Sunday, September 12, 2010

ऐ ! खुदा...

ऐ ! खुदा...
बड़े मायूस हैं वो आज, उनकी मासूमियत कहाँ गयी..
सिखाई थी जो तुमने वो, नसीहत कहाँ गयी...
बड़े बेफिक्र थे वो जब, कारवां चले..
ढलते सूरज के साथ वो, बेफिक्री कहाँ गयी...

ऐ खुदा ! उनको ऐसी शोहबत अता  कर.
जिससे कहे ना,वो तेरी इनायत नहीं रही..
देख के उनको आज, खुद से पूछता हूँ मैं...
जिसकी ख्वाहिस में ये कारवां चले ..
आज उनको ही पाने की क्यों कोशिस नहीं रही..\

क्यों ? थक हर के बैठे हैं , कुछ आज इस कदर..
की मंजिले दीदार की चाहत नहीं रही..
क्यों ? शक है आज उनको अपने इमां पे ..
क्यों याकि नहीं आज, तेरे कलाम पे..
ऐ खुदा सुन ले उनकी वो खामोश  अनकही ...
जिसको कहने की अब, उनमे हिम्मत नहीं रही..

तुम जो जिन्दा हो तो जीने का हुनर सीखो...
ऐसी वैसी हर बात की खबर रखो...
ना फंसो इन  दुनियादारी की बातों में ...
तुम इनको भी बदलने का जिगर रखो....

इतना कहूँगा आज उस परवर दिगार से...
हर बला से बचा के रखे वो मेरे यार को..

(छोटी बहन ने लिखा, उसकी पहली रचना...,,,नित्या दुबे ,biotech IIIrd year student)

Tuesday, August 10, 2010

माफ़ करना..

साथियों ये लेख मैं अपने भविष्य में होने वाली गलतियों के लिए लिख रहा हूँ......

जब मैं आपके प्यार को आपकी खुशामद का नाम  दे  दूँ..
जब मैं आपके दिए  सम्मान को डर का नाम दे दूँ..
जब खुद की तारीफ करने में मैं आपकी निंदा करने से भी न चुकून
जब कभी मैं इतना बोल जाऊं   के आपको रुलाने में भी न संकोच करूँ,,
और फिर  आपके आंसुओं  को भी नाटक कह दूँ...
और उपहास करता हुआ  चल पडूं ,अपने ही ख्यालों में..

कभी  जाग जाये मेरा अहंकार , और  कर दूँ आप पे वार..
जब मैं आपको स्वार्थी कह दूँ..जब की मैं डूबा रहूँ खुद अपने आप में..
जब मैं छोटी छोटी बातों में खीज के आपको दुत्कार दूँ
जब मैं किसी की आँखों की गहराई में इतना डूब जाओं की
आपके होने का अभाश भी न हो मुझे,,,
जब मेरी परेशानी इतनी बड़ी हो जाये की,
आपकी बात सुनने का वक़्त न निकाल सकूँ
और फिर आप पे ही  इसका भी   इलजाम दे दूँ

जब मेरा दिल टूटे , भ्रम न रहे कोई.
जब  सभी लगे  अपने  बेगाने ..जब मैं होके उदास बैठूं..
जब दुनिया में कोई मेरा साथ न दे..जब सबसे अकेला हो जाऊ..
जब खुद से इतना उब जाऊ की जीने की इक्षा न रहे..
जब दुनिया वाले मुझे निकृष्ट लगने लगे..
जब मैं दिल खोल के सबको कोसने लगूं.
.
तब मेरी बात का बुरा न मानना
.
मुझे माफ़ कर देना...क्योंकि जब भी मैं हारा हुआ महसूस करता था,
तब तुम्ही अपने हाथों से मेरे सर को सहलाते थे..  मुझे दिलासा देते थे..
मेरी आँखों के आगे से पट्टी हटाते थे ..और दुनिया में विश्वास दिलाते थे..

मुझे माफ़ करना , मैंने  अपनों  के आँखों में आंसू भर दिया...उन्हें इतनी चोट पहुचाई , जिन्होंने मेरे लिए इतने दर्द सहे..जिन्होंने मेरे लिए वो सब कुछ किया....जिसके लायक मैं नहीं था... 
मुझे माफ़ करना , जब मैं अपनी सहज प्रवत्ति के कारण इतना बड़ा  पाप कर बैठू..
तब मुझे अपना लेना...मुझे माफ़ कर देना...क्योंकि तुम्हारे सिने से लग के मैं सुकून महसूस करता हूँ.
मुझे बिखरने से बचा लेना..मेरे दोस्त , मेरे भाई मैंने तुझे बहुत तकलीफ दी फिर भी मुझे बचा ले..
मुझे मेरे बचा ले ...मुझे इस पश्चाताप की आग से मुक्ति दे दे मुझे माफ़ कर दे ...मेरे प्यारे..मुझे माफ़ कर दे.. 

जब मुझे भी ऐसी  मोहब्बत हो जाये,,,तो मुझे माफ़ कर देना.

क्योंकि आज मेरा दिमाग ठीक है..पता नहीं कल जब कथित रूप से मुझे प्यार हो
और मैं आपको रुला के भी, खुद को सही कहूँ
तो मुझे माफ़ करना ,

आज की पीढ़ी ऐसे ही करती है...लेकिन मैं बुजुर्ग (बड़े) लोगों से विनती करता हूँ...की वे अपने प्यारों को प्यार करने दे...और छोड़ दे जिंदगी में कुछ सिखने को...जब वे लौटे तो उनका स्वागत करें...उन्हें विस्वास दिलाएं की वे उनके अपने हैं ....
क्योंकि प्यार वही होता है, जो लौट के आ जाये..
(रही बात प्रेमी युगल या ऐसी परिस्थिति में रहने वाले तो एक बार वे खुद का निरिक्षण जरुर करे...बाकि सारे जवाब तो उनका दिल दे देगा.....
और अगर मैंने कुछ गलत लिखा तो मुझे माफ़ करना...क्योंकि मेरा उद्देश्य पवित्र है..साधन कैसा है ये आप स्वयं तय करें..)..

Monday, August 2, 2010

.. बस यूँ ही...

कभी कभी यूँ ही बैठे हुए कुछ भाव मन में उभरते हैं , जिन्हें कलमबंध करने की एक छोटी सी कोशिश है.......


होती है हर रोज जंग अपने आप से ही ..
खामोश चींखो से जिसका फैसला होता है.....
जब हंसी बह जाती है, इन आँखों से..
तो फिर एक बार जीने का हौसला होता है...

घबडा जाते हैं जब वो अपने ही दिल कि तन्हाई से ....
लगा देते हैं कोई इल्जाम बड़ी ही बेवफाई से...
पूछने लगते हैं कुछ बेतुके से सवाल...
सही बात छुपा लेते हैं बड़ी सफाई से....

कभी पास तो कभी दूर नजर आते हैं
अपनी हरकतों से मगरूर नजर आते हैं..
पिसते रहते हैं वो भावनाओं कि चक्की में
हमें तो वो बड़े मजबूर नजर आते हैं...

चाहोगे  जिसे वो मगरूर हो जायेगा . .
बस ऐसे ही वो हमसे दूर हो जायेगा ..
महसूस होगी  जब उसे, तासीर-इ-मोहब्बत...
वापस आने पे खुद ही मजबूर हो जायेगा.....

जब से उन्होंने कह दिया , मेरे काबिल नहीं हो तुम..
फिर रूबरू होने कि उनसे हमने खता न की..
वो पछताएँ खुद अपने ही गलती पे...
ऐसी हरकत हमने फिर, दुबारा कभी न की.. ..

Sunday, July 18, 2010

कर्तव्य हम निभाएंगे......

हमारी जंग उनसे है, जिन्हें हम प्यार करते हैं.
चाहते वो भी हमको हैं, पर वार हर बार करते हैं.
न जाने कौन सी शोहबत  में हैं, वो आजकल.
ऐसी हरकते जो बिना सोचे,  बार बार करते हैं..

सुना है उनको मिल गया है, प्यारा सा कोई रहगुजर..
उसके साथ ने उनको दीवाना बना दिया होगा, .
हमें मालूम  है मोहब्बत का जूनून....
यही सोचके उन्हें  माफ़  बार बार करते हैं....

हमारी ख़ामोशी को वो नादानी समझ बैठे हैं...
उन्हें अब क्या बताएं, हम सब समझ के बैठे हैं....
किसी दिन खुल गया जो मुंह, तो कयामत ही आयेगी...
खुदा कसम, उनके पांव तले से जमीं ही खिसक जाएगी.....

लड़ेंगे हम ये जंग भी, उतनी ही सिद्दत से...
कभी चाहा था उनको हमने, जितनी सिद्दत से...

अब लड़ेंगे उनसे हम, उनको भुला  के....
देंगे ये भी  इम्तहान,  हम खुद को भुलाके..

हमें तो अपनी नादानी ही प्यारी है..
ये दुनिया कि तरह रंग तो न बदलती...
शीशे के आगे जब भी होता हूँ हाजिर....
ये खुद से नजरे तो न चुराती है ....

हमें नाज है अपनी मोहब्बत पे..
समझ न सके वो , तो इस  दिल का क्या कसूर....

हम लड़ेंगे उनसे उनके हर वार  का जवाब भी देंगे...
कुछ इस तरह से उनके प्यार का जवाब भी देंगे..

मलहम कि जरुरत जो होगी कभी उनको..
उनके हबीब से पहले हमारा हाथ होगा उनके जख्मो पे...
कुछ इस तरह से मुहब्बत का क़र्ज़ हम चुकायेंगे...
अपना फर्ज  निभाएंगे, फिर गीत वही  गुनगुनायेंगे....

कुछ इस तरह से अपनी बदकिस्मती पे आंसू बहायेंगे...
कि दुनिया  वाले भी , खुद को रोने से नहीं रोक पाएंगे.......

कर्तव्य  हम निभाएंगे......कर्तव्य हम निभाएंगे........

Saturday, July 3, 2010

एक छोटी सी प्रेम कहानी......

उनके वादों कि पहले सी अहमियत नहीं रही.
उनमे वो पहले सी मासूमियत नहीं रही.
ज़माने ने उनको भी बदलना सिखा दिया ,
उनको अब हमारी जरुरत नहीं रही..
लेकिन कैसे उनसे नफरत करले हम , हमें तो ये सिखाया ही नहीं कभी.......
आप हमें जो भी समझो लेकिन ये दिल फिर भी आपको खुश देखना चाहता है.............
हमने जब इसे समझाया तो बोल उठा.............
हम उनकी मोहब्बत में खुद को भुला देंगे,
खुद पागल बनकर के उनको सजा देंगे.
वो पास में हो कर के हमें बद्दुआ दे दें.
हम दूर भी जा कर के उनको दुआ देंगे......
आज उनसे फिर मुलाकात हो गयी.............
बड़ी मायूस थी वो, उनकी वो मासूमियत कहाँ गयी...
सिखाई थी जो हमें, वो नसीहत कहाँ गयी......
बड़े बेफिक्र थे वो, जब कारवां चले...
ढलते सूरज के साथ वो बेफिक्री कहाँ गयी........
लेकिन अब शायद वो सच को जानने और मानने लगे हैं..........
दुनिया के सच ने उन्हें ,रास्ता दिखा दिया...
भटके हुए पथिक को, मंजिल का पता दिया...
हैं आज भी वो अर्श पे ,पर धरती पे हैं कदम..
दुनिया ने उन्हें  दुनिया में, जीना सिखा दिया.......

ये पंक्तिया एक छोटी सी प्रेम कहानी जो पता नहीं प्रेम थी या महज आकर्षण.......लेकिन जो भी हो  आज दोनों को सत्य का ज्ञान है.और वे यथार्थ को अच्छे से समझते हैं ...........न तो वो देवदास कि तरह अपनी  जिंदगी बर्बाद करते हैं और न ही मजनू कि तरह भटकते हैं.........
बल्कि अपने प्यार पे गर्व करते हुए, एक दुसरे से शर्माए बिना एक अच्छे दोस्त कि तरह रहते हैं........क्योंकि दोनों ने एक दुसरे को इन्सान बना दिया,,,है...,,,,,,,,,
कुदरत का कहर था दिल टूटना मेरा  ,
 या दुनिया कि जरुरत थी दिल टूटना मेरा...
जो भी हुआ चलो अच्छा ही हुआ ..
एक पल को  हमें ये एहसास तो हुआ.....
संवेदना अभी भी जिन्दा है यहाँ .......सदियों के सवालों से जूझते हुए.....

उनका जीवन मानवता कि अमूल्य निधि बन गया.......और वे मानवता के प्रतिनिधि .......सो प्रेम कि हर बूंद का आनंद लीजिये और सीपी में मोती का निर्माण कीजिये............धैर्य और शुचिता के साथ............

Thursday, June 3, 2010

"पापा को गुस्सा क्यों आता है "

कल शाम को ऑफिस से लौटते समय अचानक लगा की ....................
               थका हुआ शरीर खुद को बोझ महसूस हो रहा था............ऐसा लगा की जैसे खुद को ढो के ले जा रहे हों.........न तो हंसने का मन हो रहा था न ही बकवास करने का.............
                       लेकिन अपनी चिर परिचित आदत से मैं बच तो नहीं सकता न ,,,,,,,,,,,,सो अपनी समस्या को दूसरों की समस्या समझके उनको महसूस करने लगा और उनकी प्रतिक्रिया सोचने लगा............
एक पंक्ति  मन में आई "पापा को गुस्सा क्यों आता है "फिर विचारों का क्रम बंध गया,  अगर उसे कविता कहे तो शायद वो हो भी सकती  है.................
पापा को गुस्सा देखके बचपन में सोचता था, अक्सर मैं.
क्यों होते हैं इतने गुस्सा वो , न खेलना हो न खेले.
 बार बार पढने को कहके चिल्लाते हैं ऐसे क्यों ?
मेरे हर बात पे चिढ जाते हैं  ऐसे क्यों ?
गुस्सा और नफरत का बीज पड़ने लगे मन में जब.
मेरे हर क्यों का जवाब देने को होती  वहीँ पे माँ..
इतनी सहजता थी उसकी बातों में की हर गुस्सा छू हो  जाता था..
हर मतभेद, नफरत के बीज को का समूल नाश हो जाता था .......
उसकी कई बाते तो समझ में न आती थी,,,,
,पर न जाने क्यों  सुनना अच्छा लगता था...
लेकिन हर बार एक प्रण मैं दोहराता था ,,,,,,,कि जब  मैं बड़ा होऊंगा  ,
,बच्चों के साथ खूब खेलूँगा ,सबका ख्याल रखूँगा ,,
,पापा की तरह नहीं, केवल अपने में ही मस्त रहो ,
डांट डांट के  सबका  जीवन त्रस्त करो...........
घर से दूर आज देखता हूँ कि  , कोई समय भी पूछ ले तो झुंझलाहट होती है...
जी करता है फोड़ दू उसका सर.........
दिल्ली की बसों में छोटी सी बातों पे होती है तकरार.............
आज समझ में आता है  पापा को गुस्सा क्यों आता है.......
समाज के अपेक्षाओं को झेलके चलते रहे वो.......दुनिया कि जंग में अडिग, अटल
..फिर भी हम कोसते थे अपने भाग्य को.......ऐसे पापा न मिले कभी किसी को,,,,,,,
,लेकिन अब लगता है कितना चाहते थे वो हमें......
हमें दीखता था केवल अपना दुःख ,,केवल अपनी चिंता............
ये स्वार्थ था या बचपन...........नहीं जानता मैं ............
अब जानता हूँ पापा को गुस्सा क्यों आता था ?

( नोट :-जब तक व्यक्ति दूसरों की समस्याओं को न समझे तब तक वो बच्चा ही होता है.......और मुर्ख रहता है........जिस दिन समझ जाये उसी दिन बड़ा हो जाता है..................और तब वो मासूम होता है...........)

Thursday, May 27, 2010

........सत्य की स्वीकारोक्ति ..

                     जीवन में कभी कभी खुद से आंखे मिला लेने से कोई क्षति नहीं होती..........लेकिन कभी कभी जहाँ आपकी नजर नहीं पहुँच पाए वहां कोई मित्र कोई सम्बन्धी या फिर कोई अपरिचित इश्वर का दूत बनके आपको अपने आप से मिलवा ही देता है...........अब ये कब होगा ये तो विधाता ही जाने...............
                आप सोच रहे होंगे ये व्यक्ति लम्बी लम्बी देने लगा...........इसका प्रवचन शुरू हो गया........लेकिन रुकिए मैं  अपराधबोध से ग्रसित हूँ और  क्षमा याचना करना चाहता हूँ..........(.और इसमें वो सबकुछ लिखूंगा जिससे शायद मैं इस बोझ से दूर हो जाऊं और .................)
             मुझे जब पाता चला की मेरा मित्र मनीष ब्लोग्ग लिखता है तो मैंने उसके सारे ब्लॉग पढ़ डाले........कुछ दिन के अन्दर ही मैं वो सब पढ़ गया.जो उन्होंने लिखे थे .....
               बंधू लिखते तो कॉलेज के समय से ही थे किन्तु उसपर इतनी गंभीरता से कभी सोचा नहीं.गया पर हाँ वो तब भी इतने प्यारे लगते थे.,,,जितने अब हैं लेकिन .......................अब तो वे काफी प्रगति कर चुके हैं और विकास भी ...........सच कहूँ तो व्यक्ति अपनी सीधी साधी सोच के साथ अपने जीवन में कितना ऊँचा स्थान प्राप्त कर लेता है इसे वो स्वयं नहीं जानता (आज जब दुनिया में अधिकांस लोग सफलता को मापने के लिए केवल धन के आधार पे सोचते हैं ,,,जब युवा केवल  किसी नौकरी पाने तक खुद को सिमित कर लेता है वैसे समय संसार में कुछ विशेष लोग ही संवेदना को जीवित रखे हुए हैं और इश्वर ने उन्हें यदि तकलीफ भी दी तो संसार में संवेदना को जीवित रखने के लिए ही ....और मेरे मित्र उन्ही में से एक है ,,,,,और मुझे इसका गर्व भी है )...सोच के स्तर से लेके व्यव्हार तक कुल मिलाके एक अंतर्दृष्टि  विकसित हो गयी है उनकी,,,,, और एक तरीका भी भावों को अभिव्यक्त करने का  .......
                           खैर  कॉलेज में यह केवल  मन बहलाव का साधन मात्र था..........उनकी लिखी कविताओं का पाठ तो मैं कभी कभी प्रतियोगिता  में भी किया करता था............अब प्रतियोगिता का परिणाम क्या होता ये तो नहीं बताऊंगा........क्योंकि वे प्रारम्भिक  दिन थे ............और हम भविष्य के गर्त में छिपे सत्य से बिलकुल अनजान ..........केवल जीवन के प्रसंगों की तुकबंदी करके आनंद लिया करते थे...........
                  पिछले जनवरी में जब मैं दिल्ली आया तब मै इन्टरनेट के संपर्क पूर्ण रूप से  आया और खूब जम के पढ़ा ब्लोग्गों को.................
            और मन में एक सहज इच्छा जगी की क्यों न मैं भी लिखूं..........लेकीन इतनी जल्दी कोई इतनी गंभीरता नहीं ला सकता...........और मुझे शुरुआत करने के लिए कुछ विषय नहीं मिल पा रहा था...जो कुछ आज तक सोचा था उन्हें ही तुकबन्दी करके लिखा ....सबसे बढ़िया करने का अहंकार लिए मैं लिखने लगा......कुछ लेख लिखा और उसपे पाठक जन और मित्रों के सहयोग ने मेरी हिम्मत बढाई लेकिन कुछ लेखों के बाद मैं तुलनातमक रूप से सोचने लगा................मेरे लेख भिन्न तो थे ,,,,,,,,लेकिन मुझे स्वयं वो बहुत अच्छे नहीं लगते थे  (कारण बस एक अहंकार,)..........लेकिन फिर मैंने सोचा की ऐसा होता ही है.........अपने लेख स्वयं को अच्छे नहीं लगते ............मैं उन्हें, लोगों के प्रतिक्रिया के आधार पे सोचने लगा.......(ये अहंकार खुद को तुष्ट करने के लिए खुद ही कारण ढूंढ़ लेता है और ख़ुशी का भ्रम करने लगता है   )........
                     "वास्तव में जब आप जबरन कोई काम करते हैं ,,,,तो उसमे से रचनाताम्कता ख़त्म हो जाति है....और केवल शब्दों का शरीर रह जाता है ,उसके भाव उससे तिरोहित हो जाते हैं................हम जैसे मूढ़ मति केवल लिखने के चक्कर में ये भूल जाते हैं की शब्दों का कोई अर्थ नहीं रह जाता जब तक आप अनुभव युक्त होके, अपने विशिष्ट  नजरिये से घटना का अध्ययन   न कर ले ..........और ..........उसे समझ न सके....
               यही कारण है की हम केवल अपने अहम्तुष्टि  के लिए लिखते चले जाते हैं और साहित्य को कूड़ा बना डालते हैं...............मैं अब तक जिस मनाह्स्तिथि में था उसी में अधिकतर लेखक रह जाते हैं और अपने कर्तव्यों की इतिश्री भावना विहीन लेखों की रचना  करके संतुष्ट हो जाते हैं..................
(आज मनीष के लेख 'पिछले बकवास की व्याख्या' पढके ऐसा लगा जैसे कोई मुझे इस बुरे से बचाने का प्रयास कर रहा है,,,,,,,,,,,,,,,मैं तो भाग्यवान हूँ के मेरे पास मनीष है.........)
           आज तक मैं ये सोचता रहता था की मेरे लेखों में गहराई क्यों नहीं है...अब समझ में आया की ......मैं तर्कों और शब्दों के जाल में उलझ के रह गया था.   .......   लेकिन अब नहीं ...........
            कविता तो बड़े बड़े लेखों का निचोड़ होता है...........और कविता को समझने के लिए एक अंतर्दृष्टि चाहिए जो संसार के रंगमंच पे अनुभव के रसों ( कटु अनुभव )से होके गुजरने के बाद ,,ही आ पाता hai,,,,,,,,जब मन अपेक्षाओं  के बोझ से मुक्त हो जाता है..........जब कोई भी कार्य किसी के प्रभाव बस न होके स्वाभाव बस किया जाये तो हकीकत भी आती है और गहराई भी...........
        खैर छोडिये मैं भी कहाँ की बात कहाँ ले गया..........मैं सभी पाठक जन से वादा  करता हूँ की मैंने उनका अब तक खूब  मानसिक शोसन किया है.........लेकिन अब मैं अपनी गलती सुधारना चाहता हूँ.....इसलिए  अब जब तक सत्य को समझ न लूँ और ह्रदय पूर्ण रूप से इस सत्य का अभाश न कर ले तब तक किसी लेख में बेवजह शब्दों का प्रयोग नहीं करूँगा.............

Monday, May 24, 2010

व्यथित प्रेम....

 इस संधर्भ को को देखकर आप सोच रहे होंगे.....की प्रेम वो भी व्यथित ,,,,,,,,,कुछ दिलचस्प होगा.............
तो आप सही है...........दिलचस्प का तात्पर्य ही होता है जो दिल में चस्पा हो जाये वही  दिलचस्प है...........
खैर आज मुझे प्रेम की व्यथा लिखने की प्रेरणा कहा से हुई पहले ये बताता चलूँ........पिछले दिनों मैंने "खाप पंचायत" के बारे में अपने सहकर्मियों के माध्यम से जाना..............
   खाप पंचायत "समाज के स्थायित्व के ठेकेदारों की ऐसी फौज होती है जो दिल पे पहरा लगाने की नाकाम कोशिस को वैधता प्रदान करने का प्रयास करती है." और इस प्रयास में वो प्रेमियों को जिन्दा जलाने से लेकर उन सभी कार्य को वैधता प्रदान करने की कोशिस करती है जो मानवाधिकारों के हनन से सम्बंधित होते हैं...'
इन मूर्खों ने अपने अनुसार शाश्त्रों की व्याख्या भी करनी सीख ली है..(करते तो ये बहुत पहले से आये हैं, लेकिन अब नये कलेवर में)..............
जैसे ........मनुस्मृति में ये लिखा है........एकं त्याजयेत कुलं सार्थे, त्यजेत कुलं रास्त्र सार्थे..........इत्यादि.
अब भैया जो मनु के कल में सही था जरुरी तो नहीं की आज भी सही हो..........वक्त बदलता है,,,,,,,मूल्य बदलते हैं....विचार बदलते है.......पहले राजतन्त्र था अब लोकतंत्र है...........लेकिन इन मूर्खों को फ्रायड के शब्दों में कहूँ तो अपनी दमित इच्छा की प्रतिक्रिया देते हैं ,,,ये इस रूप में ....
मैं अपने अध्ययन काल से ही प्रेम विषय पे शोधार्थी  रहा हूँ........केवल शैधान्तिक रूप से ......(....प्रयोग करने की कभी हिम्मत नहीं हुई)......................
मेरे कई मित्र जिन्हें दुनिया की नजर में पागल कहा जाता था.........वास्तव में  वे कुछ पा गए थे (ये व्याख्या मेरी छोटी बहन ने की थी)  इस अंदाज में घूमते रहते थे.............(.उनमे से किसी की भी प्रेम कहानी अपने अंजाम तक नहीं पहुँच सकी .........कारण चाहे जो रहा हो............)...
                उन लोगो को देखके दिल बड़ा खुश हो जाया करता था............अच्छा लगता था...आज भी मैं एक शोधार्थी ही हूँ.........लेकिन  अब कई नए आयाम दिखाई पड़ने लगे हैं..अब शायद सोच का विस्तार हो गया है ..........प्रेमियों की व्यथा देखिये....
प्रेमी युगल पहले तो आपस के विश्वास के लिए लड़ते हैं......फिर दुनिया से लड़ते हैं.........प्यार की जगह लड़ना ही उनकी नियति बन जाती है....मोहब्बत के लिए वक्त ही नहीं मिलता  वैसे  .आज के समय में मोहब्बत भी बहुत  तेज हो गयी है.........रात रात भर जाग के मोबाइल से बाते करते रहना उन्हें एक दुसरे के एकदम नजदीक पहुंचा देता है........जीने मरने की कसमों के साथ साथ उनका प्यार परवान चढ़ता है.................
लेकिन कुछ छुटता  जा रहा है...........देखा गया है की प्रेम विवाह से ज्यादा व्यवस्थित विवाह  सफल होते हैं.(या दिखाया जा रहा है)..............हमारे देश में विवाह केवल दो  व्यक्तियों का सम्बन्ध नहीं होता बल्कि ये दो परिवारों के  संबंधो पे आधारित होते हैं.............प्रेमी जोड़े अपने परिवार और समाज को राजी करके आगे बढ़ने का प्रयास करते हैं (करना चाहिए)....जबकि अभिभावकों को इस प्रस्थिति  में व्यक्ति (प्रियजन) की मानसिक स्थिति का अनुमान करके ही उसके अनुरूप आचरण करना चाहिए..............
समाज के स्थायित्व के लिए ये अवश्यक है की नियमों का पालन कड़े रूप में किया जाये ..........प्रेम और व्यभिचार में भेद हो,,,,,, किन्तु प्रेम के साथ वही दुर्दांत व्यव्हार न दोहराया जाना चाहिए....जैसा प्रेमियों के साथ अब तक दोहराया जाता रहा है......
        मुझे तो कभी कभी ये सोच के शर्म आती है की मैं उस देश का नागरिक हूँ जिसमे प्रेम की चर्चा हो तो कृष्ण, मीरा, राधा, शबरी, राम,,,,,,,,,का नाम तो खूब ज्रोरो सेलिया जाता  है.......भक्ति में शीश नवाया जाता है.......लेकिन आज भी किसी भी प्रेमी जोड़े को सम्मान के साथ स्थान नहीं दिया जाता....उन्हें आत्महंता बनने पे मजबूर कर दिया जाता है............कभी गोत्र के नाम पे, कभी धर्म, जाति या फिर कोई और आधार ढूंढ लिया जाता है................
बारबार हम मीरा के भजनों को सुनके आंसू बहते हैं लेकिन पता  नहीं हमने क्या सिखा की आज भी दो व्यक्तियों के सम्बन्ध को हम स्वीकृति नहीं दे पाते ......स्वीकृति तो दूर की बात है उन्हें मानसिक सहयोग भी नहीं दिया जाता.......
ये लेख केवल प्रेमी युगल; अर्थात लड़का या लड़की से ही सम्बंधित नहीं है......प्रेम के व्यापक आकाश में कई समबन्ध है जिनका आधार प्रेम ही है.............इश्वर के पुजारी तुलसी, कबीर , नरोत्तम दास  या फिर कोई सूफी संत ........सभी ने खुदा को प्यार कहा है......सभी धर्माचार  मोहब्बत के आगे असफल हो जाते हैं......क्योंकि धर्मं का आधार भी प्रेम ही  है..................प्रेम जीवन जीने का तरिका  है.....जीवन का विस्तार है.........इसका रंग हैं ..........खुदा का नूर है.........किसी के लिए कुछ भी कर गुजरने का अरमान है ......वो भक्ति है पूजा है.................प्रतेक संबंधो की जड़ है.................
लेकिन हमारे लोग जिन्हें हम नफरत भी नहीं कर सकते (क्योंकि मोहब्बत नफ़रत नहीं सिखाती ),,,,,,,,,,,,बार बार यीशु को शूली पे चढ़ाके (हम) रोते आये हैं लेकिन आज तक (हमें)  उनका मार्ग समझ में नहीं आया...........
          दुनिया में जीवन जीने (शांति पाने) के दो रस्ते हैं एक दिल का,,,, एक दिमाग का ........दिमाग तर्कों में उलझता है जबकि दिल अक्सर एक बार में निर्णय लेता है.....और  जो सही भी होता है.............
जब अपना संविधान इतना अध्यात्मिक है की वो सभी को सामान अधिकार देता है लेकिन हम एक अच्छे नागरिक भी नहीं बन पाए जो इसकी कदर कर सके ......और मानव मात्र का सम्मान कर सके///////////////////
            आज भी खाप पंचायत की तरफदारी करने वाले मिल जायेंगे और तर्क भी जुटा लेंगे............मैं सिर्फ इतना कहता हूँ की अपने दिल से पूछिये क्या आप जो कर रहे हैं सही है?
अरे किसी को बचाने के लिए आप उसकी जान ले ले रहे हो और उसके भले की सोच रहे हो.भाई वाह  !.....उसका जीवन है वो अपने किये की सजा आजीवन भुगतने को तैयार है फिर आप अपने सीमा का उल्लंघन करके उसके जीवन का निर्धारण करने का प्रयास क्यों कर रहे हो?
आप सलाह दे सकते हो, समझा सकते हो  किन्तु विकल्पों में से चयन उस व्यक्ति विशेस का ही होना चाहिए..................ये उसका अधिकार है............जो हमारा संविधान उसे देता है....
मानव जीवन सदैव आधार खोजता रहता है,,,,, जिस के पास जाके उसकी सारी चिंता दुःख तकलीफ सब कम हो जाते हैं...........प्रारम्भ  में व्यक्ति निस्वार्थ प्रेम पाता है ,,,,,,,बाद में वो प्यार करना सीखता है उसे लौटना सीखता है ........इस तरह दुनिया का नाटक चलता है.....जीवन आनंदित होता है और सुखमय बनता है......................
लेकिन अब खाप पंचायत वाले कहेंगे की पहले किसी से मिलो तो उससे उसकी नाम, जाति , धर्म, गोत्र, सब कुछ पूछ लो फिर दिल से कहो की वो धडके.........
लेकिन बंधू ,,,,,,,जब सदियों से उन्होंने जैसा किया है  वे नहीं सुधरे तो प्रेमी कहा मानने वाले हैं...............वे भी अपनी धुन के पक्के ..........चले जा रहे हैं....................व्यथा के ओर...मस्ती में झूमते हुए...
(मोहब्बत है क्या बस इतना समझ लीजिये एक आग का दरिया है और डूब के पर जाना है ..........ग़ालिब ,,,ये फूलों की सेज में कब बदल पायेगा ,,,,,,,,,,,,,,,,,,)..
(कोई भी संवेदन शील व्यक्ति,, वो प्रेमी होता है...........उसका प्रेम व्यक्ति विशेष के प्रति न होके भावना विशेस की ओर होता है......किसी के साथ पुस्तकों का प्रेम किसी के साथ माता-पिता का प्रेम, किसी के साथ देश प्रेम होता है.........आधार कुछ भी हो लेकिन प्रेम तो संवेदना है.......जिम्मेदारी है......
अतः सभी संवेदन शील व्यक्तिसे मेरा  एक विनम्र निवदेन है की कही भी प्रेम की फुहार हो और अगर आप उसे अपने दिल से पूछे सही है तो उसका कम से कम मानसिक समर्थन जरुर करें.....................
एक व्यथित प्रेमी की ओर से..........साभार ......)

Monday, May 3, 2010

मासूम इर्ष्या....

ईर्ष्या.........आम तौर पे इसे नकारात्मक भावना के साथ जोड़ा जाता है........किन्तु मैंने इसे मासूम इर्ष्या का नाम इसलिए दिया है की वे बेचारे इससे ग्रसित होने पे बड़े ही नादानी से अपनी हरकतों द्वारा सामने वालों को कष्ट देने का पूरा प्रयास करते हैं ..............(.कभी कभी तो कुछ देर के लिए सफल भी हो जाते हैं................
इनका इलाज तो बस ये है की इन पर ध्यान न दो......वो कष्ट से मर जायेंगे..).......

                    मैं इसकी जरा व्याख्या करता हूँ..........
कुछ दिन पहले मैं गाँव गया था....काफी दिनों बाद गाँव जाने पे मन में एक अलग उत्साह होता  ही है/..वही स्थितिया अब नयी और आकर्षक लगती हैं.........लोग, खेत , पेड़ , नहर ,,सब कुछ और ज्यादा करीब लगता है...(दुरी होने पर ही प्यार का एहसास होता है )
 लोग हंस के मिल रहे थे,खुश थे  ................................ उनमे से  कुछ लोग तो खुश थे  हंस रहे थे लेकिन कुछ के व्यंग्य क्रोध दिला रहे थे......मुझे गुस्सा इस बात पे आ रही थी की वे निरर्थक तुलना कर रहे थे. मुझे समझ नहीं आ रहा था की मैं जब तक सफल नहीं था तब तक उनका था, ज्योंही सफल हुआ उनका लक्ष्य बन गया और सहज इर्ष्या का शिकार हो गया.......
               मजा तो तब आता है जब आपके चाची , बड़ी मम्मी इस प्रकार से  व्यंग्य कहे की  जैसे आप कुछ समझ नहीं सकते और वे दुनिया के सबसे चतुर लोग हैं,  तो बहुत बुरा भी  लगता है और आश्चर्य भी होता hai.................
    मेरे साथ दीदी भी गयी थी, विवाह के बाद उनकी पहली ग्राम -यात्रा थी/ मेरे साथ कुछ विनम्रता के साथ व्यव्हार किया जा रहा था लेकिन दीदी को तो स्वागत के बजाय व्यंग्य के घोल दिए जा रहे थे............
कोशिश की जा रही थी की वो हँसे नहीं बल्कि रो के अपने ससुराल के दुखों को प्रगट करें........
मैं इसका कारण नहीं समझ पा रहा था......................
            शाम को हम अपने द्वार पे अमरुद के पेड़ के निचे बैठे , लोगों के बदले व्यवहार से दुखी थे ........हम भाई बहन इसका कारण नहीं समझ पा रहे थे ...........
कुछ देर बाद मम्मी- पापा भी हमारे पास आ गए.......उन्होंने हमसे बाते की और जानना चाहा की तुम लोग दुखी क्यों हो?
मैंने कहा  की लोग अचानक ऐसा व्यव्हार क्यों कर रहे हैं,?.सब स्वार्थी हैं, मुर्ख कपटी और ईर्ष्यालु हैं.......
   पापा ने गंभीरता से मेरी बात सुनी और कहा की उन लोगों के व्यवहार को समझने की कोशिस करो.......वे लोग ऐसा क्यों करते हैं ये जानने की कोशिस करो............मैं तुम्हे समझाता हूँ...............देखो, लोगों को प्रतियोगिता और संघर्ष में अंतर नहीं समझ में आता , और हम उनसे इतने की उम्मीद भी नहीं कर सकते....(क्योंकि अगर वो इतना सोच लेते तो वो कहीं और होते) ....प्रतियोगिता में आप दूसरों की सफलता का आनंद लेते हैं और वैसा करने का प्रयास करते हैं....लेकिन संघर्ष में आप इर्ष्या करने लगते हैं.और किसी तरह अपने विपक्षी को हारते देखना चाहते हैं.....या उनसे नफरत करने लगते हैं...........
        .मेरी छोटी बहन  हँसते हुए बोली "प्यार और जंग में सब जायज़ है." है न ? सभी उसकी तरफ देखने लगे,मैंने उसे घुर की पापा बैठे हैं , (लेकिन जब आप तर्क और ज्ञान की बात करते हैं  तो फिर मर्यादा की आड़  लेके बच्चों के सहज प्रश्नों से भागना  नहीं चाहिए)
     पापा बोले अगर प्यार में नफरत या फिर प्रिय को निचा दिखाना आ जाये तो वो प्यार नहीं हो सकता...........और रही जंग  की बात तो फिर बोलने तक ही क्यों ? कुछ हथियार का इस्तेमाल करो.
       मैंने परेशां हो  के पुछा तो फिर ये क्या है...........हम उन्हें प्यार करते हैं सम्मान देते हैं और वे दीदी को ऐसे बोल रहे हैं........
         पापा ने कहा की व्यक्ति की ऐसी प्रवित्ति होती है की वो तुलना करके खुद को खुश महसूस करता है...अब तुम लड़के हो तो मान लो की वो औरते तुमसे इतनी इर्ष्या नहीं कर पा रही की वे तुम्हे दूसरा समझती हैं...और वे तुम्हे खुद से आगे मानती हैं जिससे वे तुमसे तुलना नहीं कर पा रही .....तुमने गौर किया होगा की तुम्हे उन्ही ने व्यंग्य किया जिनका पुत्र तुम्हारी उम्र का होगा..........अब दीदी के केस में सभी औरते हैं और दीदी का सुख उन्हें तुलनात्मक रूप से ज्यादा लग रहा है इसलिए सभी मिल के उन्हें निचा दिखा के खुश होने का प्रयास कर रही हैं.या यूँ कहो की अपने दुखों को कम करने का प्रयास कर रही हैं ....................
        मैंने कहा तो ये बात है.................तब तो बेचारे कितने मासूम हैं की ये भी नहीं समझ पा रहे की जीवन को खुश बनाने के लिए दूसरों को निचा दिखाना नहीं बल्कि उन्हें सम्मान देना होता है........
प्रकृति में जो आप देते हो प्रकृति उसी को आप  को लौटाती है.........मुझे सब समझ में आ गया.............

" लेकिन अचानक एक बात दिमाग में आई की यहाँ तो सभी पिता के उम्र के हैं और सभी के बच्चे हैं ............मतलब पापा को तो रोज हर बात पे इनके उलटे सीधे व्यंग्यों  को झेलना होता होगा.....और माँ  का क्या होता होगा? शरीर में  एक सिहरन सी दौड़ गयी और मेरा मन श्रधा से उनके चरणों में झुक गया...........
       और फिर  मासूम इर्ष्या पे क्रोध करने  के बजाय हंसी आने लगी (सच माता पिता के बिना सुखी जीवन  की कल्पना नहीं की जा सकती )........ 
 तभी मेरी माँ की आवाज सुनाई दी की अब चलो सब लोग खाना खा लो और हम सब अपने मानसिक दुखों से छुट के भोजन (भौतिक) सुख लेने चल पड़े...................

Saturday, April 3, 2010

......जरा सोचिए...

                आज मैंने अरुंधती रॉय का लेख पढ़ा.....(आउट लुक के २९ मार्च के अंक में)....
मन थोडा खिन्न था........अपनी व्यवस्था  पे, अपनी सरकारी मशीनरी पे. कुछ नेताओं के दोहरे व्यव्हार पे,,,उनके राजनितिक लाभ के लिए किये जाने वाले कार्य पे .........
       लेकिन फिर सोचता हूँ की मैं क्यों किसी को दोष दूं?.  मैंने इसके समाधान  के लिए क्या किया...?
केवल टाइम पास के लिए कुछ बोल दिया, या फिर सरकार को गली दे दी....और अपना नित्य कर्म पूरा कर लिया........कभी पिज्जा.बर्गर....या बिरयानी खाते हुए गरीबों के लिए हमदर्दी के  दो शब्द बोल दिए ( वो भी लोगो का ध्यान पाने के लिए, बंद बहुत समझदार है) और इससे जयादा हम कर भी क्या सकते हैं? डिस्को में जाके अपनी सिट लेके दो दोस्तों के साथ देश की हालत पे चर्चा कर ली ...........हो गया अपना  काम...............(बस बंद करो ये नाटक) ........
कोई भी समस्या एका- एक बड़ी नहीं होती ,,उसका बारूद तो धीरे धीरे जमा होता है ,,,,,और फिर विस्फोट होता है...........हमने अगर समाधान किया होता तो इतनी बड़ी समस्या बनती ही  नहीं ..........
अपने फायदे के लिए जंगले कटे उन्हें विशेस नाम दिया (बिना उनको विस्वास में लिए,,,,काम से काम पुनर्वास के काम में तो कोई घपला नहीं होना चाहिए था),,,,,,उनकी बात तो सुनी ही नहीं.........हद तो तब हो गयी जब .उनकी सेवा करने गए संगठनों ने अपने फायदे तलाशने सुरु किये..............(क्षमा कीजिये  किन्तु,,,,,,,,मुस्लिम भाई उन्हें मुसलमान बनाना , ईसाई उन्हें ईसाई बनाना ,और  हिन्दू संगठन  उन्हें हिन्दू बनाना  चाहते है, कमाल ये है की सभी अपने इश्वर को प्रसन्न कर रहे हैं ).......
उन्हें इन्सान तो  रहने ही नहीं दिया जाता.........उनके विकास करने की बात करके उनका शोषण किया जाता है....हमारा सामंती व्यव्हार उनके आत्मसम्मान को चोट पहुंचता है......
.एक और समस्या ये भी की .हमारी सरकारी मशीने संवेदना सून्य होके काम करती  है..........अपने लोगो के खिलाफ युद्ध करना पड़े ,,,,,,,,,इससे बढ़कर किसी देश के लिए शर्म की  बात और क्या  हो सकती है.??/..............
मैं अरुंधती रॉय के लेख से पूरी तरह सहमत नहीं हूँ.................या फिर मैं उन माओवादियों का पक्ष भी नहीं ले रहा हूँ और न ही लूँगा................क्योंकि उनके द्वारा उठाया गया हथियार हिंसा का माध्यम है जिससे मैं सहमत नहीं हूँ...............कितने भी तर्क कर ले उसे सही नहीं तहराया जा सकता...............
किन्तु रॉय का लेख हमें सोचने पे मजबूर जरुर करता है कुछ तो ऐसी कमी है ,,,,,कहीं कुछ तो गड़बड़ है जिससे ये समस्या बनी हुई है...............क्या वो हमारा अंतहीन लोभ है? या कुछ लोगों की साजिस/.
हम पर्यावरण दिवस खूब  जोर शोर से मनाते हैं ,,,,,,,अख़बारों में खूब लेख (छपते)  छापते हैं......लेकिन हम में से अधिकतर लोग वातानुकूलित गाड़ियों में सफ़र करना पसंद करते हैं...............क्या ये दोहरा व्यव्हार नहीं.है?.....हम किसी की छेड़खानी या बलात्कार की निंदा करते हैं.............लेकिन हम ही ब्लू फिल्मों को देखकर उन्हें इसे बनाने की प्रेणना  देते हैं( देह के व्यापर को बढ़ावा देते हैं).......क्या हम कम दोषी हैं?.............एक मशहूर लेखक श्री चेतन भगत जी ने 8 मार्च को लिखा की "एक दिन पुरुषों को भी मिलना चाहिए जिस दिन उन्हें नाहाने के लिए कोई न कहे , उन्हें ब्लू फिल्मो को देखने की छुट  हो............अब आप ही बताइए ऐसे रोल मॉडल  ऐसा कर रहे हैं और फिर बेहतर लेख लिखते हैं नारी सम्मान के पक्ष में...............(ये व्यक्तिगत आरोप न होकर प्रसंगवश की गयी चर्चा  है.)
मैं ये नहीं कहता की आप सब कुछ छोड़कर गाँधी बन जाओ ..........क्योंकि गाँधी केवल एक ही हुआ (और एक ही रहेगा.), और उसका रास्ता बहुत ही कठिन लेकिन अक्सर सही होता है)........
.हमें तो ऐसा समाधान ढूढना होगा जिसे सभी लागु कर सके ,,,जिस पर अधिकतर लोग चल सके..,
अब ,हमें सोचना ही होगा ,,,,,,,,,,क्योंकि नजदीक के फायदे में हम दूर का बहुत बड़ा नुकसान कर रहे हैं...................एक बात और अब कोई ऐसा समय नहीं आने वाला की कोई एक आदमी आएगा और सब ठीक कर देगा कोई मसीहा..........क्योंकि मानव मस्तिस्क ने इतनी प्रगति कर ली है की वो जानता हैं की हर व्यक्ति में एक महामानव छिपा है ज्यों ही वो जाग गया सब ठीक हो जायेगा,  सारे भ्रम दूर हो जायेंगे......बस ........
हमें केवल अपने कर्तव्यों को ध्यान में रखना होगा .अपनी क्षमता का सर्वोतम प्रयोग समाज के लिए करना होगा.........(समाज और व्यक्ति अलग -अलग नहीं हैं, बल्कि एक ही है...).................
एक अच्छा  गृहस्त  बनना  तो ठीक है(जो सदियों से हमारा आदर्श रहा है)  लेकिन उसके आगे हमें एक अच्छा नागरिक बनना होगा..............और तभी हम इन सभी समस्याओं को हल कर पाएंगे..........
मुझे तो ऐसा लगता है, आप क्या सोचते हो? ????????????????

Monday, March 29, 2010

गुलाबी रंग .........

गुलाबी रंग .........
मेरा पसंदीदा रंग गुलाबी रहा है..यह कब से है मैं नहीं जानता..........
अल्लाहाबाद में जाने के बाद मैंने सोचना शुरू किया की अपने बारे में जाना जाये..मुझे क्या पसंद है ? क्या अच्छा लगता है ? कैसा खाना अच्छा है , कैसा पहनावा ?
असल में गाँव में इतनी फुर्सत ही नहीं होती थी की इसके बारे में सोचा जाये...जो मिल गया वही पसंद है..........
पिता जी ने इतने कहानिया सुना के हमें भर दिया था की हर खाना अच्छा लगता था ...करेला में विटामिन होता है..नीबू से दांत  ठीक होते है....दूध में कैल्सियम  होता है.....वगैरह वगैरह.........
अब जब शहर में आ गए तो एक फैशन सा चल पड़ा की थोडा चूजी होना चाहिए ,,,,,,,,,पशुओं के तरह सब कुछ न पसंद करना चाहिए.....(ऐसा लोगो ने समझाया था).....
            तो  हमने  भी  तय  किया की हम  भी  चूजी  हो  जायेंगे ........अब   पहले  रंग से शुरू कर  दिया तो  गुलाबी रंग चुन  लिया  हमने,  क्योंकि  ये  प्यार  का रंग  है साथ  ही इससे  bp control होता है. ........
  सारे  तर्कों  को  सोचके  हमने  निर्णय  लिया  की मेरा पसंदीदा रंग गुलाबी ही होगा .......हम  जैसो  की एक ही समस्या  है की हम  जिधर  मन  लगा  लेते  हैं  वही   अच्छा लगने  लगता है....हालाँकि  वो  खुद  से प्रकट  न होके  हमारे  द्वारा  चुना  गया होता है ,अब इसे अच्छा समझिये या बुरा ...
              खैर  अब जब चुन  लिया  तो इसे स्वीकार करने की कोशिस करने लगा.....और  एक दिन  की बात  है ,,,,,मैं अपने पप्पू  टाइप  स्टाइल  में college गया था ..स्टैंड  के पास  एक लड़की  गुलाबी रंग के ड्रेस  में , गुलाबी रंग के scooti से उतरी........(..चौकिये मत पप्पू टाइप कोई स्टाइल नहीं है बल्कि एक ऐसा तरीका है जिसमे वक्ती बिना वजह अपने को महत्व देता है ,,,यह जानते हुए की कोई उसे नोटिस नहीं कर रहा है...)
        मैं कुछ  देर  उसे  देखता  रह  गया मुझे इस  जहाँ  का ध्यान  ही नहीं रहा...जब मैं  क्लास   में पहुंचा  तो वहां  भी  वही  थी,,,,मेरे  दोस्तों  ने मुझे देख  लिया  था और  वे  उसका  घर  का पता  तक  ले  आये ..............
मनीष   ने तो पूरी  लव  स्टोरी  तैयार  कर  दी ....मैं शहमा  हुआ सा लैब्ररी   में चला  गया ,,,,,अरे  ये  क्या वो  तो मेरे  सामने  वाली  सीट  पे  आ के बैठ  गयी .......
मैं उसकी  तरफ  देख  भी  नहीं पा  रहा था, उसी  समय  एक आवाज  मुझे सुनाई  दी " क्या आप  मुझे ये  बता  देंगे ? अरे  ये  हो  क्या रहा है? और  क्यों ? मैंने खुद  को  संभाला  और   कोशिस  करके  उनके  सवालो  का जवाब  दे  दिया..
              बाहर  आके  मैं खूब  हंसा ....ऊपर  वाले  पे ...."तेरा  नाटक " एक ही  दिन  में गुलाबी रंग को  दिल    के करीब  पहुँचाने  के लिए उसे महसूस करने के लिए..............मैं शतर्क था . .
                   मैं जानता था की मैं दुनिया     से लड़  नहीं सकता  और  अपने  चाहने  वालों  को  तकलीफ  नहीं  दे  सकता...............मैंने अपने आँखों को सुनहरे ख्वाब बुनने से रोक दिया....मैं जानता था की परिचय से ही प्रेम की शुरुआत होती है...(मैं वास्तव में डर गया था)..  खुद को समझा लिया हमने. एक सुखद भाविश्ग्य का ख्वाब दिखा के....तर्कों की भरमार लगा के ,,,,आशिको की दुर्दशा सोच के ........
          आज भी  उसी मानसिक अवस्था में जी रहा हूँ. लेकिन ये तर्क अब कुंद हो चुके हैं...अब  ...ये सोचके की शादी के बाद अपनी धर्मपत्नी को दुनिया की सारी खुशियाँ दूंगा,,वहां खोने का डर न होगा .....उस प्रेम पे सामाजिक मोहर लगी होगी ....न मैं रुशवा हूँगा और न वो....
 .. इसी भ्रम में जिंदगी जिए जा रहें  हैं..
            पर क्या मैं कायर नहीं हूँ?  क्या मैं खुद अपने सपनो की भ्रूण हत्या का दोषी नहीं  हूँ?
. मैं कभी कभी बहुत ही शर्मिंदगी महसूस  करता हूँ....... ...मैंने ये क्या कर डाला.?  भविष्य का क्या  कोई भरोषा है? कल हो न हो, या फिर अगर हो भी तो उस लायक न हो...............................
  ..लेकिन फिर भी शायद वही  निर्णय सही था.......क्या करूँ?  
"गुलाबी रंग आज भी देखकर मैं दुनिया से कट जाता हूँ.."...उस लड़की का चेहरा और नाम तो मुझे याद नहीं लेकिन उसकी वो ड्रेस मुझे आज भी याद है....मेरा परिचय केवल ड्रेस से ही होके रह गया...
...(समझदार होके  प्यार नहीं किया जाता).. शायद प्यार अभी मुझमे जिन्दा है. या उसकी भ्रूण हत्या हो गयी..ये तो मैं नहीं जानता .पर जो भी हो गुलाबी रंग अभी भी अच्छा लगता है......
अब आप ही बताइए मैंने जो किया वो क्या था? मेरा  डर , मेरा धर्म या फिर अपनों के प्रति लगाव? .
(पाठक जन  इसे कोई वक्तिगत समस्या या प्रश्न न समझे बल्कि इसे एक विशेस प्रकार की सामाजिक-वक्तिगत  समस्या समझके उसपर टिप्पड़ी दे ..मैं जानना चाहता  हूँ  की ऐसे समय में क्या मेरा निर्णय सही था...या फिर मैंने प्यार को खो दिया ,मेरी चिंता किये बगैर अपनी राय दे.)

Saturday, March 27, 2010

माँ की.एक कहानी.

. मैं जब छोटा था तो माँ अक्सर मुझे कहानियां  सुनाया करती थी. सच्ची वाली.........
मैं शेर वाली या भेड़ वाली भी सुनता था लेकिन यदि कहानी के पात्र मेरे परिचित होते तो मुझे बड़ा मजा आता.......
एक कहानी जो मुझे आज याद आ रही है..........
                   एक गाँव में एक परिवार रहता था...उसमे छ बच्चे थे...दो लडकियां  और चार लड़के..(रेखा, दिया, अमन, कमल, मुकेश और सुरेश)..परिवार कि आर्थिक हालत दयनीय थी....बच्चों की परवरिश भी  ठीक से नहीं हो पा रही थी. पिता कि कमाई इतनी अच्छी नहीं थी कि बच्चो को पढाया  जा सके...भोजन की व्यस्था ही नहीं हो पा रही थी...
                            रेखा तीसरे नंबर कि संतान थी. उसकी उम्र जब ७ साल कि थी तभी उसने ये निर्णय लिया कि वो आगे पढाई नहीं करेगी और दिया को पढने का पूरा मौका दिया जायेगा..अमन और कमल  दोनों बड़े होने के बावजूद घर से उतना मतलब नहीं रखते थे..उन्हें केवल अपने सेहत का ध्यान रहता था...वे कोशिस करके भी पढ़ नहीं पाते थे...उन्होंने ये निर्णय किया कि वो कुछ काम करंगे....और बड़े आदमी बन जायेंगे...........
इधर  मुकेश कि पढने में रूचि थी किन्तु उसे भी लगता था कि अपने से छोटे भाई के लिए (सुरेश) के लिए उसे भी रेखा कि तरह त्याग करना चाहिए...........जब छोटे बच्चे त्याग कि बात करते है तो मुझे बड़ा आस्चर्य होता है कि ये दुनिया कितनी  स्वार्थी है और उसे भी जायज ठहराने कि कोशिस करते हैं......लेकिन उन बच्चो  के पास तर्क न होने पर  भी उनका  मासूम व्यव्हार कितना सही और अच्छा लगता है....
     रेखा को जब ये पाता चला तो उसने मुकेश को समझाया  कि देख भाई जीवन में बहुत सी तकलीफ आयेंगी , मैं लड़की हूँ मुझे दुसरे घर जाना है मेरे लिए पढाई इतनी जरुरी नहीं है...तू कुछ पढ़ लेगा तो छोटे को भी मदद मिलेगी और पढाके तू खर्चा भी निकाल सकता है......
सच है जब मजबुरिया आती है तो वे अपना इलाज भी खुद ही  बता देती हैं ,,,,उसके लिए उम्र का बंधन नहीं होता....
छोटे भाई और बहन "सुरेश  और दिया" में बालसुलभ वे सारी चंचल्ताये थी कि वे खामोश बलिदानों को समझ नहीं पाते..........(बलिदानों का ढिंढोरा नहीं पीटा जाता )...
    एक दिन रेखा रोटी बना रही थी, सुरेश को काफी तेज भूख  लगी थी, सुरेश दीदी के पास दौड़ता हुआ आया और रोटी कि जिद करने लगा,,,,,दीदी ने उसे रोटी दी वो चीनी कि मांग करने लगा दीदी ने दूध में थोडा सा आटा डाल दिया और बोली खा लो....सुरेश को मीठा न लगा उसने शिकायत कि तो दीदी ने कहा कि दुकान वाला अच्छी चीनी नहीं देता....उससे बात कर लेना...मुकेश सब समझ रहा था,,,
                     ,दिया और मुकेश दोनों साथ में खाने आये और मुकेश ने बिना खाए ही पेट दर्द का बहाना कर के चला गया....सभी के खा लेने के बाद रेखा ने बची रोटिया मुकेश के साथ बैठकर उसे समझाते हुए खिलायीं और खायी...........
उस परिवार के दिन इसी तरह कट रहे थे....दोनों बड़े भाइयों के द्वारा कमाने से कुछ सुगमता हुई...और तीनो छोटों ने अपनी पढाई पूरी कि...(रेखा को छोडकर)...
सुरेश का मन डॉक्टर बनने का था लेकिन उसकी पढाई तो शायद वो कभी नहीं कर सकता क्योंकि न तो उस समय बैंक के प्लान थे और न ही कोई और  सहारा .........
उसने अपने सपने को मार दिया.......आज उसका अपना एक दुकान है जिसमे वो दिन भर सामान बेचता है........मुकेश का भी वही हाल है............बड़े दोनों भाई अपने दुनिया में मस्त है....दिया कि शादी भी हो गयी.........रेखा कि तो सबसे पहले ही हो गयी थी.............
कुल मिलाके यदि इसे सुखी जीवन कहते है तो  सभी अपने जिंदगी में अच्छे से हैं...................
                 कहानी ख़त्म होने पे मैंने माँ से पूछा  था कि माँ रेखा ने ऐसा क्यों किया ? उसके सपने का क्या हुआ? क्या उसका कोई सपना नहीं था?
       माँ ने कहा कि पढाई का उदेश्य जिम्मेदारी का बोध कराना है,,,,,,,,,,और केवल अपने सपने के लिए तो कोई भी जी लेता है, किसी के सपने पूरा करने का सुख ही कुछ और होता है.............
मुझे उनमे रेखा बोलती दिखाई दी..........मेरी आंखे नाम थी..और जुबान खामोश.
          मुझे अब लग रहा था कि मैं अक्सर अपनी जिम्मेदारियों से बचने के लिए जो छोटा होने का दावा करता हूँ वो कितना खोखला है...........वास्तव में खुदा ऐसे लोगों को खुद बना के ही भेजता है उन्हें उम्र कि सीमा से परे किसी बहाने से परे .........बस वो अपनी जिम्मेदारियों को पूरा करते जाते हैं ,,,,,,बिना किसी अपेक्षा के ........पता नहीं ये सुख है  या कुछ और.......... 

Friday, March 26, 2010

ये क्या हो रहा है?

आज मैं थोडा क्षुब्द हूँ.
इसका कारण पिछले दिन आया उच्चतम न्यायालय का एक निर्णय है. दक्षिण  कि एक अभिनेत्री द्वारा दायर याचिका में "live in relationship" को जायज़ ठहराने कि मांग कि गयी थी और उससे उत्पन्न संतान को जायज ठहराने कि मांग कि गयी थी. मुझे इससे कोई तकलीफ नहीं, कोई विरोध नहीं. विवाह का बंधन आवश्यक  नहीं.दो समझदार लोग यदि बिना विवाह के बंधन में बंधे एक दुसरे के प्रति समर्पित है तो यह जायज हो सकता है.बशर्ते यह वासना पूर्ति का मार्ग न बन जाये...और न ही  अपनी सामाजिक जिम्मेदारी से पलायन का मार्ग .
              मैं दुखी इस बात से हूँ कि इस निर्णय में एक ऐसी टिप्पड़ी जोड़ दी गयी कि "राधा-कृष्ण भी तो live in relationship में ही जी रहे थे....जो मुझे बहुत बुरी लगी....
              और ये टिप्पड़ी माननीय मुख्य न्यायाधीश की पीठ  द्वारा कि गयी.
मैं अभी तक यही जानता रहा  हूँ कि live in relationship पश्चिमी देशों में विवाह का एक विकल्प है. अर्थात बिना विवाह के पति-पत्नी के जैसा व्यव्हार और संतान उतन्पन्न करने कि स्वत्रंता...
लेकिन जब भी प्रेम के दिव्य  स्वरुप कि बात होती है तो कृष्ण राधा के प्रेम कि चर्चा कि जाती है और वासना विहीन प्रेम का  उदाहरण दिया  जाता  है.....
क्या platonic love जैसे शब्द अब इस दुनिया से गायब हो गए हैं. या फिर उसका मतलब ही बदल गया है.....,
एक आश्चर्य और भी है कि अभी तक छोटी सी बात पे पुतला फूंकने वाली सड़क छाप राजनितिक लाभ लेने वाली पार्टियाँ भी मौन है... धर्म के ठेकेदार भी ...........क्या महज इसलिए कि इस  निर्णय का विरोध  किसी खास वोट बैंक को प्रभावित कर देगा..............(हमारे मुख्य न्यायाधीश महोदय minorties हैं ?)
पाता नहीं क्या हो रहा है? मैंने कुछ कड़े शब्दों का प्रयोग कर दिया , मेरा अभिप्राय किसी कि निंदा करना  नहीं है...
 मैं उनकी बौद्धिकता पर प्रश्न चिन्ह नहीं लगा रहा हूँ.
किन्तु हम किस दिशा में जा रहे हैं ,,,,सोचना होगा ........ये क्या हो रहा है?
क्या बौद्धिक जन केवल विश्वास तोड़ने के लिए ही  होते हैं, वे अपने तेज  तर्कों से विश्वासी लोगों के जीवन का सहारा छीन  लेने का प्रयास करते हैं.. हो सकता है वे अपने तर्कों से अपनी टिप्पड़ी को सही सिद्ध कर दें..
लेकिन हमसे हमारे सपने , कल्पनाएँ  छिनने का उन्हें कोई हक़ नहीं ,,,,,किसी को भी  नहीं............ कभी  भी नहीं.

Tuesday, March 9, 2010

खुद से मिलना


..मिलना खुद से..
एक दिन शाम को मैं गंगा किनारे बैठा हुआ था, थोडा उदास सा शांत, जीवन के प्रति  पश्चमुखी  सोच से ग्रसित।  मैं अपने अतीत कि खुशियों को याद कर रहा था, वर्तमान से दुखी (अपरिचित) (अतीत में जीना अच्छा लगता है)।  ऐसा लगता था कि जब वापस गाँव  जाऊंगा तो फिर खुश हो   पाउँगा। कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिनअपने भविष्य कि कल्पनाओ में अपने गाँव, अपने लोगों को जोड़कर देख रहा था ,  मेरे लिए तो बस उतनी ही दुनिया थी।
      मैं उनके साथ जीने कि कोशिस कर रहा था, पता नहीं था कि वक्त के बहाव में फिर वही स्तिथि प्राप्त नहीं कि जा सकती जिससे आप गुजर चुके हों। नदी शीतल और मंद गति से प्रवाहित थी, वो अपनी ठंडी हवा से मुझे सहला रही थी।  
                "मेरा जीवन भी तो तुम्हारी तरह है .क्यों उदास होते हो?" एक आवाज सुनाई दी। मैंने चौक कर इधर-उधर देखा फिर मैंने नदी की ओर गौर से देखा,  मुझे साफ-साफ सुनाई देने लगा, नदी कुछ कह रही थी मुझसेमैं भी तुम्हारी तरह ही तो हूँ, क्यों उदास होते हो ? मेरा जीवनचक्र भी तुम्हारी तरह ही हैमैंने पूछा, वो कैसे?
      नदी ने कहना शुरू किया, मेरा जन्म सुदूर बर्फीले पहाड़ो में हुआ। मैंने  अपना  बचपन उनके पास उछलते, कूदते मस्ती के साथ बिताया  जैसे तुमने अपना बचपन अपने माता-पिता , अपने दोस्तों के साथ अपने गाँव मेंफिर मैं बड़ी हुई  मैं बाहर जाने कि जिद करने लगीमेरे पिता (पर्वतोंने मुझे समझाया कि जाना चाहती हो ,जाओ इस संसार के सभी चर-अचर प्राणियों की एक नियति होती है, एक उद्देश्य होता है। तुम्हारे जीवन का भी एक लक्ष्य है, और वह है निरंतर स्वयं को बेहतर बनाना , अपने से उच्चतर अवस्था  की ओर गतिमान होना तुम्हारा लक्ष्य है सागर से मिलना, और अच्छी बात यहै कि  तुम इसे जानती हो, वरना अधिकांश लोग अपने जीवन का लक्ष्य जान ही नहीं पाते।  नदी ने आगे कहा, पिता जी ने मुझसे पूछा था कि" लेकिन तुम्हारा लक्ष्य (सागर) बहुत दूर है।  रास्ता अत्यंत कठिन , कभी सघन तो कभी  विरल जन समुदाय मिलेंगे, कभी बीहड़  मिलेंगे सैकड़ों  उतार-चढाव मिलेंगे इस रास्ते मे, .क्या तुम जा सकोगी?"
      मैंने कहा, हाँ ! मैं हर जगह जाउंगी। मैं आपका ही प्रवाह मान रूप हूँआप जहाँ नहीं पहुंचे ,वहां भी जाउंगी, उन्हें आपकी शीतलता से तृप्त करुँगी और आपका सन्देश दूंगी। मैं उन्हे आपके वजूद का एहसास दिलाउंगीउन्होंने शशंकित  होते हुए पूछा कि हर नदी तो सागर में नहीं मिलती, तब क्या होगा? तब तो तुम्हारी सारी यात्रा व्यर्थ हो जाएगी ?
      मैंने उन्हे समझाया, पिता जी!  नदी अपने नाम से नहीं मिलती सागर से, किन्तु उसका तत्व तो किसी रूप में सागर में  मिल ही जाता है.और आपने ही तो सिखाया है, लक्ष्य प्राप्ति से महत्वपूर्ण तो उसके लिए कि जाने वाली यात्रा है, किया गया प्रयास है।
हो सकता है कि सूरज दादा कि मदद से मैं अपना रूप बदल के वापस किसी और जगह पहुँच जाउंगी पर अपनी यात्रा जारी रखूंगी, सदैव अपने से बेहतर स्थिति प्राप्त करने के लिए और तुम देख सकते हो, मैं चल ही रही हूँ, शांत, संयत बिना सोचे कि सागर में मिल पाऊँगी या नहीं!
      मुझे अपना भविष्य देखने कि प्रेरणा  हुई मैंने खुद कि तुलना नदी से करना शुरू कर दिया। मैं हमेशा अचानक बदलने वाली परिस्थिति से परेशाथा, लेकिन ये तो मात्र उतार -चढाव  हैं। जब सब साथ होते हैं तो ख़ुशी और जब नहीं होते तो ष्ट होता  था, लेकिन ये तो केवल यात्रा में सघन एवम विरल आबादी से गुजरना है। मुझे सब कुछ स्पष्ट दिखने लगा। 
      हम जितना आगे बढ़ते हैं,प्रगति करते हैं उतनी ही दूरी  हम अपने परिवार , घर से आगे चले आते हैं।  और लौटने का कोई सीधा मार्ग नहीं होता।  (हम फिर से अमरुद चुराकर नहीं खा सकतेया किसी गन्ने के खेत में बिना पूछे नहीं घुस  सकते....या जामुन नहीं बिन सकते )
समय के साथ हमसे समाज कि अपेक्षाए बदल जाती हैं, और हमें उसी के अनुरूप खुद को ढालना पड़ता है। लेकिन ये भी सत्य है कि नदी कि तरह ही हमारी प्रगति ,ख़ुशी का श्रोत भी हमारा जन्मस्थान (मूल) ही है सब कुछ  उनके साथ के  बिना अधुरा लगता है, वही  से हमें ताकत और उर्जा मिलती है।
      इस तरह से सोचने पर मुझे बहुत आश्चर्य हुआ कि जीवन कितना आसान है ! हर प्रश्न का जवाब  कितना  सरल है ! सुख-दुःख ,दोस्त-शत्रु, मिलना-बिछड़ना आदि सभी जीवन यात्रा के पड़ाव मात्र है,  जो जीवन में अपने तरीके से कुछ सिखाकर  जाते हैं और वो सीख मेरी यात्रा के लिए आवश्यक होगी या फिर उस यात्रा में  काम आयेगी। कई दिन से मैं परेशा था कि मेरा व्यवहार कैसा  हो,  मैं गर्म विचारधारा को मानु या फिर नरम विचारधारा को, लेकिन अब मैं विचार सागर में गोते लगा रहा था।
      जब नदी को बांध दिया जाता है, प्रदुषण  किया जाता है, जब उसका केवल शोषण किया जाता है, तो वही जीवनदायनी  अपना विकराल  रूप ले  के तबाही  लाती  है। सी प्रकार  शीतल का स्वाभाव  होना , दूसरों को संतुष्टि  देना  अच्छा  है। किन्तु शोषण  के विरुद्ध  आवाज  उठाने  के लिए कहीं से और कुछ मांगना नहीं पड़ता, बल्कि  उसका वही  जल  तबाही ला  देने के लिए भी पर्याप्त  है
      बैठा- बैठा मैं जीवन दर्शन  सीख गया। मुझे इस तरह सभी प्रश्नों  के उत्तर  मिलने  लगे, मैं बहुत खुश हुआ। जब मेरी तंद्रा टूटी तो चांद निकल आया था, चाँदनी फैली  थी,वो शांत माहौल, गंगा की  रेत  और चमकता  जल  शुकून  और धैर्य  प्रवाहित  कर रहा था, मेरे अंदर ।
वाकई  नदी का जीवन कितनी  अनिश्चितताओं  से भरा  पड़ा  है, और हमारा भी !
      हमारी अन्तः – प्रेरणा हमें हमेशा रास्ता दिखाती  है, इसके साथ केवल  शर्त यह है कि निडर  हो के  अपने दिल  कि आवाज़  सुनी  जायेयदि  एक बार  हृदय बोलना  सीख  गया तो फिर कहीं  और से किसी और प्रेरणा कि आवश्यकता   नहीं रहती  है। "ब्रह्माण्ड  का प्रत्येक   कण  सिखाने  लगता है."....
एक फिल्म आई थी, पिछले दिनों, ओम शांति ओम  उसी का यह संवाद मन मे घूम गया कि
"जब आप किसी को पूरे  दिल  से चाहते  है तो सारी कायनात  उससे  मिलाने  में आपकी मदद करती  है"

      और इस तरह मैं नयी  उर्जा से  भरा  हुआ खुद को हल्का  महसूस  करने लगा, गुनगुनाता  हुआ मैं वापस कमरे  की ओर चल पड़ा, मुस्कुराते हुये।  

      कभी-कभी अपने आप से बात  कर लेने  से कई उलझे प्रश्नों के जवाब मिल जाते   हैं.......कोशिश   करके  देखिये , अच्छा लगता है.....मिलना खुदसे............. 

                                --(सौरभ)