे पर थोडा गहरा और बिच में अधिक ....इससे आप किनारे को नदी मानने से इंकार तो नहीं कर सकते ...
उसी तरह से प्रेम हर संबंधो में होता है ,,,, या यूँ कहे की प्रेम ही संबंधो को आधार होता है ,,,,अलग- अलग संबंधों की अलग मर्यादाएं , अपेक्षाएं होती हैं .... और यही उसे भिन्न बनता है... लेकिन प्रेम अलग नहीं होता ये तो बस गहराई की बात है....
इस प्रकार उन्हें संतुष्ट करने का प्रयास किया .......
किन्तु उनका प्रशन ये था की लोग फिर प्यार में दुखी क्यों दिखाई देते हैं.....
इसका जवाब मैंने दिया की वे मोह को प्यार समझते हैं...... मोह , बंधन होता है जबकि प्यार मुक्त करता है.....
जैसे पिंजरे में चिड़िया को बंद करना मोह है जो उसे तकलीफ देता है, खुले आकाश में चिड़िया को उड़ते देखना प्यार है ....इसलिए प्यार करने वाला दुखी नहीं होता क्योंकि उसे अपने प्रिय से ये अपेक्षा नहीं होती की वो भी बदले में उससे प्यार करे ..... प्यार तो बस प्यार है वो व्यापर नहीं है ......की लाभ -हानि सोचा जाये॥
पति- पत्नी (प्रेमी या प्रेमिका) का सम्बन्ध हो सकता है की कोई बंधन न माने और इसीलिए पत्नी का किसी के तरफ देखना गवारा नहीं होता , " तुम हमें चाहो न चाहो कोई बात नहीं तुम किसी और को चाहो तो मुस्किल होगी "..............
शायद ये बात उनकी समझ में आ गयी.............. और भी बहुत से प्रश्न थे जिनका जिक्र फिर कभी......................

Monday, February 15, 2010

बहन के विदाई के वक्त .........

विदाई , एक विरह का संकेत ....
जुदाई का प्रतिक ...... यह कैसा होता है ...इसका अनुभव मुझे पिछले दिनों हुआ ....
इससे पहेले मुझे लगता था कि मैं विशेष हूँ, मुझे इससे क्या फर्क पड़ता है। मेरी भावनाएं मर चुकी हैं॥ अध्यात्म के रस्ते में,ज्ञान के रास्ते में आंसुओं का कोई मोल नहीं होता। मेरे पापा अक्सर उदहारण देते कि राजा जनक अपनी बेटी कि विदाई पर रोते हैं॥ जिनके जैसा ज्ञानी उनके समय कोई नहीं था॥
प्यार में अक्सर क्यों होता है कि मिलन के साथ ही जुदाई जुड़ा होता है .... हम चाह कर भी कुछ नहीं कर सकते
खैर , जो होता है अच्छे के लिए होता है.... मुझे मेरे अंदर कुछ खालीपन का एहसास होने लगा था, शेष दीदी के उस उदास चेहरे ने पूरी कर दी॥ मुझे अक्सर यह भय रहता था कि कहीं मेरे कारन पिता जी दीदी कि पढाई या फिर उनकी किसी आवस्यकता को मेरे आवस्यकता को पूरा करने के लिए छोड़ न दे। लेकिन साथ यह डर भी होता था कि वे जितना प्रयास कर रहे हैं मैं कहीं क्रांति का बिगुल बजा के उनके लिए समस्या न खड़ीकर दूं... जिससे कई बार मैं दीदी के विरोध में भी नजर आया॥ लेकिन आज मैं सर झुकाकरये कहना चाहता हूँ कि दीदी मैं आपके किसी बात को कभी टाल ही नहीं सकता आपको जब भी मेरी जरुरत होगी मैं वहां होऊंगा.... दीदी हो सकता है आज इसका कोई मोल नहीं हो , पर मैंने इसके लिए प्रयास ,और इसका एह्स्सास लखनऊ ट्रिप पर कर लिए था ......और तब से मैं अपनी गलती सुधरने के कोशिश कर रहा हूँ...
दीदी कि विदाई के समय दीदी का चेहरा देखकर वो आंसुओं का खुद बह जाना , तब पता चला कि मैं इतना भावुक हूँ ॥ इस बार घर से आते समय माँ का चेहरा भी बहुत दुखदायी था , साथही पिता जी का खुश दिखने का असफल प्रयास आँखों में आंसुओं को लाने के लिए पर्याप्त था॥
दुनिया में सबसे निरिह जीव कोई है तो वो स्त्री शारीर ही दिखाई पड़ता है॥ मुझे ये दुःख के साथ कहना पद रहा है॥ मैं सच्छी नहीं जनता लेकिन जो कुछ जीवन में देखा है उसी अधर पैर मैं यह कह रहा हूँ॥
मैं आप सबसे ये निवेदन करना चाहूँगा कि हम सबको ये प्रयास करना होगा कि हम खुशियाँ बत्तें और कमसे कम एक वक्ती के जीवन को खुशियों से भर दें॥
अरे यार शादी के बाद हम परिवार के लोग यदि एक -एक काम छोड़ दे तो उस लड़की पर काम का बोझ कई गुना बढ़ जाता है... हमें मानना होगा कि वो भी इंसान है...खैर ये मैं इसलिए नहीं कह रहा हूँ कि मेरी बहन कि शादी हो गई बल्कि इसलिए कि नारी मात्र के लिए उसके अधिकारों के लिए ..यह नितांत जरुरी है साथ ही अपनी ख़ुशी के liye भी . चलिए फिर लिखूंगा जब कोई भाव मन में उठेगा .....धन्यवाद....