Friday, January 29, 2010

मेरी माँ

माँ होती ही ऐसी है, कि जब पास हो तो कदर नहीं होती और जब न हो तो उसकी कीमत पता चलती है।
सभी की तरह मेरी भी माँ है। उसके पास जब मैं था तो मुझे उसके होने का एहसास नहीं था ,पर जब मैं आगे की पढाई करने अल्लाहाबाद चला आया तो धीरे धीरे उनकी कमी खलने लगी। ये तो बाद में जाकर पता लगा कि माँ के पास न होने का मतलब क्या होता है? जब आपको इस दुनिया में अकेले ही लड़ना होता है, आपके खाने -सोने का कोई ध्यान रखने वाला नहीं होता। आप दुनिया में अकेले अलग पड़े रहते हैं। आपके खुश होने से किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता , और न ही दुखी होने से ,,,,
अगर आपके पास ख़ुशी है तो लोग आपको घेर लेते हैं और अगर आपके पास गम है तो कोई बांटने नहीं आता आपको खुश रहना पड़ेगा जिसका उधाहरण हम जबर्दस्ती के ग्लामौर शोज में देखते है.......
सच्ची ख़ुशी के लिए तो फिर हमें अपने जड़ अर्थात माँ के पास जाना होगा
जहाँ न ही प्रशन है , न कारन,,,केवल प्यार है , केवल प्यार
बस तेरा मुस्कराना उनके जीने की वह्जः है. तेरा खिल्किलाना उनके खुश होने का जरिया है..
ऐसे समय जब कोई बच्चा जब आत्महत्या जैसा काम करता है तो ,,,,,,,,,,,,ये खबर मेरी रूह तक kapa देती है,,,,,केवल अपनी माँ का चेहरा याद आता है और फिर लगता है की मैं क्या करू की फिर किसी माँ की ऐसी दशा न हो.....
मैं इतनी थोड़ी सी मति के साथ माँ को कैसे प्रगट कर सकता हूँ ,,,,,,,,,,,,बस यही है की आंखे बंद करो तो माँ नजर एगी...थोडा सा समय निकालो और कोशिश करो की उसकी बात सुन ले...वो कुछ नहीं चाहती बस हमें कुश देखना .............तो चलो उसे खुश करते है..और ग़मों में भी मुस्कराना सीखते हैं..........................

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